ताजा खबर : वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में भारत के इस्पात क्षेत्र में नियमित रूप से वृद्धि जारी रही * मुंबई का जवाहर द्वीप भारत का पहला प्लास्टिक-मुक्त ऑयल टर्मिनल बना * भारतीय सुरक्षा बलों ने जम्मू और कश्मीर में खुफिया जानकारी आधारित ऑपरेशन में लश्कर-ए-तैयबा के सीनियर कमांडर मूसा को मार गिराया

एक ही दिन भारत की अर्थव्यवस्था की दो ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जो विकास और आर्थिक विषमता के बीच मौजूद गहरी खाई पर सोचने को मजबूर करती हैं। देश का सबसे बड़ा आईपीओ जियो प्लेटफॉर्म्स शेयर बाजार में दस्तक देता है और पहले ही दिन अपने इश्यू मूल्य से करीब 21 फ़ीसदी की बढ़त के साथ सूचीबद्ध और दिन के अंत में करीब 27 फीसदी तक पहुंचकर निवेशकों के लिए उत्साह का कारण बनता है। दूसरी ओर, महाराष्ट्र के नांदेड़ में ₹10 हजार के कथित कर्ज से जुड़ा किसान चंद्रकांत शिंदे का मामला सामने आता है। इस मामले में परिवार ने हत्या का आरोप लगाया है और पुलिस ने हत्या तथा अपहरण का मामला दर्ज किया है। इस घटना को, फिलहाल, आत्महत्या का मामला कहना उचित नहीं होगा, लेकिन तुलनात्मक रूप से एक बेहद छोटी रकम से जुड़ा यह विवाद ग्रामीण आर्थिक असुरक्षा की गंभीरता पर सवाल जरूर खड़ा करता है। 

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बॉलीवुड की फिल्मों में भगवान के प्रति आस्था को अक्सर प्रार्थना, भजन और समर्पण के जरिए व्यक्त किया जाता रहा है, लेकिन कुछ दृश्य ऐसे भी हैं, जिनमें नायक अपने आराध्य के सामने सिर झुकाने के बजाय उनसे सवाल करते हैं। वे अपने दुख का कारण जानना चाहते हैं, अपने साथ हुए अन्याय का हिसाब मांगते हैं और कभी-कभी भगवान को ही अपने उलाहनों के घेरे में खड़ा कर देते हैं। हिंदी सिनेमा में ऐसे दो दृश्य खास तौर पर याद आते हैं। एक है फिल्म ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन का ‘आज खुश तो बहुत होगे तुम...’ वाला दृश्य और दूसरा है फिल्म ‘सुर संगम’ में गिरीश कर्नाड पर फिल्माया गया गीत ‘हे शिवशंकर...’। दोनों दृश्यों का अंदाज एकदम अलग है, लेकिन दोनों में भगवान शिव से शिकायत का भाव समान है...

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जब हर हाथ में मोबाइल हो, हर मोबाइल न्यूज़रूम बन जाए और हर सोशल मीडिया वाला खुद को पत्रकार बताने लगें, तो असली पत्रकार की पहचान कौन करेगा? क्या कैमरा उठाना ही काबिलियत है? क्या माइक पकड़कर चिल्लाने से पत्रकारिता आ जाती है? क्या किसी अफसर को धमकाकर ही प्रेस की धौंस जमाई जा सकती है? और क्या पत्रकार होने का दावा करते ही खास सुरक्षा और सुविधाओं का पट्टा मिल जाना चाहिए? सवाल तीखे हैं, मगर वक्त की जरूरत हैं।

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फिल्म ‘सुर संगम’ का ‘हे शिव शंकर...’ सिर्फ एक फिल्मी गीत नहीं है, बल्कि एक ऐसी संगीत यात्रा का अभूतपूर्व हिस्सा है जिसमें बनारस की शास्त्रीय परंपरा, मुंबई के फिल्म संगीत की दुनिया और एक असाधारण गायक की स्वाभाविक आवाज एक जगह आकर मिलती है। इस गीत को सुनते हुए सबसे पहले जो बात मन को पकड़ती है, वह है पंडित राजन मिश्र की आवाज। उसमें भक्ति की विनम्रता है, शास्त्रीय गायकी की गंभीरता भी और सुरों पर ऐसी पकड़ भी, जो गीत को एक सामान्य फिल्मी भजन की सीमा से बहुत आगे ले जाती है...

