मानव जीवन को बचाने की जिद में जुटे हैं सभी धर्म

ब्रज क्षेत्र में कोरोना के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई से एक बात तो बिल्कुल साफ हो गई है कि वर्षों से चली आ रही परंपराओं के लिए मनुष्य नहीं बना है, बल्कि मानव व उनके सांस्कृतिक उन्नयन के लिए विभिन्न परंपराओं का विकास किया गया है।

पूरी दुनिया के साथ-साथ कान्हा की नगरी में भी लड़े जा रहे इस युद्ध में यह साबित होता जा रहा है, जब मानव जाति पर कोई संकट आए तो उसके रास्ते में आ रही किसी भी परंपरा को कभी भी तोड़ा जा सकता है, स्थगित किया जा सकता है या बदला जा सकता है। धार्मिक व सामाजिक परंपराएं मानव जीवन को संकट में डालने के लिए नहीं बल्कि जीवन को सुगम बनाने के लिए हैं।

ब्रज के विश्व प्रसिद्ध मठ और देवालयों ने इस बात को बड़े जोर-शोर कहा कि मानव जीवन को बचाने से बड़ा कोई धर्म नहीं हो सकता है। देशभर में चल रहे लॉक डाउन के बीच अक्षय तृतीया व नवरात्रों का पर्व आया तो ब्रजवासियों ने देवी मंदिरों तक पहुंचने की जिद नहीं की। ब्रज के मंदिरों में सजने वाले फूल बंगलाओं की परंपराओं के पालन की भी जिद नहीं की गई। तमाम ब्रजवासी ऐसे हैं जो प्रतिदिन यमुना नदी का दर्शन व पूजन कर अपनी दिनचर्या शुरू करते हैं। उन्होंने भी यमुना नदी पर जाने का हठ नहीं किया। यहां तक कि वृंदावन के रंगजी मंदिर के रथ मेला को आयोजित करने के लिए भी आयोजकों ने कोई जिद नहीं की। दुनिया में ब्रज की होली अनूठी है लेकिन ब्रजवासियों ने महीनेभर चलने वाले होली मिलन के कार्यक्रमों को बिना किसी दबाव के स्वतः ही आयोजित करने से मना कर दिया।

चैत्र एकादशी से वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में फूल बंगला नहीं सजा।  स्वामी हरिदास जी के प्राण प्रिय ठाकुर बांके बिहारी जी महाराज को लाड़ लड़ाकर ही सेवित किया जाता है। इस बार चैत्र एकादशी से सजने वाले फूल बंगला भी कोरोना त्रासदी के कारण नहीं बन रहे हैं।

यह किसी एक धर्म विशेष तक सिमटी उदारता नहीं है। गिरजाघरों में होने वाली सामूहिक प्रार्थना को स्थगित करने के लिए जिला प्रशासन को अलग से कोई अपील नहीं करनी पड़ी और ना ही जुमे की नमाज के लिए किसी मस्जिद पर लोग एकत्रित हुए। वर्तमान में चल रहे रमजानों को लेकर भी कोई उद्विग्नता अभी तक नहीं दिखी है। गुरुद्वारों में भी कोई कार्यक्रम नहीं हुए हैं और पहले से निर्धारित कार्यक्रमों को निरस्त कर दिया गया।

ब्रज की सांझी संस्कृति का इससे अनूठा उदाहरण और क्या हो सकता है कि जब पूरी मानव प्रजाति के जीवन पर संकट आया तो ब्रज अपनी परंपराओं का पिछलग्गू नहीं बना।


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