पर्यटन

हवा महल के आसपास की हलचल से आगे बढ़ते हुए जब जयपुर के जंतर-मंतर में प्रवेश किया तो वातावरण कुछ अलग लगा। सामने फैली ज्यामितीय आकृतियां, ऊंची दीवारें, कोण बनाती संरचनाएं और विशाल चाप मन में स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा करते हैं। यह कोई पारंपरिक महल या मंदिर नहीं है, फिर भी पूरा परिसर अपने आप में असाधारण दिखाई देता है...

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यूरोप की मेरी हाल की यात्रा को अगर एक शब्द में बांधना हो, तो वह शब्द होगा, ‘पानी’। मैंने वहां आधा दर्जन से ज़्यादा नदियां, नहरें और झीलें नज़दीक से देखीं। कभी क्रूज़ पर बैठकर, कभी फेरी में, कभी पुल से झांककर और कभी किनारे बैठकर। नाविकों, फेरीवालों, क्रूज़ मैनेजरों और गोंडोला चलाने वालों से बातें कीं। किनारे बैठे आम लोग भी देखे, जो दोपहर की सुनहरी धूप में नदी को निहार रहे थे, बातें कर रहे थे या बस ज़िंदगी को थोड़ी देर आराम दे रहे थे।

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यूरोप जीतने निकले थे। कुछ ही दिनों के बाद पता चला कि यूरोप जीतना तो दूर, अपने घुटनों को मनाना ही बड़ी जीत है।

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आखिर कोई देश दिल्ली की एक कॉलोनी से भी छोटा होकर अपना राजकुमार, अपनी सरहदें, अपनी हुकूमत और इतना राष्ट्राभिमान कैसे रख सकता है कि उसका झंडा भी कभी-कभी शरमा जाए...

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झरना गरज रहा था। नाव झूम रही थी। और, तभी एक सीढ़ी ने हमारे घुटनों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया! हम स्विट्ज़रलैंड के शाफहाउज़ेन के पास शानदार राइन फॉल्स देखने आए थे। सोचा था शांतिपूर्ण नाव की सैर होगी। लेकिन, देखते-देखते यह सफर रोमांच, सीढ़ियों की चढ़ाई, यातायात की उलझन और आखिर में बचाव अभियान में बदल गया। और इस पूरे अभियान में हमारे साथ थीं, लेडी मार्था, चाय और समोसे!

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हमारी आरामदेह टूरिस्ट बस ने एक ही दिन में फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड के किनारे पार किए। रात तक हम जर्मनी के फ्रैंकफर्ट पहुंच चुके थे। न टैंक, न सैनिक, बस कैमरा, नाश्ता, गूगल मैप और उत्सुक भारतीय वरिष्ठ नागरिकों का एक जत्था...

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पेरिस ने हमारा स्वागत नहीं किया बल्कि उसने पहले हमारा इम्तिहान लिया। यहां उतरते ही लगा कि हम किसी दूसरे ग्रह पर आ गए हैं। भाषा फ्रेंच थी, इमारतें बेहद सलीकेदार थीं, लोग फैशनेबल दिख रहे थे और ट्रैफिक ऐसा था जैसे सड़क पर कोई मुकाबला चल रहा हो। मौसम ने भी अपना अलग ही मिज़ाज दिखाया। कुल मिलाकर शहर नहीं बदला था, पूरी दुनिया बदल गई थी। और, फिर आया यूरोस्टार...

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क्या लंदन सिर्फ बिग बेन, बकिंघम पैलेस और टेम्स का नाम है? चंद रोज़ वहां बिताने के बाद लगा कि लंदन की असली कहानी पत्थरों की इमारतों में नहीं, उन लोगों में छिपी है जो इन इमारतों के बीच अपनी जिंदगी जी रहे हैं...

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दो दिन पहले, 9/11 की बरसी थी। अमेरिका में शोक और स्मृति के कार्यक्रम आयोजित किए गए। ब्रिटेन में भी कई आयोजन हुए। दुनिया उस भयावह दिन को अब भी नहीं भूली है, जब कुछ विमानों ने केवल इमारतों को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के आत्मविश्वास को हिला दिया था। आतंकवाद खत्म करने के लिए आखिर दुनिया को और कितने 9/11 चाहिए?

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भारतीय रेलवे ने देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन पटरी पर उतार दी है। यह ट्रेन सबसे स्वच्छ ईंधन हाइड्रोजन का उपयोग करके स्वयं बिजली उत्पन्न करती है। उपयोग के समय इससे लगभग शून्य उत्सर्जन होता है। यह उपलब्धि भारतीय रेलवे द्वारा ट्रेनों को चलाने के तरीके में हुए विकास का एक नया अध्याय है, जो कोयले और भाप से स्वच्छ, अधिक टिकाऊ ऊर्जा स्रोतों की ओर भारत की व्यापक यात्रा को दर्शाता है...

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