साहित्य / मीडिया

एक ज़माना था जब हिंदुस्तान में टीवी का मतलब सिर्फ दूरदर्शन होता था। एक चैनल, एक आवाज़, एक शाम। रिमोट का आतंक नहीं, मोबाइल की घंटी नहीं, रील-शॉर्ट नाम की कोई आफ़त नहीं। पूरा परिवार एक ही कमरे में बैठता था; कभी फर्श पर, कभी सोफे पर, और जब विज्ञापन भी आता तो कोई पानी लेने भी नहीं उठता था। कई बार विज्ञापन ही कार्यक्रम से ज़्यादा याद रह जाते थे...

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मास कम्युनिकेशन में इसे सहभागी संचार की दृष्टि से देखा जा सकता है। मोदी की संचार शैली केवल तत्काल संकटों तक सीमित नहीं रही। बाद में यही तकनीक दीर्घकालीन लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल हुई।

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अमेरिका सपनों की धरती है। कम-से-कम विज्ञापन यही कहते हैं। वहां सपने डॉलर में आते हैं और कभी-कभी उनकी ईएमआई जिंदगीभर चुकानी पड़ती है।

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साल 1455 में जब योहानेस गुटेनबर्ग ने चल अक्षरों वाली मुद्रण मशीन का आविष्कार किया, तब शायद उन्हें भी अंदाज़ा नहीं था कि एक दिन किताबें छापना इतना आसान हो जाएगा कि हर लेखक स्वयं का प्रकाशक बन सकेगा। गुटेनबर्ग के छापाखाने ने ज्ञान को राजमहलों और मठों की दीवारों से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाया। अब, लगभग साढ़े पांच सौ वर्ष बाद, स्व-प्रकाशन उसी क्रांति को एक नए मुकाम पर ले गया है।

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भारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता और राजनीति का रिश्ता हमेशा से बहस का विषय रहा है। पत्रकारिता का धर्म है, सत्ता से सवाल करना और जनता के हित में सच को सामने रखना, जबकि राजनीति का धर्म है सत्ता प्राप्त करना और उसे बनाए रखना। इन दोनों के बीच का टकराव और सहयोग ही लोकतंत्र की असली धड़कन है...

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ज़रा सोचिए। अगर कल सुबह कोई सरकार कह दे कि अब नमक खरीदना भी अमीरों का शौक़ होगा, तो क्या होगा? दाल बेस्वाद हो जाएगी। रोटी गले से नहीं उतरेगी। गरीब की थाली और भी सूनी हो जाएगी...

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