ऐसे संभव है भारत में ‘चीनी’ सामानों का बहिष्कार

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान के कुछ विद्यार्थी यूरोप के एक विश्वविद्यालय में पढ़ते थे। जाहिर है, वे काफी सक्षम घरों के बच्चे थे। लेकिन, वे अपने काम में आने वाली स्टेशनरी जापान में बनी हुई ही प्रयोग में लाते थे। हालांकि, तब उनकी गुणवत्ता बेहद खराब होती थी। युद्ध में बुरी तरह पराजित जापान तब अपने पुनर्निमाण के काम में जुटा हुआ था। एक बार जब साथ के यूरोपियन छात्रों ने पूछा कि वे बेहतर क्वालिटी की स्टेशनरी आसानी से उपलब्ध होने के बावजूद इतनी खराब गुणवत्ता की स्टेशनरी क्यों प्रयोग में लाते हैं? तो, उन्होंने जवाब दिया कि बेशक ये स्टेशनरी बहुत खराब है और इसे प्रयोग में लाने में भी बहुत परेशानी होती है, लेकिन इसका निर्माण जापानी लोग करते हैं। अगर कम से कम जापानी ही इन चीजों का प्रयोग कर लेंगे तो कई जापानी घरों को पर्याप्त रोजगार मिल जाएगा। आज इतिहास गवाह है कि जापान की आर्थिक यात्रा अब तक कहां पहुंच चुकी है।

हालिया चीनी अतिक्रमण के बाद भारत में इस मसले पर बहस हो रही है कि क्या यहां चीन में बने सामानों का बहिष्कार किया जा सकता है?

निश्चित रूप से, सरकारी आर्थिक नीतियों में एक बड़ी चूक हुई है। दूसरे देशों के लिए अपने देश को खोल देने की होड़ और अफरातफरी में अपने यहां के पारंपरिक रोजगार उजड़ते चले गए और हम लोग उन्हें उजड़ता देखते रहे। देसी भगवानों की विदेशों में बनी मूर्तियों की भी हम हंसते-मुस्कराते पूजा करते ही रहे। परिणाम अब सामने है, लेकिन जब जागो तभी सवेरा...।

आज के दिन भी हम सब एकजुट होकर इस परिस्थिति का सामना कर सकते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि जब देश में विदेशी सामान को आयात करने की इजाजत है तो घरेलू स्तर पर इस तरह के प्रतिरोध से क्या हासिल होगा? लेकिन कुछ तो हासिल जरूर होगा। इसे जानने के लिए पहले हमें इस तंत्र को भलीभांति समझना होगा।

वस्तुओं के आयात व निर्यात के मामलों में विश्व व्यापार संगठन व कई दूसरे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रोटोकॉल निर्धारित हैं। कई द्विपक्षीय व बहुपक्षीय समझौतों के तहत नियम, दिशा-निर्देश और नीतियां तय की गई हैं, जो किसी न किसी तरह सभी देशों ने मिलकर बनाई हैं। उनका पालन करना होता है। ऐसे में किसी देश के साथ आयात या निर्यात को बिल्कुल भी बंद कर दिया जाना असंभव तो नहीं लेकिन मुश्किल जरूर होता है। चीन के साथ निर्यात की तुलना में आयात ज्यादा है। इसको संतुलन में लाने की कवायद में भारत सरकार हमेशा से जुटी रही है लेकिन चीन के असहयोगी व एकतरफा रवैये से इसे हमेशा चोट ही पहुंचती रही है। तो फिर उपाय क्या है...?

इन परिस्थितियों में भारत चीन के सामानों पर आयात शुल्क बढ़ाकर उन्हें महंगा कर सकता है। मलेशिया से पाम तेल मंगाने के मामले में इस तरीके को आजमाया जा चुका है। भारत के आयात शुल्क बढ़ा देने से वहां के कुटीर उद्योगों का पूरा एक और मुख्य सेक्टर धराशायी हो गया। और, उन लोगों को न केवल अपनी विदेश नीति में आमूलचूल परिवर्तन करने पड़े, बल्कि 94 साल के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद को भी अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी।

मलेशिया में दोहराया गया प्रयोग अब नेपाल में आजमाने की योजना बनती दिख रही है। वहां से कई इस तरह की खबरें आ रही हैं कि नेपाल में नमक लगातार महंगा होता जा रहा है। संभवत: फिलहाल यह 80 नेपाली रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर पहुंच गया है। भारत के रुपये में यह करीब 50 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पड़ेगा। इसके चलते अगर मलेशिया की तरह नेपाल की विदेश नीति में भी जल्दी ही एक बड़ा ट्विस्ट आपको देखने को मिले तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। ध्यान रहे, नेपाल के आसपास समुद्र नहीं है, वहां भारत ही अब तक सबसे ज्यादा नमक भेजता रहा है।

इससे पहले, पाकिस्तान के साथ भी भारत का यही रुख रहा था। इसी मोदी सरकार ने पुलवामा हमले के बाद आयात पर लगने वाले शुल्क में 200 फीसदी तक की वृद्धि कर दी थी। उनके सूखे मेवे, टमाटर, प्याज आदि जरूरी सामान से लदे ट्रकों का सीमा पर क्या हाल हुआ था, सभी को जरूर याद होगा।

ऐसे ही चीनी वस्तुओं का आयात पूरी तरह से तो नहीं रोका जा सकता है, लेकिन आयातित वस्तुओं को एक सीमा तक महंगा जरूर किया जा सकता है। इससे लोग दूसरे सस्ते और बेहतर गुणवत्ता के सामान की ओर उन्मुख होंगे। यह एक रास्ता है। हमें यह जरूर जान लेना चाहिए कि श्वेत-श्याम कुछ भी नहीं होता है। धूसर रंग हमेशा संतुलन की राह दिखाता है।


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