ताजा खबर : स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डाला भारत की प्रगति पर प्रकाश * एक वर्ष में एक करोड़ युवाओं को मिलेगा एआई कौशल प्रशिक्षण * ‘अग्नि-4’ बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण

कल्पना कीजिए, श्याम बेनेगल की मशहूर फिल्म ‘अंकुर’ का वह आखिरी दृश्य। गांव का एक छोटा लड़का सब कुछ चुपचाप देख रहा है- जमींदार की हुकूमत, गरीबों की बेबसी और अन्याय का खेल। फिर अचानक वह एक पत्थर उठाता है। पत्थर हवेली की ओर उछलता है। स्क्रीन लाल हो जाती है। एक छोटा-सा पत्थर, मगर उसके भीतर बगावत का एक बड़ा बीज छिपा है। आज 2026 के भारत में वही दृश्य फिर याद आता है।

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भारत के खेतों ने कृषि विकास को निरंतर जारी रखा है, लेकिन दीर्घकालिक उत्पादकता स्वस्थ मृदा और सुदृढ़ इकोसिस्टम पर निर्भर करती है। ‘पुनर्योजी कृषि’ मृदा की जीवन-शक्ति को बहाल करने, जैव-विविधता को बेहतर बनाने और जलवायु संबंधी दबावों से निपटने की क्षमता को मजबूत करने का एक रास्ता प्रदान करती है।

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सुबह की ठंडी हवा में घंटियों की आवाज गूंजती है। दूर तक युवाओं के जत्थे दिखाई देते हैं। किसी के कंधे पर कांवड़ है, कोई नंगे पांव परिक्रमा कर रहा है, तो कोई दोस्तों के साथ भजन गाते हुए पहाड़ चढ़ रहा है। मोबाइल जेब में है, सेल्फी भी चल रही है और भगवान का नाम भी। यही भारत की नई तीर्थयात्रा है...

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कितनी बार एक औरत को बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सुनेगी? कितनी सुर्खियां चीखेंगी, तब किसी ताकतवर आदमी से कथित यौन अपराध का हिसाब मांगा जाएगा?

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भारत का नारियल क्षेत्र ग्रामीण आजीविका, कृषि विकास और सांस्कृतिक परंपराओं को संबल प्रदान करता है। लगभग 10 मिलियन किसानों सहित करीब 30 मिलियन लोग इस क्षेत्र पर निर्भर हैं...

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पिछले कुछ दिनों में तिब्बती प्रतिनिधिमंडलों ने कर्नाटक के नेताओं से मुलाकात की है। बेंगलुरु में नवनिर्वाचित तिब्बती सांसद चोप्पेल ने मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से मुलाकात कर शिक्षा, स्वास्थ्य, कल्याण और संस्कृति के संरक्षण के लिए सरकारी सहायता मांगी। उन्होंने कर्नाटक में बसे तिब्बतियों की समस्याओं पर भी ध्यान देने की अपील की...

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कल्पना कीजिए, चुनावी मंच पर एक महिला नेता खड़ी होती है। वह सरकार से तीखे सवाल पूछती है। विपक्ष को चुनौती देती है। अपनी पार्टी का बचाव करती है। कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया का माहौल बदल जाता है। उसके तर्कों पर कम, कपड़ों पर ज्यादा चर्चा होने लगती है। उसकी नीतियों को छोड़कर उम्र, शादी, शक्ल और निजी जिंदगी की चीरफाड़ शुरू हो जाती है। बस, यहीं हमारी राजनीति का सबसे बदसूरत चेहरा दिखाई देता है...

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दिल्ली के कोचिंग सेंटरों के बाहर खड़े युवाओं से पूछिए, “क्या कर रहे हो?” जवाब लगभग एक जैसा मिलेगा, “यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं।” “क्यों?” “देश की सेवा करनी है। समाज बदलना है। संविधान की रक्षा करनी है।”

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नई इमारत तैयार है। चमचमाता बोर्ड लग गया है। रंगीन ब्रोशर छप चुके हैं। ‘एडमिशन शुरू हैं!’ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी। मशीन लर्निंग। रोबोटिक्स। नाम सुनकर लगता है,…

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