प्रसिद्ध प्रकृति वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन एक दिन अपने किसी दोस्त के साथ चिड़ियाघर देखने गए। बातचीत के दरम्यान उन्होंने अपने मित्र से कहा कि मनुष्य की विचारशक्ति उसकी सहज वृत्ति से कही अधिक शक्तिशाली होती है।
उनका मित्र इस बात से सहमत नहीं था। वह उनसे अपनी बात मनवाने का प्रयास कर ही रहे थे, कि वे सांपों के बाड़े तक पहुंच गए। मोटे शीशे में बंद सांपों को डार्विन निहारने लगे। एक बाड़े के काफी नजदीक तक डार्विन ने अपना चेहरा कर लिया। एक विषैले सांप को शायद यह अच्छा नहीं लगा अत: सांप ने जोर से शीशे पर फुंफकार मारी। हालांकि, डार्विन को भली भांति ज्ञान था कि मोटा शीशा आसानी से टूटने वाला नहीं था, फिर भी वह तत्काल पीछे हट गए।
उनका मित्र बोला, ''अब तो आपको मेरी असहमति का प्रमाण-पत्र मिल गया न।''
डार्विन विवश हो गए थे। उन्होंने ‘हां’ में सिर हिलाया और स्वीकार किया अभी कुछ देर पूर्व किया गया उनका स्वकथन ठीक नहीं था।

समीक्षा भारती न्यूज सर्विस





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