देश

कब तक 80 प्रतिशत आबादी खुद को कमजोर समझती रहेगी? कब तक बहुसंख्यक होकर भी राजनीतिक रूप से बिखरे रहेंगे? क्या सच में यह देश अपने ही मूल समाज से कटता जा रहा था? और सबसे बड़ा सवाल; क्या ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर एक खामोश अन्याय चल रहा था...

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जब एक आम आदमी किसी मुसीबत में थाने की ओर बढ़ता है, तो क्या उसके कदमों में भरोसा होता है या दिल में खौफ़? यही सवाल आज लोकतंत्र के आईने में पुलिस की छवि को देखता हुआ खड़ा है...

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नक्सलवाद की बारूद भरी राह पुलिस की गोली से रुकी या विकास की रोशनी से? सच शायद इन दोनों के बीच में कहीं खड़ा है...

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आगरा जिले के एक गांव में सुबह होते ही लक्ष्मी की आंखें खुल जाती हैं। सूरज निकलने के साथ। पहले सबके लिए चाय, फिर हैंडपंप पर पानी भरना, भैंस को चारा डालना, बच्चों के कपड़े धोना, ससुराल वालों के लिए खाना बनाना। सिर पर दुपट्टा संभालते हुए वह दिन की फेहरिस्त मन में दोहरा लेती है, खेत का काम, दोपहर का खाना, शाम तक थकान से लथपथ एक और दिन। लक्ष्मी के लिए सुबह सपनों की शुरुआत नहीं, जिम्मेदारियों की कतार है। स्कूल की किताबें कभी थीं, लेकिन आठवीं के बाद वे अलमारी में नहीं, यादों की धूल में दफन हो गईं।

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गणतंत्र दिवस भारत की राष्ट्रीय यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसी दिन 26 जनवरी, 1950 को देश का संविधान लागू हुआ। इसके साथ ही देश की ‘संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य’ के रूप में औपचारिक तौर पर स्थापना हुई...

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इस बार की गणतंत्र दिवस परेड में ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ विषय पर एक विशेष झांकी प्रस्तुत की जाएगी। इसमें राष्ट्रीय गीत को भारत की सभ्यतागत स्मृति, सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता की एक जीवंत अभिव्यक्ति के रूप में दिखाया जाएगा...

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