मिट्टी और मोम से उकेरी जाती हैं अद्भुत आकृतियां

छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में एक शिल्प कला को आदिवासियों ने अब तक संजो कर रखा है। नाम है, ढोकरा शिल्प। इस शिल्प कला का उपयोग करके बनाई गई मूर्ति का सबसे पुराना नमूना मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि खुदाई में नृत्य करती हुई लड़की की प्रसिद्ध मूर्ति को ढोकरा शिल्प द्वारा ही बनाया गया है।

ढोकरा शिल्पकार कांसे, मिट्टी और मोम के धागे के सहारे, ऐसी कलाकृति निर्मित करते हैं कि देखने वाला सुखद आश्चर्य में पड़ जाता है। ढोकरा शिल्प में आकृति बनाने की प्रक्रिया जटिल होती है। एक कृति बनाने में सप्ताहभर का समय लग जाता है। हर एक चरण में मिट्टी का प्रयोग होता है। ढोकरा शिल्प का प्रयोग कर सुंदर कलाकृति बनाने वाली बस्तर की खिलेन्द्री नाग बताती हैं कि सबसे पहले मिट्टी का एक ढांचा तैयार किया जाता है, जिसमें काली मिट्टी को भूसे के साथ मिलाते हैं। काली मिट्टी जब सूख जाती है तो उसके बाद लाल मिट्टी से लिपाई करते हैं। उसके बाद मधुमक्खी के छत्ते से निकले मोम का लेप लगाते हैं। सूखने के बाद मोम के पतले धागे से उस पर बारीकी से आकृतियां बनाते हैं। इस ढांचे को धूप में सुखाते हैं और फिर मिट्टी से ढक देते हैं। इसके बाद पीतल, टीन, तांबे जैसी धातुओं को हजार डिग्री सेल्सियस पर गर्म करके पिघलाते हैं। जो ढांचा सुखाया गया था उसे भी गर्म किया जाता है, जिससे मोम पिघल जाता है। ढांचे में खाली हुए स्थान पर पिघली हुई धातु को डालते हैं और फिर चार - छह घंटे ठंडा करते हैं। इस तरह से आकृति तैयार हो जाती है।

ढोकरा शिल्प में दो प्रकार की आकृतियां बनती हैं। पहली, देवी-देवताओं के शिल्प, जिनमें प्रमुख रूप से घोड़ों पर सवार देवियां है, जो हाथों में खड़ग, ढाल, अन्न की बालियां व मयूर पंख धारण किए हुए हैं। उदाहरण के लिए तेलिन माता, कंकालिन माता की मूर्ति। दूसरी, पशु आकृतियां जिनमें हाथी, घोड़े की आकृति प्रमुख है। इसके अलावा, शेर, मछली, कछुआ व मोर इत्यादि भी बनाए जाते हैं। ढोकरा शिल्प को ‘घढ़वा शिल्प’ के नाम से भी जाना जाता है। कला में तांबा, जस्ता व रांगा आदि धातुओं के मिश्रण की ढलाई करके बर्तन व दैनिक उपयोग के सामान भी बनाए जाते हैं।

ढोकरा शिल्पी, प्रांतीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपनी छाप छोड़ रहे हैं। ये शिल्पकार विभिन्न प्रदर्शनियों में शामिल होकर अपनी पहचान बना रहे हैं। कांसे से बनी विभिन्न आकृतियों को प्रदर्शनी में बेचकर ये आसानी से 100-200 रुपये का मुनाफा प्रति कलाकृति कमा लेते हैं। इन शिल्पकारों को विदेशों में भी प्रदर्शन के लिए बुलाया जा रहा है। ढोकरा शिल्पी जैसे-जैसे विभिन्न प्रदर्शनियों में भाग लेने लगे है, वैसे-वैसे अपने इन परम्परंपरागत शिल्प कला नए प्रयोग भी करने लगे हैं। कला से संबंधित बड़े वर्ग इन्हें नए प्रयोगों के लिए प्रेरित भी करते हैं।

