लाल झंडे अब कम दिखते हैं। मई दिवस की रौनक भी फीकी पड़ गई है। कभी जो दिन मेहनतकशों की एकता का पैग़ाम देता था, आज वह बस एक रस्म सा लगता है। मगर सच यह है कि ज़मीन के नीचे अंगारे अब भी सुलग रहे हैं। सवाल वही है; क्या तरक़्क़ी सिर्फ कुछ लोगों के लिए है, या सबके लिए...
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