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21 मई 1993 को आगरा की पानी की टोंटियों से मौत बह निकली थी। घटिया, खटीक पाड़ा और मंडी सईद खान की तंग गलियों में लोगों ने रोज़ की तरह वाटर वर्क्स का पानी पिया। कुछ ही घंटों में घरों में अफरा-तफरी मच गई। बच्चों को उल्टियां और तेज़ बुखार होने लगा। पूरे परिवार अस्पतालों की तरफ भागे। 200 से ज़्यादा लोग बुरी तरह बीमार पड़े। दूषित पानी पीने से 21 लोगों की जान चली गई...

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हवा महल के आसपास की हलचल से आगे बढ़ते हुए जब जयपुर के जंतर-मंतर में प्रवेश किया तो वातावरण कुछ अलग लगा। सामने फैली ज्यामितीय आकृतियां, ऊंची दीवारें, कोण बनाती संरचनाएं और विशाल चाप मन में स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा करते हैं। यह कोई पारंपरिक महल या मंदिर नहीं है, फिर भी पूरा परिसर अपने आप में असाधारण दिखाई देता है...

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यदि नाना पाटेकर को सही में समझना हो तो शायद उनके पुरस्कारों, फिल्मों और यादगार संवादों की सूची से शुरुआत नहीं करनी चाहिए। उन्हें समझने का बेहतर रास्ता उनके जीवन को देखने से निकलता है। एक ऐसा जीवन जिसमें गरीबी, संघर्ष, रंगमंच, अभिनय, प्रसिद्धि, सेना के साथ बिताए दिन, किसानों के लिए काम, कविता, हास्य, सादगी और विवाद, सब एक साथ दिखाई देते हैं। इन सबके बीच एक बात लगातार यह उभरती है कि उन्होंने अपने जीवन को किसी एक तय खांचे में नहीं जिया। जब उन्हें लगा कि कुछ करना चाहिए, उन्होंने किया; कई बार वह काम उनकी सार्वजनिक छवि से बिल्कुल अलग था।

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आगरा में पर्यावरण बचाने की लड़ाई पिछले कई दशकों से सिर्फ एक ही ढर्रे पर घूम रही है; अदालत, आरटीआई, एनजीटी। याचिका दायर होती है, आदेश आता है, जुर्माना लगता है, अखबारों में खबर छपती है, और फिर सब कुछ वहीं का वहीं। हवा वैसी ही ज़हरीली, यमुना वैसी ही मरी हुई। साफ बात यह है कि इलाज खूब हो रहा है, बीमारी ठीक होने का नाम नहीं ले रही है...

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यूरोप की मेरी हाल की यात्रा को अगर एक शब्द में बांधना हो, तो वह शब्द होगा, ‘पानी’। मैंने वहां आधा दर्जन से ज़्यादा नदियां, नहरें और झीलें नज़दीक से देखीं। कभी क्रूज़ पर बैठकर, कभी फेरी में, कभी पुल से झांककर और कभी किनारे बैठकर। नाविकों, फेरीवालों, क्रूज़ मैनेजरों और गोंडोला चलाने वालों से बातें कीं। किनारे बैठे आम लोग भी देखे, जो दोपहर की सुनहरी धूप में नदी को निहार रहे थे, बातें कर रहे थे या बस ज़िंदगी को थोड़ी देर आराम दे रहे थे।

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मान भी लें कि कुछ गलत तत्व मीडिया में दाखिल हो चुके हैं, और कई एक्टिविस्ट सूचनाधिकार का दुरुपयोग करते हैं, तो क्या समूची बिरादरी को कटघरे में खड़ा करना उचित है? वकालत में, डाक्टरी में, न्यायिक व्यवस्था में, राजनीति में, सभी जगह ‘काली भेड़ें’ अमर्यादित कार्य कर रही हैं, लेकिन क्या पूरा सिस्टम दोषी है?

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भारत की सुपरकंप्यूटिंग यात्रा 1990 के दशक की शुरुआत में ‘परम 8000’ से विकसित होकर आज एक राष्ट्रीय परितंत्र में बदल गई है। माह सितंबर तक 40 सुपर कंप्यूटरों द्वारा 68 पेटाफ्लॉप्स, यानी, काफी तेज गणना देने के साथ, उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग तक विस्तार किया जा रहा है।

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अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। टिकटों के लिए घेराबंदी तेज है, विपक्षी दल तालमेल की गांठें कस रहे हैं और भाजपा नेता पूरे भरोसे से कह रहे हैं, “हमारा काम बोलेगा।

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देश बदलने का दावा था। लेकिन, सड़कों पर अब भी वही पुराना दृश्य है। आगे लाल बत्ती जैसी अकड़। पीछे सायरनों की चीख। आम आदमी ट्रैफिक में पसीना बहाता खड़ा है और नेताओं के काफिले हवा चीरते निकल जाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पुराने राजा हाथी पर चलते थे, नए शासक एसयूवी के झुंड में चलते हैं...

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भारत का स्वच्छता से नाता ऐतिहासिक है। सिंधु घाटी के पुरातात्विक सबूतों से पता चलता है कि वहां सफ़ाई की बेहतरीन व्यवस्था थी। आज के गुजरात स्थित लोथल जैसे शहरों में सुनियोजित नक्शे और बड़ी नालियों के नेटवर्क की व्यवस्था थी। कई घरों में निजी शौचालय थे जो नालियों से जुड़े हुए थे। इस व्यवस्था में ठोस कचरे का प्रबंधन करने के लिए निगरानी बिंदु और इससे संबंधित ढांचे भी शामिल थे...

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