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जब से बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में दोबारा डेरा जमाया है, दुनिया की शामत आई हुई है। लगता है, तीसरा विश्व युद्ध बस ट्रंप की अगली पोस्ट का इंतज़ार कर रहा है। अब तक तीन-चार बार दुनिया बारूद के ढेर पर बैठते-बैठते बची है। ट्रंप की जुबान मिसाइल है, दिमाग मौसम विभाग और फैसले ऐसे कि सुबह का शेर शाम को भीगी बिल्ली बन जाए...

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साल 1985 में रिलीज हुई फिल्म ‘मोहब्बत’ का लता मंगेशकर की आवाज में सजा गीत ‘नैना ये बरसे...’ प्रेम की उस स्थिति को व्यक्त करता है, जब दिल किसी के इंतजार में डूबा हो और परिस्थितियां चाहकर भी दो प्रेमियों को एक-दूसरे के करीब नहीं आने देती हैं...

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वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि सबसे चमकीले एक्स-रे पल्सरों में से एक, सेंटॉरस X-3 अभिवृद्धि डिस्क के माध्यम से पदार्थ को अपनी ओर खींचकर निगल रहा है। ऐसी प्रक्रिया इस प्रकार के पल्सरों में बहुत विलक्षण है...

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वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण प्रणाली का खुलासा किया है, जो बताता है कि तेजी से घूमने वाले ब्लैक होल के आसपास का पदार्थ, जिसे एक्रि‍शन डिस्क भी कहा जाता है, अत्यधिक दोलन करने वाले एक्स-रे का उत्सर्जन क्यों कर सकता है...

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ब्रज मंडल की प्रकृति, यमुना तट, कुंज गलियों, मोरों, गायों और कृष्ण लीलाओं का सुंदर वर्णन अनेक लोकप्रिय भजनों और गीतों में मिलता है। “श्याम तेरी बंसी पुकारे,” “राधे राधे बरसाने वाली,” “मैया मोरी,” और “जय राधा माधव” जैसे भजन वृंदावन, बरसाना और गोकुल की आध्यात्मिक सुंदरता को जीवंत करते हैं। सूरदास और रसखान के पद विशेष रूप से प्रकृति का मार्मिक वर्णन करते हैं। कभी यह धरती बांसुरी की तान पर झूमती थी। यमुना किनारे कदंब की छांव थी। कुंडों में कमल खिलते थे। तालाब गांवों की धड़कन होते थे। आज उसी ब्रज मंडल में सुबह का पहला दृश्य क्या है? हाथों में बाल्टियां लिए महिलाएं। सूखे नलों के नीचे टकटकी लगाए बच्चे। और पानी के टैंकर के पीछे भागती भीड़...

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भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने की तैयारी कर रहे जियो प्लेटफॉर्म्स लिमिटेड के आईपीओ ने पहले ही दिन निवेशकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। देश के अब तक के सबसे बड़े सार्वजनिक निर्गम के रूप में पेश किए गए इस आईपीओ को संस्थागत निवेशकों का जबर्दस्त समर्थन मिला है। हालांकि, खुदरा निवेशकों की शुरुआती प्रतिक्रिया संस्थागत निवेशकों की तुलना में कमजोर रही। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आवेदन के दौरान दिखा उत्साह शेयर बाजार में लिस्टिंग के समय भी बरकरार रहेगा? सवाल यह भी है कि निवेशकों को अपने निवेश पर कितना लाभ मिल सकता है?

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