... कुल जमा 300 लोग एनडीटीवी से निकाले गए, मल्लिकार्जुन खड़गे नहीं 'खड़के'...; 300 लोग दैनिक जागरण से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के; 250 लोग टाइम्स ऑफ इंडिया से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के...; करीब इतने ही लोग हिंदुस्तान टाइम्स से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के; 700 लोग सहारा इंडिया और अन्य मीडिया संस्थानों से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के...; नरेंद्र मोदी शासन में 5000 से ज्यादा छोटे और मझोले अखबार बंद हो गए और हजारों मीडियाकर्मी बेरोजगार हुए, खड़गे तब भी नहीं खड़के...। अब ऐसा क्या हुआ कि तीन 'खास' मीडियाकर्मियों को जब 'उनके' संस्थानों ने निकाला तो खड़गे न सिर्फ 'खड़के' बल्कि खूब जोर से 'भड़के' भी...???!!!

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देश में नई अप्रत्‍यक्ष कर प्रणाली ‘वस्‍तु एवं सेवा कर' (जीएसटी) को लागू किए जाने के बाद एक साल की अवधि पूरी हो चुकी है। इस एकल टैक्‍स ने उन 17 करों और अनगिनत उपकरों (सेस) का स्‍थान लिया है जिन्हें केन्‍द्र एवं राज्‍य सरकारों ने लागू किया था। इससे पहले देश में अत्‍यंत जटिल कर प्रणाली लागू थी क्‍योंकि प्रत्‍येक करदाता को तरह-तरह के रिटर्न भरने पड़ते थे, उन्‍हें कई इंस्‍पेक्‍टरों एवं कर निर्धारण अधिकारियों का सामना करना पड़ता था, अपने किसी भी उत्‍पाद की आवाजाही होने पर प्रत्‍येक राज्‍य में अलग से टैक्‍स अदा करना पड़ता था और तरह-तरह की बाधाओं का सामना करने पर करदाता टैक्‍स अदायगी से बचने के उपाय ढूंढ़ने लगता था। जीएसटी का आधारभूत विचार मौलिक नहीं था। दुनिया के कई देशों में प्रयोग के तौर पर इसे लागू किया जा चुका है। अनेक तथ्‍यों को ध्‍यान में रखते हुए ही भारतीय मॉडल को विकसित करना जरूरी था। भारत राज्‍यों का एक ऐसा संघ है, जिसमें केन्‍द्र और राज्‍यों दोनों को ही राजकोषीय अथवा वित्‍तीय दृष्टि से सुदृढ़ होना अत्‍यंत जरूरी है। भारत राज्‍यों का परिसंघ नहीं है, इसलिए केन्‍द्र सरकार के राजस्‍व की कीमत पर राज्‍यों की राजस्‍व स्थिति को सुदृढ़ नहीं किया जा सकता है। यदि केन्‍द्र का ही अस्तित्‍व बरकरार नहीं रह पाएगा, तो ‘भारत’ यानी राज्‍यों के संघ का क्‍या होगा?

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एक फाउंडेशन द्वारा किया गया जनमत सर्वेक्षण-महिलाओं के लिए विश्व के सबसे खतरनाक देश 2018-आंकड़ों पर नहीं बल्कि अज्ञात व्यक्तियों की अवधारणाओं पर आधारित है।

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आज के दौर में, और शायद पहले भी, पत्रकारिता और राजनीति एक दूसरे के साथ समानांतर चलते प्रतीत होते हैं। हालांकि, पत्रकारिता का क्षेत्र राजनीति से कहीं ज्यादा बड़ा है। पत्रकारिता की भाषा में कहें तो राजनीति महज एक ‘बीट’ है लेकिन हमारे देश में चूंकि राजनीति ही सबसे बड़ा ‘रुचि’ का विषय है तो पत्रकारिता में राजनीति ही छायी रहती है।

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घरेलू काम काज मे हाथ बंटाकर रोजी-रोटी कमाने वाली 28 साल की पार्वती किताब, अखबार को हसरत से देखती है, पढ़ना उसके लिए सपना है। पार्वती निरक्षर है, अलबत्ता उसके दो भाई कॉलेज मे स्नातकोत्तर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उसकी लगभग 50 साल की मां सावित्री भी निरक्षर है, सावित्री बताती है कि उसकी मां ने भी कभी पढ़ाई नहीं की। मां बताती है कि उसका पति और पार्वती का पति कुछ पढ़े-लिखे जरूर हैं। पिता की पहली वाली पुरुषो की पीढ़ी अनपढ़ ही थी लेकिन अब पार्वती के बेटे के साथ उसकी नौ साल की बेटी एक अच्छे स्कूल मे पढ़ती है। अब पार्वती का सपना है कि बड़ी होकर उसकी बेटी 'बड़े घरों की मेडमों' जैसी नौकरी करे, अपनी गाड़ी खुद चलाए और जब उसका मन हो शादी करे ताकि उस के बच्चे अनपढ मां की संतानें नहीं हों। जब उसे सुझाव दिया जाता है कि 'बच्ची के साथ तुम भी पढ़ो' तो उसके चेहरे पर उदासी तैरने लगती है। मद्धिम सी आवाज मे बुदबुदाती है... "अब कहां पढ़ पाऊंगी?"

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ब्रिटिश हुकूमत का मतलब क्या था यह उस समय के आंदोलन के इतिहास के एक अंश से समझा जा सकता है। महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा“ हमें अनुभव होता हो या न होता हो, कुछ दिन से हम पर एक प्रकार का फौजी शासन हो रहा है। फौजों का शासन आखिर है क्या? यही कि सैनिक अफसर की मर्जी ही कानून बन जाती है और वह चाहे साधारण कानून को ताक पर रखकर विशेष आज्ञाएं लाद देता है और जनता बेचारी में उनके विरोध करने का दम नहीं होता, पर मैं आशा करता हूं, वे दिन जाते रहे कि अंग्रेज शासकों के फरमानों के आगे हम चुपचाप सिर झुका दें...”

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