“जब तोपें गरजती हैं, तो इंसानियत खामोश हो जाती है…”। पश्चिम एशिया का आसमान इन दिनों सिर्फ धुएं से नहीं, एक खौफनाक सन्नाटे से भी ढका है। मिसाइलों की लकीरें रात को चीरती हैं, ड्रोन मौत का पैगाम बनकर मंडरा रहे हैं, और हर विस्फोट के साथ ऐसा लगता है जैसे दुनिया एक कदम और कयामत के करीब पहुंच रही हो। हवा में बारूद ही नहीं, रेडियोएक्टिव डर भी तैर रहा है। कहीं कोई लाल बटन दबा, और पूरी इंसानियत एक न्यूक्लियर ब्लैकआउट में डूब सकती है। यह कोई फिल्मी सीन नहीं। यह हमारे समय का स्याह सच है...
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