क्या हम ताज महल को बचा रहे हैं, या धीरे-धीरे उसे धूल, धुंध और धुएं में दफ़न कर रहे हैं? आगरा की हवा साल के अधिकांश दिनों में ज़हरीली रहती है...
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Read Moreलैंडमार्क कार्स एक ऐसी कंपनी है जो भारत के ऑटो रिटेल सेक्टर में धीरे-धीरे अपनी मज़बूत पहचान बना रही है। यह सिर्फ़ कार बेचने का कारोबार नहीं, बल्कि एक पूरे इकोसिस्टम को गढ़ने की दिशा में काम कर रही है...
Read Moreज़रा सोचिए। अगर कल सुबह कोई सरकार कह दे कि अब नमक खरीदना भी अमीरों का शौक़ होगा, तो क्या होगा? दाल बेस्वाद हो जाएगी। रोटी गले से नहीं उतरेगी। गरीब की थाली और भी सूनी हो जाएगी...
Read Moreभारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता और राजनीति का रिश्ता हमेशा से बहस का विषय रहा है। पत्रकारिता का धर्म है, सत्ता से सवाल करना और जनता के हित में सच को सामने रखना, जबकि राजनीति का धर्म है सत्ता प्राप्त करना और उसे बनाए रखना। इन दोनों के बीच का टकराव और सहयोग ही लोकतंत्र की असली धड़कन है...
Read Moreनई दिल्ली का जंतर-मंतर बगावत के एक रंगीन मेले में बदल गया। जेन ज़ी के नौजवान गा रहे थे, नाच रहे थे, मीम्स बना रहे थे, ताकतवर नेताओं का मज़ाक उड़ा रहे थे और बर्गर, पिज़्ज़ा, भटूरे खाते हुए ऐसे मस्ती कर रहे थे, मानो राजनीति किसी कॉलेज फेस्ट में आ घुसी हो।
Read Moreसाल 2026 का सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका संसद में नहीं हुआ। वह एक मीम से शुरू हुआ। कुछ छात्रों को "कॉकरोच" कहा गया। और, उन्होंने बुरा मानने के बजाय उसी नाम को अपना झंडा बना लिया। फिर वे जंतर-मंतर पहुंचे, डटे रहे और आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। महीनों तक संसद में हंगामा करने वाला पूरा विपक्ष जो नहीं कर सका, वह काम कुछ हजार युवाओं ने मोबाइल फोन, मीम और मुस्कान के सहारे कर दिखाया...
Read Moreआख़िर नालियां किसने खोलीं? हर चुनाव, हर धरना, हर इस्तीफा और हर सियासी पुनर्जन्म के साथ वही जानी-पहचानी खड़खड़ाहट फिर सुनाई देती है। रोशनी मंद पड़ती है। कैमरे बंद हो जाते हैं। दिल्ली की चमचमाती इमारतों के नीचे कहीं कोई मुस्कुराता है। मैनहोल का ढक्कन धीरे-धीरे उठता है। और एक खुशमिजाज़ आवाज़ फुसफुसाती है, "फिक्र मत कीजिए... इंटरवल खत्म हो गया है!"
Read Moreघर में अजीब-सी ख़ामोशी है। बच्चे अपने-अपने शहरों में खो चुके हैं। फ़ोन की घंटी अब कम ही बजती है। घुटनों का दर्द बढ़ रहा है। यादें धुंधली पड़ रही हैं और तन्हाई बिना दस्तक दिए घर की स्थायी मेहमान बन रही है। यह सिर्फ़ कुछ बुज़ुर्गों की कहानी नहीं है, बल्कि उस भारत की तस्वीर है, जहां हर पांचवां नागरिक जल्द ही बुज़ुर्ग हो जाएगा।
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With widespread reports of hiring activity stabilising after a prolonged period of uncertainty, employers are facing an increasingly difficult balancing act.
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In Indian democracy, the relationship between journalism and politics has always been a subject of debate. The duty of journalism is to question power and present the truth in the interest of the people,…
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ब्लूबेरी और जामुन अक्सर एक जैसे दिखते हैं, लेकिन असल में ये दो बिल्कुल अलग-अलग फल हैं। ब्लूबेरी उत्तरी अमेरिका की देन हैं। जो कि छोटे, गोल और हल्की खटास के साथ मीठापन लिए होते हैं। इन्हें ‘सुपरफूड’…
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