देश

जयति जयति भारत माता! कितना सरल, कितना मधुर और कितना भारतीय उद्घोष है। फिर सवाल उठता है, आज़ादी के बाद जब देश अपनी नई पहचान तलाश रहा था, तब ऐसा सुंदर संस्कृत गीत राष्ट्रीय मंच तक क्यों नहीं पहुंच पाया...

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किसी भी मुल्क की सियासत में बदलाव ज़रूरी है, लेकिन हर बदलाव बेहतर हो, यह ज़रूरी नहीं। कभी-कभी जो व्यवस्था मुश्किलों के बावजूद स्थिर हो गई हो, उसे अचानक बदलना खुद एक बड़ा जोखिम बन जाता है। भारत के लिए 2014 के बाद का दौर इसी सवाल को बार-बार उठाता है। क्या निरंतरता को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाए कि बदलाव आकर्षक लगता है...

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देश भ्रमण के अनेक फायदे हैं। कूपमंडूकता और कई दृष्टि-भ्रम रास्ते में ही टूट जाते हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम निकलें, तो बहुत से पूर्वाग्रह अपने आप ध्वस्त होते चलते हैं...

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कर्नाटक के आसमान में बादल तो नहीं थे, पर सरकार की तैयारी पूरी थी। एक टीम ने विमान और मौसम विज्ञान की तरफ देखा; दूसरी टीम ने मंदिर, पवित्र अग्नि और मंत्रों की ओर। अजीब! पर दोनों सरकारी जवाब थे...

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कल्पना कीजिए, श्याम बेनेगल की मशहूर फिल्म ‘अंकुर’ का वह आखिरी दृश्य। गांव का एक छोटा लड़का सब कुछ चुपचाप देख रहा है- जमींदार की हुकूमत, गरीबों की बेबसी और अन्याय का खेल। फिर अचानक वह एक पत्थर उठाता है। पत्थर हवेली की ओर उछलता है। स्क्रीन लाल हो जाती है। एक छोटा-सा पत्थर, मगर उसके भीतर बगावत का एक बड़ा बीज छिपा है। आज 2026 के भारत में वही दृश्य फिर याद आता है।

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कितनी बार एक औरत को बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सुनेगी? कितनी सुर्खियां चीखेंगी, तब किसी ताकतवर आदमी से कथित यौन अपराध का हिसाब मांगा जाएगा?

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