संपादकीय

भारत की राजनीति में विचारधाराएं अब जाति के आगे नतमस्तक हैं। कम्युनिस्ट आंदोलन इतिहास बन चुके हैं, राष्ट्रवाद थका हुआ दिखता है, और धर्म की अफीम भी जातीय दीवारों को ढहाने में असमर्थ रही है। जाति अब भारतीय समाज की आत्मा में गहराई तक समा चुकी है...

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भारत में कुल 2,827 राजनीतिक पार्टियां पंजीकृत हैं, जिनमें छह राष्ट्रीय, 58 राज्य, और 2,763 गैर-मान्यता प्राप्त दल शामिल हैं। यह आंकड़ा चुनाव आयोग की 23 मार्च 2024 की रिपोर्ट का है। इस साल जनवरी में जनसेना को राज्य पार्टी का दर्जा मिलने के बाद इस सूची में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। इतनी पार्टियों के बावजूद सवाल वही है, लोकतंत्र की शुचिता बार-बार क्यों लांछित होती है...

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एक ज़माना था जब विश्वविद्यालयों के कैंपस गूंज उठते थे—"इंकलाब जिंदाबाद!", "हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के!" के नारों से। विश्वविद्यालयों की दीवारें सिर्फ पत्थर नहीं, विचारों की आग से लाल होती थीं। बीएचयू, इलाहाबाद, दिल्ली, लखनऊ—हर कैंपस में बहसें होती थीं, छात्र नेताओं के भाषणों में आग होती थी। आज? सन्नाटा। सिर्फ फुसफुसाहटें। क्या हमारा लोकतंत्र सो गया है?

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नेपाल, बांग्लादेश और कई वर्ष पहले मिस्र में हुए छात्र आंदोलनों ने सत्ता पलट दी। हश्र यह हुआ कि वहां अभी तक लोकतंत्र मजबूती नहीं दिखा सका है। तो, क्या वजह हैं जो भारत, अमेरिका आदि देशों में लोकतंत्र इतना मजबूत है...

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पता नहीं आइपीएस अधिकारियों को ट्रेनिंग के दौरान भीड़ प्रबंधन पढ़ाया जाता है या नहीं, लेकिन बेंगलुरु जैसे हाईटेक सिटी में भगदड़ से हुई मौतों को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर कुछ सवाल उठना जायज़ ही नहीं समय की मांग हैं।

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जून में हुए लोकसभा चुनावों में हार के बाद, क्या सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में वांछित राजनीतिक लाभ प्राप्त करते हुए अपने कथानक और रणनीति में सुधार किया है? क्या आने वाले दिल्ली चुनावों में ध्रुवीकरण का नया मंत्र, ‘बटेंगे तो कटेंगे’ और भी धारदार और सटीक होगा, और भाजपा के लिए फायदे का सौदा बनेगा...

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