गांधारी व दुर्वासा का शाप बना कृष्ण और यदुवंश के विनाश की वजह

भगवान कृष्ण की जीवनी हमेशा रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी रही है। उनकी कहानी हमें बताती है कि मानवीय जीवन कितने उतार-चढ़ावों से भरा हुआ है। हर क्षण और हर दौर में साम, दाम, दंड और भेद के अनुपालन से कैसे धर्म की रक्षा की जाए, इस सवाल का जवाब हमें कृष्ण की गाथा में मिलता है।

यह सब जानते हैं कि द्वापर युग में मथुरा के राजा उग्रसेन थे। उनके पुत्र का नाम कंस और पुत्री का नाम देवकी था। देवकी का विवाह वसुदेव के साथ हुआ। देवकी की विदाई के समय कंस ने एक आकाशवाणी सुनी कि उसकी प्रिय बहन के आठवें पुत्र द्वारा वह मारा जाएगा। इससे बचने के लिए कंस ने देवकी और वसुदेव के साथ-साथ अपने पिता को भी कारागार में डाल दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा।

इधर, भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के दौरान मध्यरात्रि को कृष्ण का जन्म हुआ। जब कृष्ण का जन्म हुआ तब कारागृह के द्वार स्वतः ही खुल गए और सभी सिपाही निंद्रा में खो गए। वसुदेव के हाथों में लगी बेड़िया खुल गईं और वह अपने नवजात पुत्र की जान को हर हाल में बचाने के लिए भरी बारिश में कारागार से बाहर निकल पड़े।

उधर, गोकुल में वसुदेव के मित्र नन्द की पत्नी यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ। वसुदेव अपने पुत्र को यशोदा के पास रखकर, उनकी नवजात पुत्री को लेकर मथुरा की उसी कारागार में वापस लौट आए।

जब कंस उस कन्या को देवकी की आठवीं संतान समझकर मारने का प्रयास कर रहा था, तब वह शिशु बालिका देवी दुर्गा के अवतार योगमाया के रूप में प्रकट हुई, और उसे चेतावनी देती है कि उसकी मृत्यु उसके बहुत निकट आ चुकी है।

कृष्ण के एक बहन और एक भाई थे। कृष्ण भगवान भाई का नाम बलराम और बहन का नाम सुभद्रा था। अपने जन्म के कुछ समय बाद ही कंस द्वारा भेजी गई राक्षसी पूतना का उन्होंने वध किया। उसके बाद शकटासुर, तृणावर्त आदि कई राक्षसों का उन्होंने वध किया। बाद में कृष्ण गोकुल छोड़कर नंद गांव आ गए वहां पर भी उन्होंने कई लीलाएं की जिनमें गोचारण लीला, गोवर्धन लीला व रास लीला आदि मुख्य हैं।

भगवान कृष्ण अपनी प्रिय सखी राधा के साथ ज्यादातर समय बिताना पसंद करते थे। राधा-कृष्ण का प्रेम ऐसा था, जिसकी आज भी मिसाल दी जाती है। लेकिन, कृष्ण ने राधा से विवाह नहीं किया। राधा व कृष्ण के वियोग के समय राधा की आयु 12 वर्ष एवं कृष्ण की आयु आठ वर्ष थी। राधा और कृष्ण के प्रेम का स्वरूप शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक था। राधा और कृष्ण जब आखिरी बार मिले तो राधा ने कृष्ण से कहा था कि भले ही वह उनसे दूर जा रहे हैं, लेकिन मन से कृष्ण हमेशा उनके साथ ही रहेंगे।

अक्रूरजी के आग्रह पर कृष्ण व बलराम मथुरा आए, जहां कंस ने कृष्ण के प्राणान्त की योजना बना रखी थी। श्रीकृष्ण ने इसी दौरान अपने मामा कंस का वध किया और मथुरावासियों को उसके आतंक से मुक्त कराया। तत्पश्चात, श्रीकृष्ण ने अपने नाना उग्रसेन को मथुरा का राजा बनाया और जेल में बंद अपने माता-पिता को रिहा कराया।

कंस वध के बाद उनके पिता वसुदेव ने दोनों भाइयों कृष्ण और बलराम को शिक्षा-दीक्षा के लिए उज्जैन स्थित संदीपन आश्रम भेज दिया। आश्रम में दोनों भाइयों ने शस्त्र-अस्त्र के साथ शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। आश्रम में ही कृष्ण भगवान की मुलाकात सुदामा से हुई। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती के किस्से काफी सुने जाते हैं। लोग उनकी दोस्ती की मिसाल देते हैं।

सुदामा गरीब ब्राह्मण परिवार से थे। अपने बच्चों का पेट भरना भी उनके लिए मुश्किल हो गया था। एक दिन सुदामा की पत्‍नी ने कहा कि “हम भले ही भूखे रहें, लेकिन बच्चों का पेट तो भरना चाहिए न?” इतना बोलते-बोलते उसकी आंखों में आंसू आ गए। ऐसा देखकर सुदामा बहुत दुखी हुए और पत्नी से इसका उपाय पूछा।

