घर में अजीब-सी ख़ामोशी है। बच्चे अपने-अपने शहरों में खो चुके हैं। फ़ोन की घंटी अब कम ही बजती है। घुटनों का दर्द बढ़ रहा है। यादें धुंधली पड़ रही हैं और तन्हाई बिना दस्तक दिए घर की स्थायी मेहमान बन रही है। यह सिर्फ़ कुछ बुज़ुर्गों की कहानी नहीं है, बल्कि उस भारत की तस्वीर है, जहां हर पांचवां नागरिक जल्द ही बुज़ुर्ग हो जाएगा।
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