मिट्टी और मोम से उकेरी जाती हैं अद्भुत आकृतियां

भारत, कला और संस्कृति की पुण्यभूमि है। यहां का अद्भुत शिल्प सौंदर्य विश्व को चमत्कृत कर देता है। सांस्कृतिक विरासत और पुरातात्विक अवशेषों से यह ज्ञात होता है कि ईसा पूर्व से ही यहां वास्तुकला, मूर्तिकला और धातुकला का विकास हो चुका था। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में ऐसी ही एक शिल्प कला को आदिवासियों ने अब तक संजो कर रखा है। नाम है - ढोकरा शिल्प। इस शिल्प कला का उपयोग करके बनाई गई मूर्ति का सबसे पुराना नमूना मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त होता है। खुदाई में नृत्य करती हुई लड़की की प्रसिद्ध मूर्ति है, जिसे ढोकरा शिल्प द्वारा ही बनाया गया, ऐसा माना जाता है।

ढोकरा शिल्पकार कांसे, मिट्टी और मोम के धागे के सहारे, ऐसी कलाकृति निर्मित करते हैं कि देखने वाला सुखद आश्चर्य में पड़ जाता है। ढोकरा शिल्प में आकृति बनाने की प्रक्रिया जटिल होती है। एक कृति बनाने में सप्ताहभर का समय लग जाता है। हर एक चरण में मिट्टी का प्रयोग होता है। ढोकरा शिल्प का प्रयोग कर सुंदर कलाकृति बनाने वाली बस्तर की खिलेन्द्री नाग बताती हैं कि सबसे पहले मिट्टी का एक ढांचा तैयार किया जाता है, जिसमें काली मिट्टी को भूसे के साथ मिलाते हैं। काली मिट्टी जब सूख जाती है तो उसके बाद लाल मिट्टी से लिपाई करते हैं। उसके बाद मधुमक्खी के छत्ते से निकले मोम का लेप लगाते हैं। सूखने के बाद मोम के पतले धागे से उस पर बारीकी से आकृतियां बनाते हैं। इस ढांचे को धूप में सुखाते हैं और फिर मिट्टी से ढक देते हैं। इसके बाद पीतल, टीन, तांबे जैसी धातुओं को हजार डिग्री सेल्सियस पर गर्म करके पिघलाते हैं। जो ढांचा सुखाया गया था उसे भी गर्म किया जाता है, जिससे मोम पिघल जाता है। ढांचे में खाली हुए स्थान पर पिघली हुई धातु को डालते हैं और फिर चार - छह घंटे ठंडा करते हैं। इस तरह से आकृति तैयार हो जाती है।

ढोकरा शिल्प में दो प्रकार की आकृतियां बनती हैं। पहली, देवी-देवताओं के शिल्प, जिनमें प्रमुख रूप से घोड़ों पर सवार देवियां है, जो हाथों में खड़ग, ढाल, अन्न की बालियां व मयूर पंख धारण किए हुए हैं। उदाहरण के लिए तेलिन माता, कंकालिन माता की मूर्ति। दूसरी, पशु आकृतियां जिनमें हाथी, घोड़े की आकृति प्रमुख है। इसके अलावा, शेर, मछली, कछुआ व मोर इत्यादि भी बनाए जाते हैं। ढोकरा शिल्प को ‘घढ़वा शिल्प’ के नाम से भी जाना जाता है। कला में तांबा, जस्ता व रांगा आदि धातुओं के मिश्रण की ढलाई करके बर्तन व दैनिक उपयोग के सामान भी बनाए जाते हैं।

ढोकरा शिल्पी, प्रांतीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपनी छाप छोड़ रहे हैं। ये शिल्पकार विभिन्न प्रदर्शनियों में शामिल होकर अपनी पहचान बना रहे हैं। कांसे से बनी विभिन्न आकृतियों को प्रदर्शनी में बेचकर ये आसानी से 100-200 रुपये का मुनाफा प्रति कलाकृति कमा लेते हैं। इन शिल्पकारों को विदेशों में भी प्रदर्शन के लिए बुलाया जा रहा है। ढोकरा शिल्पी जैसे-जैसे विभिन्न प्रदर्शनियों में भाग लेने लगे है, वैसे-वैसे अपने इन परम्परंपरागत शिल्प कला नए प्रयोग भी करने लगे हैं। कला से संबंधित बड़े वर्ग इन्हें नए प्रयोगों के लिए प्रेरित भी करते हैं।


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