ताजा खबर : मुंबई का जवाहर द्वीप भारत का पहला प्लास्टिक-मुक्त ऑयल टर्मिनल बना * भारतीय सुरक्षा बलों ने जम्मू और कश्मीर में खुफिया जानकारी आधारित ऑपरेशन में लश्कर-ए-तैयबा के सीनियर कमांडर मूसा को मार गिराया * सेल ने अगस्त माह में बिक्री और उत्पादन में दर्ज की मजबूत वृद्धि

देश बदलने का दावा था। लेकिन, सड़कों पर अब भी वही पुराना दृश्य है। आगे लाल बत्ती जैसी अकड़। पीछे सायरनों की चीख। आम आदमी ट्रैफिक में पसीना बहाता खड़ा है और नेताओं के काफिले हवा चीरते निकल जाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पुराने राजा हाथी पर चलते थे, नए शासक एसयूवी के झुंड में चलते हैं...

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भारत का स्वच्छता से नाता ऐतिहासिक है। सिंधु घाटी के पुरातात्विक सबूतों से पता चलता है कि वहां सफ़ाई की बेहतरीन व्यवस्था थी। आज के गुजरात स्थित लोथल जैसे शहरों में सुनियोजित नक्शे और बड़ी नालियों के नेटवर्क की व्यवस्था थी। कई घरों में निजी शौचालय थे जो नालियों से जुड़े हुए थे। इस व्यवस्था में ठोस कचरे का प्रबंधन करने के लिए निगरानी बिंदु और इससे संबंधित ढांचे भी शामिल थे...

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स्वच्छता के सफर में बदलाव की कई ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें जानना बेहद ज़रूरी है। ये उन महिलाओं की कहानियां हैं, जो कचरे से रोज़गार पैदा कर रही हैं, अपने समुदायों में साफ-सफाई के कामों की अगुवाई कर रही हैं और रोज़मर्रा की चुनौतियों को अवसरों में बदल रही हैं। उनके साथ ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी हैं, जो साफ-सफाई की सेवाओं में पेशेवर भूमिकाएं और पहचान पा रहे हैं।

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विकासशील देशों की अनुसंधान एवं सूचना प्रणाली के एक नए अध्ययन के अनुसार, आयुष सेवा क्षेत्र भारत के सबसे तेजी से बढ़ते सेवा क्षेत्रों में से एक बनकर उभरा है और इसका वित्त वर्ष 2024-25 में अनुमानित आर्थिक योगदान 36.92 अरब अमेरिकी डॉलर है...

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तेज़ी से बढ़ते शहरों में, पानी का इस्तेमाल होने के बाद पानी का चक्र खत्म नहीं होता है। घरों, कारखानों और आस-पड़ोस से बहकर निकलने वाले पानी को सही व्यवस्था के साथ, इस्तेमाल कर, पुन: एकत्र किया जा सकता है। उसका उपचार किया जा सकता है। पुनर्चक्रित किया जा सकता है और फिर से काम में लाया जा सकता है...

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वर्तमान दौर के भारत में महात्मा गांधी ‘आउट ऑफ फैशन’ हैं। यह अलग बात है कि विदेशों में भारत की पहचान महात्मा गांधी से ही है। विदेशी मेहमानों को आज भी सबसे पहले राज घाट स्मारक पर ही ले जाया जाता है। तो क्या गांधी गलत थे, या दुनिया के लालची इरादे ही सही थे?

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कुछ गीत केवल सुने नहीं जाते हैं बल्कि वे अपने समय की एक स्मृति बन जाते हैं। ‘पग घुंघरू बांध…’ ऐसा ही एक गीत है। साल 1982 में आई प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘नमक हलाल’ का यह लगभग बारह मिनट लंबा गीत जब सामने आया था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि इसमें शामिल शास्त्रीय सरगम, डिस्को की थाप, क़व्वाली का रंग, संवादों की नाटकीयता और किशोर कुमार की खिलंदड़ी आवाज़ मिलकर आने वाले दशकों के लिए एक ऐसा गीत रच देंगे, जिसे आज भी लोग केवल एक पुराने फिल्मी गीत के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक स्मृति के रूप में याद करते हैं...

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भारत में त्योहार कई रूपों में आते हैं, लेकिन उनसे जुड़ी भावनाएं बहुत जानी-पहचानी होती हैं। गणेश चतुर्थी पर बप्पा को घरों और मोहल्लों में लाया जाता है। दुर्गा पूजा पंडालों को भक्ति और कलात्मकता से भर दिया जाता है। दिवाली दीयों की चमक, प्रार्थनाओं और नई शुरुआत को लेकर आती है। छठ परिवारों को घाटों पर एक साथ लाती है, जहां सूर्य देव को अर्घ्य और प्रार्थनाएं की जाती हैं। आस्था, परिवार और समुदाय में रचे-बसे ये उत्सव उन स्थानों से भी गहराई से जुड़े हैं जहां ये मनाए जाते हैं...

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स्वास्थ्य बीमा खरीदते समय सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि जरूरत पड़ने पर बीमा कंपनी इलाज का खर्च कितनी आसानी से चुकाएगी। आकर्षक सुविधाओं, बड़े बीमा कवर और कम प्रीमियम के दावों के बीच सही पॉलिसी चुनना आसान काम नहीं होता है। बाजार में उपलब्ध  तीन अग्रणी कंपनियां स्टार हेल्थ इंश्योरेंस, आईसीआईसीआई लोम्बार्ड और नीवा बुपा की योजनाएं अपनी अलग-अलग खूबियों के साथ आती हैं। लेकिन, इनमें से किसे चुनना चाहिए? इसका जवाब केवल प्रीमियम या बीमा कवर की रकम देखकर नहीं दिया जाना चाहिए। पॉलिसी की शर्तें, दावा निपटाने का रिकॉर्ड, अस्पताल में भर्ती होने के दौरान मिलने वाली सुविधाएं और भविष्य में बढ़ने वाला खर्च भी इस फैसले को प्रभावित करते हैं...

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कुछ गीत ऐसे होते हैं, जो अपनी लोकप्रियता की सभी सीमाएं लांघकर लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। वे केवल मनोरंजन का माध्यम ही नहीं रह जाते, बल्कि भावनाओं, यादों और रिश्तों की आवाज बन जाते हैं। वर्ष 1986 में प्रदर्शित और महेश भट्ट द्वारा निर्देशित फिल्म ‘नाम’ का गीत ‘चिट्ठी आई है...’ भी ऐसा ही एक गीत है। पंकज उधास की दर्द में डूबी आवाज, आनंद बख्शी के सरल लेकिन हृदयस्पर्शी शब्द और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का भावपूर्ण संगीत इस गीत को इतनी ऊंचाई पर ले गए, जहां पहुंचना हर गीतकार, संगीतकार और गायक का सिर्फ सपना होता है...

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