बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

भोपाल गैस त्रासदी से हमने हमने कुछ नहीं सीखा है। हमारे शहर हादसों और मानव निर्मित आपदाओं के कगार पर खड़े हैं। भोपाल की दुखद विरासत का भूत हर दिन बड़ा होता जा रहा है। शहरों का औद्योगिक परिदृश्य, सुरक्षा मानकों में ढिलाई और नियामक उदासीनता से पीड़ित है।

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रविवार की सुबह धुंधभरे मौसम में, एक 18 वर्षीय नौजवान व्यस्त यमुना किनारा रोड पर ट्रकों और बसों के साथ दौड़ रहा है। जब उसे रोककर ऐसा करने की वजह पूछी तो उसने अपनी निराशा व्यक्त करते हुए कहा, “जब खेल के मैदान या खुली जगह है ही नहीं तो हम प्रतियोगिताओं की तैयारियों के लिए दौड़ने का अभ्यास कहां करें?

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एक सवाल जो बार बार उठता रहता है, वह अभी भी उत्तर के इंतज़ार में है। क्या धर्म विशेष की कट्टर मान्यताएं, लोकतंत्री जीवन शैली के साथ कदम ताल नहीं कर सकतीं?

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ज्यादातर भारतीय शहरों का विकास निर्वाचित निगम के पार्षदों से छीनकर चंद नौकरशाहों द्वारा कब्जाए विकास प्राधिकरणों को सौंपने की भूल का परिणाम आज सर्वत्र दिखने लगा है...

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सिर्फ चुनावों में तमिल भावनाओं को जागृत करने के लिए कच्चतिवू टापू के विवादित हस्तांतरण को मुद्दा बनाया गया था। अब भाजपा इस मुद्दे को क्यों नहीं उठा रही है…?

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कभी भारत में दूध की नदियां बहती थीं। बृज भूमि कृष्ण कन्हैया की माखन, दही, छाछ की लीलाओं से गुंजित थी। लेकिन आज नकली दूध से देवी देवताओं का अभिषेक हो रहा है। दूध की परिक्रमा लग रही है। रासायनिक जहरों से नकली मिलावटी, पनीर, खोया, मिठाई बनाकर लोगों की सेहत से खिलवाड़ हो रहा है।

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