ताजा खबर : वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में भारत के इस्पात क्षेत्र में नियमित रूप से वृद्धि जारी रही * मुंबई का जवाहर द्वीप भारत का पहला प्लास्टिक-मुक्त ऑयल टर्मिनल बना * भारतीय सुरक्षा बलों ने जम्मू और कश्मीर में खुफिया जानकारी आधारित ऑपरेशन में लश्कर-ए-तैयबा के सीनियर कमांडर मूसा को मार गिराया

साल 2014 में दो करोड़ नौकरियां हर साल देने का वादा कहां गया? क्या हमारी नदियां सचमुच साफ हो गईं? क्या शहर स्मार्ट हो गए या सिर्फ स्मार्ट बोर्ड लग गए? भ्रष्टाचार कम हुआ या हमने उसके साथ जीना सीख लिया? और बारह साल बाद आखिर वादे और डिलीवरी के बीच कितनी दूरी तय हुई? ये किसी विश्वविद्यालय के शोध के सवाल नहीं हैं। ये वे सवाल हैं जो लोग चाय की दुकानों पर, घरों में, दफ्तरों में और रेलवे प्लेटफॉर्म पर पूछते हैं...

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पीढ़ियों से, भारत के लाइटहाउस ऐसी जगहें रहे हैं, जिन्हें लोग दूर से ही देखते थे। समुद्र के किनारे खड़े ये लाइटहाउस तटीय इलाकों के खतरनाक हिस्सों की पहचान कराते थे और अंधेरे में जहाजों को रास्ता दिखाते थे। इनकी रोशनी नाविकों के काम आती थी और इनके टावर आस-पास के नज़ारों का अहम हिस्सा थे...

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गत मई में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे दौरे पर गए, तो एक नॉर्वेजियन पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद उनसे सवाल उछाल दिया। सवाल था कि भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे से बहुत नीचे क्यों है...

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कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनके जरिये प्रेम में डूबे किसी युवा को अपने दिल की आवाज सुनाई देती है तो उम्र के अनुभवों से गुजर चुके व्यक्ति को उनमें अपने बीते दिनों की कसक महसूस होती है। साल 1981 में आई फिल्म ‘कुदरत’ का गीत ‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ इसी श्रेणी का गीत है। इसके शब्दों में प्रेम की गहराई है, धुन में एक अनकही बेचैनी और गायकी में ऐसा भावनात्मक ठहराव है, जो सुनने वाले को 'स्वयं' से जोड़ देता है...

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तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री सी जोसफ विजय ने हाल ही में अपने निजी ज्योतिषी को मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी नियुक्त कर दिया। खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। कहा गया कि इसी ज्योतिषी ने वर्षों पहले ‘भविष्यवाणी’ की थी कि विजय एक दिन सत्ता की कुर्सी तक पहुंचेंगे। कुछ ही घंटों में राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। सहयोगी दलों ने सवाल उठाए। तर्कवाद, वैज्ञानिक सोच और संविधान की दुहाई दी जाने लगी। आखिरकार सरकार को कदम पीछे खींचना पड़ा...

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21 मई 1993 को आगरा की पानी की टोंटियों से मौत बह निकली थी। घटिया, खटीक पाड़ा और मंडी सईद खान की तंग गलियों में लोगों ने रोज़ की तरह वाटर वर्क्स का पानी पिया। कुछ ही घंटों में घरों में अफरा-तफरी मच गई। बच्चों को उल्टियां और तेज़ बुखार होने लगा। पूरे परिवार अस्पतालों की तरफ भागे। 200 से ज़्यादा लोग बुरी तरह बीमार पड़े। दूषित पानी पीने से 21 लोगों की जान चली गई...

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हवा महल के आसपास की हलचल से आगे बढ़ते हुए जब जयपुर के जंतर-मंतर में प्रवेश किया तो वातावरण कुछ अलग लगा। सामने फैली ज्यामितीय आकृतियां, ऊंची दीवारें, कोण बनाती संरचनाएं और विशाल चाप मन में स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा करते हैं। यह कोई पारंपरिक महल या मंदिर नहीं है, फिर भी पूरा परिसर अपने आप में असाधारण दिखाई देता है...

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यदि नाना पाटेकर को सही में समझना हो तो शायद उनके पुरस्कारों, फिल्मों और यादगार संवादों की सूची से शुरुआत नहीं करनी चाहिए। उन्हें समझने का बेहतर रास्ता उनके जीवन को देखने से निकलता है। एक ऐसा जीवन जिसमें गरीबी, संघर्ष, रंगमंच, अभिनय, प्रसिद्धि, सेना के साथ बिताए दिन, किसानों के लिए काम, कविता, हास्य, सादगी और विवाद, सब एक साथ दिखाई देते हैं। इन सबके बीच एक बात लगातार यह उभरती है कि उन्होंने अपने जीवन को किसी एक तय खांचे में नहीं जिया। जब उन्हें लगा कि कुछ करना चाहिए, उन्होंने किया; कई बार वह काम उनकी सार्वजनिक छवि से बिल्कुल अलग था।

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आगरा में पर्यावरण बचाने की लड़ाई पिछले कई दशकों से सिर्फ एक ही ढर्रे पर घूम रही है; अदालत, आरटीआई, एनजीटी। याचिका दायर होती है, आदेश आता है, जुर्माना लगता है, अखबारों में खबर छपती है, और फिर सब कुछ वहीं का वहीं। हवा वैसी ही ज़हरीली, यमुना वैसी ही मरी हुई। साफ बात यह है कि इलाज खूब हो रहा है, बीमारी ठीक होने का नाम नहीं ले रही है...

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यूरोप की मेरी हाल की यात्रा को अगर एक शब्द में बांधना हो, तो वह शब्द होगा, ‘पानी’। मैंने वहां आधा दर्जन से ज़्यादा नदियां, नहरें और झीलें नज़दीक से देखीं। कभी क्रूज़ पर बैठकर, कभी फेरी में, कभी पुल से झांककर और कभी किनारे बैठकर। नाविकों, फेरीवालों, क्रूज़ मैनेजरों और गोंडोला चलाने वालों से बातें कीं। किनारे बैठे आम लोग भी देखे, जो दोपहर की सुनहरी धूप में नदी को निहार रहे थे, बातें कर रहे थे या बस ज़िंदगी को थोड़ी देर आराम दे रहे थे।

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