इन दिनों बड़ी दुविधा में है हमारा मध्यम और उच्च वर्ग

भरी दुपहरी में नंगे पांव मजदूरों के भूखे-प्यासे परिवारों का रेला सड़कों पर निकल पड़ा है और कब्ज़ा कर लिया है टीवी की पूरी स्क्रीन पर।

ये लोग जल्दी से जल्दी अपने घर या जहां भी जाना है..., आखिर चले क्यों नही जाते? इन्हें देखकर सीने की गहराइयों में दफन संवेदनाएं अपना सिर उठाने लगती हैं और फिर यूट्यूब को देखकर बनाए गए रसगुल्लों, केकों और समोसों में वह स्वाद नहीं रह जाता...। इन मजदूरों के पांव के छालों को देख दिल धुकधुकाने लगता है और एसी व कूलरों की ठंडक से ठंडे हुए घरों में बेचैनी सी होने लगती है। लूडो और कैरम के खेलों का मजा खराब हो जाता है।

ऐसा नहीं है कि लॉक डाउन से पहले ये मजदूर बड़े अच्छे हालातों में थे लेकिन उनकी एक कमरे की कोठरी, उस पर छत के नाम पर टीन का टप्पर, कोने में पड़ा टीन के चद्दर का एक बक्सा..., जिसमें उनकी सारी पूंजी या कहिए कि दुनिया भरी रहती है..., ये सब सबकी नजरों से दूर था। बुरा हो कोरोना का कि बेवजह ये सब सामने आ गया।

अब मध्यम और उच्च वर्ग डरा हुआ है, खतरे में है..., कि कहीं इनमें से कोई सामने न आ जाए और यदि आ गया और अपना हिस्सा उनसे मांगने लगा तो क्या होगा। अपनी पुरानी चप्पलें या कपड़े किसी को देने पड़ जाएं तो...? पहले, उन्हें देकर घर की कामवाली या सोसाइटी के चौकीदार को देकर रौब गांठा जा सकता था।

अच्छा हो कि यह कोरोना की मार जल्द खत्म हो जाए। सब अपने ठिकानों में समा जाएं और सारी दुविधाएं भी खत्म हो जाएं।


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