एक ज़माना था जब हिंदुस्तान में टीवी का मतलब सिर्फ दूरदर्शन होता था। एक चैनल, एक आवाज़, एक शाम। रिमोट का आतंक नहीं, मोबाइल की घंटी नहीं, रील-शॉर्ट नाम की कोई आफ़त नहीं। पूरा परिवार एक ही कमरे में बैठता था; कभी फर्श पर, कभी सोफे पर, और जब विज्ञापन भी आता तो कोई पानी लेने भी नहीं उठता था। कई बार विज्ञापन ही कार्यक्रम से ज़्यादा याद रह जाते थे...
Read More