पत्नी ने सुदामा से कहा, “आप कई बार कहते हो कृष्ण के साथ आपकी बहुत मित्रता है। वह तो द्वारिका के राजा हैं। आपको उनसे मिलने के लिए जाना चाहिए। आपकी हालत देखकर वह कुछ न कुछ मदद जरूर करेंगे। बड़ी मुश्किल से सुदामा कृष्ण के साथ मिलने के लिए तैयार हुए। तब सुदामा ने दरिद्रता के चलते खाली हाथ जाने में संकेच दिखाया तो उनकी पत्नी ने पड़ोस से चार मुट्ठी चावल मांगकर सुदामा को एक पोटली में बांध कर दे दिया।

सुदामा जब द्वारिका पहुंचे तो वहां सोने की नगरी देखकर हैरान रह गए। उनके आगमन का संदेश सुनकर भगवान कृष्ण नंगे पांव सुदामा की अगवानी के लिए दौड़ पड़े। कृष्ण ने सुदामा से पूछा कि भाभी ने उनके लिए क्या भेजा है? तब सुदामा संकोच में पड़ गए और चावल की पोटली छुपाने लगे। ऐसा देखकर कृष्ण ने उनसे चावल की पोटली छीन ली और सूखे चावल ही खाने लगे।

सुदामा संकोचवश कुछ मांग नहीं सके। सुदामा जब अपने घर लौटने लगे तो सोचने लगे कि पत्नी पूछेगी कि क्या लाए हो तो वह क्या जवाब देंगे। लेकिन, सुदामा जब घर वापस पहुंचे तो देखा कि वहां उनकी झोपड़ी की जगह पर एक राजमहल खड़ा है। तभी राजमहल से उनकी पत्नी बाहर आईं और सुदामा को बताया कि उनके मित्र ने उनकी गरीबी दूर कर सारे दुःख हर लिए हैं।

एक समय आया जब भगवान कृष्ण ने जरासंध से तंग आकर मथुरा छोड़ दिया और द्वारिका में एक नया नगर बसाया। अनेक द्वारों का शहर होने के कारण इस नगर का नाम द्वारिका रखा गया था।

श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी थी। रुक्मिणी अपनी बुद्धिमत्ता, सौंदर्य और न्यायप्रिय व्यवहार के लिए प्रसिद्ध थीं। रुक्मिणी का पूरा बचपन श्रीकृष्ण के साहस और वीरता की कहानियां सुनते हुए बीता था। इसके चलते रुक्मिणी को कृष्ण से प्रेम हो गया। वह विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री थी। रुक्मिणी के भाई का नाम रुक्मि था और वह अपनी बहन का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था। रुक्मिणी ने अपनी सखी सुनन्दा के हाथ प्रेमपत्र लिखकर श्रीकृष्ण के पास भेजा। जब उन्हें रुक्मिणी का यह पत्र मिला तो उन्हें समझ आया कि रुक्मिणी संकट में हैं। तब कृष्‍ण ने रुक्मिणी का हरण कर उनके साथ विवाह किया।

इसके बाद, भगवान श्री कृष्ण ने सत्यभामा, जामवंती, कालिंदी, मित्रवृंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा से भी विवाह किया। ऐसा कहा जाता है श्रीकृष्ण की रानियों की संख्या सोलह हजार से अधिक थीं। इनमें से ज्यादातर रानियां उनके द्वारा किसी न किसी कष्ट से मुक्त कराई गईं रानियां या राजकुमारियां थीं। उन्होंने नरकासुर की कारागार से मुक्त कराई सोलह हजार से अधिक कन्याओं संग विवाह जरूर किया, किन्तु उन्हें अर्द्धांगिनी रूप में स्वीकार नहीं किया था। वहीं, इन कन्याओं ने भगवान श्रीकृष्ण को पति स्वरूप में स्वीकार किया और वे सभी द्वारिका में आजीवन भगवान की भक्ति कर जीवन यापन करती रहीं।

इससे पहले, महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण पांडवों के पक्ष में थे। इस युद्ध में श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने। युद्ध में पांडव और कौरवों का आमना-सामना हुआ। 18 दिन तक चले युद्ध में जीत अंतत: पांडवों की हुई। पीतांबरधारी चक्रधर भगवान कृष्ण महाभारत युद्ध में सारथी की भूमिका में थे। उन्होंने अपनी यह भूमिका का चयन स्वयं किया। सुदर्शन चक्र से समस्त सृष्टि को क्षणभर में मुट्ठीभर राख बनाकर उड़ा देने वाले या फिर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता भगवान कृष्ण महाभारत में अपने प्रिय सखा धनुर्धर अर्जुन के सारथी बने। युद्ध के दौरान कृष्ण और अर्जुन के बीच का संवाद भगवद् गीता नामक एक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

