लोक कलाओं को संजोने में जुटे हैं परशुराम आत्माराम गंगवाने

विभिन्न लोक कलाओं के माध्यम से भारतीय मानस की रचनात्मकता और जीवन-दृष्टि की झलक मिलती है। लोककला का एक ऐसा ही रूप है, कठपुतली नृत्य। महाराष्ट्र के सिंधु दुर्ग गांव के निवासी परशुराम आत्माराम गंगवाने इस लोक कला के संरक्षण के लिए समर्पित हैं। वह पिछले 40 सालों से कठपुतली लोक नृत्य के माध्यम से भारतीय लोककला की धरोहर को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके इस अभूतपूर्व सांस्कृतिक योगदान के लिए उन्हें इस बार पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया है।

परशुराम आत्माराम गंगवाने महाराष्ट्र के सिंधु दुर्ग जिले के निवासी हैं और कठपुतली नृत्य के माध्यम से लोक कलाओं के संवर्धन में जुटे हैं। परशुराम गंगवाने आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। पिछले 40 साल से उनकी उंगलियां कठपुतलियों के सुंदर नृत्य दिखा रही हैं। वह इतनी कुशलता से ये कठपुतली नृत्य पेश करते हैं कि देखने वाला मंत्र मुग्ध हो जाता है। कठपुतली नृत्य के माध्यम से वह सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करते बल्कि सामाजिक जागृति और शिक्षाप्रद विषयों का प्रचार-प्रसार भी करते हैं।

शिक्षा और मनोरंजन दोनों ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए परशुराम गंगवाने ने महाराष्ट्र के पिंगुली गांव में ठाकर आदिवासी कला, आंगन आर्ट गैलरी और संग्रहालय की स्थापना की है। इस आर्ट गैलरी में ठाकर आदिवासी कला के 11 अलग-अलग रूपों को प्रदर्शित किया गया है। इनमें कठपुतली नृत्य, चित्रकाठी मतलब पारंपरिक कहानियों का वर्णन करने वाले चित्रों का एक समूह, पांगुल बैल यानी बैलों का खेल और शैडो पपेट्री शामिल हैं। इस आर्ट गैलरी में परशुराम गंगवाने ने लगभग 3000 से भी अधिक दुर्लभ पेंटिंग का संग्रह भी किया है। आज यह आर्ट गैलरी देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर रही है।

कठपुतली अत्यंत प्राचीन नाटकीय खेल है जिसमें लकड़ी, धागे, प्लास्टिक या प्लास्टर ऑफ पेरिस की गुड़ियों द्वारा जीवन के प्रसंगों की अभिव्यक्ति तथा मंचन किया जाता है। चौथी शताब्दी में पाणिनी के अष्टाध्यायी में नटसूत्र में पुतला नामक नायक का उल्लेख मिलता है। चर्चित कथा सिंहासन बत्तीसी में विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों का उल्लेख मिलता है। वर्तमान में भारत में धागा पुतली, छड़ पुतली, छाया पुतली और पवाकूथु बहुत प्रसिद्ध है।


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