बेटे ने अपनी ही मां को गोली मार दी। भाई खेत के टुकड़े के लिए एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। बुजुर्ग मां फ्लैट के एक कोने में पड़ी रही, जैसे घर का कोई बेकार सामान। एक युवा प्रोफेशनल अकेलेपन से टूटकर आत्महत्या की कोशिश कर बैठा। यह किसी अपराध फिल्म की पटकथा नहीं है बल्कि यह बदलते भारत की भयावह सामाजिक तस्वीर है। वही भारत, जिसने कभी पूरे उत्साह से ‘हम दो, हमारे दो’ का नारा अपनाया था...
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