महाभारत युद्ध के अंत में, दुर्योधन के कहने पर अश्वत्थामा ने नींद में सोते सभी पांडव पुत्रों को धोखे से मार दिया तो पांडव और कृष्ण उसका पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम में पहुंचे। तब अश्वत्थामा ने पांडवों पर ब्रह्मास्त्र से आक्रमण किया। यह देखकर अर्जुन ने भी अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। महर्षि व्यास ने विनाश रोकने के लिए दोनों ब्रह्मास्त्र को टकराने से रोकने के लिए अश्वत्थामा और अर्जुन को अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस लेने को कहा। अर्जुन ने तो अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ने अपने ब्रह्मास्त्र की दिशा अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भाशय की ओर मोड़ दी। यह देखकर भगवान कृष्ण क्रोधित हो गए। अपनी सुदर्शन चक्र से अश्वत्थामा के माथे पर लगी मणि को निकाल लिया, जिससे उसके माथे पर एक घाव हो गया और कृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि वह मृत्यु से मुक्त होकर इस धरती पर भटकता रहेगा।

महाभारत युद्ध के बाद जब हस्तिनापुर में युधिष्ठिर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया कि जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है, ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा।

महाभारत युद्ध के लगभग 35 वर्ष बाद तक द्वारिका बहुत ही शांत और खुशहाल राज्य रहा। धीरे-धीरे श्रीकृष्ण के पुत्र बहुत शक्तिशाली हो गए और इस प्रकार पूरा यदुवंश बहुत शक्तिशाली हो गया। कहा जाता है कि एक बार श्री कृष्ण के बेटे साम्ब ने चंचलता के प्रभाव में ऋषि दुर्वासा का अपमान कर दिया। ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गए और उन्होंने यदु वंश को नष्ट करने के लिए सांब को शाप दिया। द्वारिका में अब शक्तिशाली होने के साथ-साथ पाप और अपराध भी व्याप्त हो गए थे। अपनी प्रसन्न द्वारिका में ऐसा वातावरण देखकर श्रीकृष्ण बहुत दुखी हुए। उन्होंने अपनी प्रजा को प्रभास नदी के तट पर जाने और अपने पापों से छुटकारा पाने की सलाह दी। उसके बाद सभी लोग प्रभास नदी के तट पर चले गए लेकिन ऋषि दुर्वासा के शाप के कारण सभी लोग वहां नशे में धुत हो गए और आपस में बहस करने लगे। विवाद शुरू हुआ उनके विवाद ने एक गृहयुद्ध का रूप ले लिया जिसने पूरे यदुवंश को नष्ट कर दिया।

यादवों के आपसी युद्ध में चार प्रमुख व्यक्तियों ने भाग नहीं लिया, जिससे वे बच गए। ये चारों कृष्ण, बलराम, दारुक सारथी और वभ्रु थे। बलराम दु:खी होकर समुद्र की ओर चले गए और वहां से फिर उनका पता नहीं चला। कृष्ण बड़े मर्माहत हुए। वह द्वारिका से दूर जंगल में गए और दारुक को अर्जुन के पास भेजा गया और उसे निर्देश दिया गया कि वह वहां से स्त्री-बच्चों को हस्तिनापुर ले जाए। कुछ स्त्रियों ने जलकर प्राण दे दिए। अर्जुन आए और शेष स्त्री-बच्चों को अपने साथ ले गए। कहा जाता है कि मार्ग में पश्चिमी राजपूताना के जंगली आभीरों से अर्जुन को मुक़ाबला करना पड़ा। कुछ स्त्रियों को आभीरों ने लूट लिया। शेष को अर्जुन ने शाल्व देश और कुरु देश में बसा दिया। कृष्ण शोकाकुल होकर घने वन में पहले ही चले गए थे। ऐसे ही एक दिन 'जरा' नामक एक बहेलिये ने हिरण के भ्रम से तीर मारा। वह बाण श्रीकृष्ण के पैर में लगा, जिससे शीघ्र ही उन्होंने इस संसार को छोड़ दिया और नारायण के रूप में बैकुंठ धाम में विराजमान हो गए। देह त्यागने के साथ ही भगवान कृष्ण द्वारा निर्मित द्वारका नगरी भी समुद्र में विलीन हो गई और यादव कुल नष्ट हो गया।

भगवान श्री कृष्ण को विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। कृष्ण एक निस्वार्थ कर्मयोगी, एक आदर्श दार्शनिक, एक बुद्धिमान व्यक्ति और दिव्य संसाधनों से संपन्न एक महान व्यक्ति थे। कृष्ण की मृत्यु के बाद अर्जुन ने उनका अंतिम संस्कार किया। शरीर छोड़ने समय भगवान कृष्ण 125 वर्ष के थे। कृष्ण के देहांत के बाद द्वापर युग का अंत और कलियुग का आरंभ हुआ।

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