ताजा खबर : वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में भारत के इस्पात क्षेत्र में नियमित रूप से वृद्धि जारी रही * मुंबई का जवाहर द्वीप भारत का पहला प्लास्टिक-मुक्त ऑयल टर्मिनल बना * भारतीय सुरक्षा बलों ने जम्मू और कश्मीर में खुफिया जानकारी आधारित ऑपरेशन में लश्कर-ए-तैयबा के सीनियर कमांडर मूसा को मार गिराया

एक जमाना था सुबह का अखबार पढ़े बिना लोगों को चैन नहीं आता था। शाम को, ‘हम लोग’, या रविवार की सुबह ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ सीरियल देखे बगैर सो नहीं पाते थे। घंटों तक बच्चे टीवी से चिपके रहते थे। क्रिकेट मैच मोहल्लों को जोड़ देते थे। धारावाहिक घर-घर की बातचीत बन जाते थे। समाचार चैनल देश की राजनीतिक धड़कन तय करते थे। मीडिया सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं था, वह सामाजिक संस्कृति का हिस्सा था। और अब...

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साल 1987 में रिलीज और राज एन सिप्पी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘सत्यमेव जयते’ का गीत ‘दिल में हो तुम...’ को बप्पी लाहिरी के संगीत, फारूक कैसर के बोल और अलग-अलग गायकों की आवाजों ने एक खास पहचान दी।

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जम्मू-कश्मीर का दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र धीरे-धीरे कनेक्टिविटी के एक नए युग की ओर अग्रसर हो रहा है। उधमपुर–श्रीनगर–बारामूला रेल लिंक ने घाटी को भारत के रेल नेटवर्क से जोड़ दिया है। इस परियोजना का प्रमुख आकर्षण चिनाब पुल है, जो दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्च पुल है।

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बेटे ने अपनी ही मां को गोली मार दी। भाई खेत के टुकड़े के लिए एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। बुजुर्ग मां फ्लैट के एक कोने में पड़ी रही, जैसे घर का कोई बेकार सामान। एक युवा प्रोफेशनल अकेलेपन से टूटकर आत्महत्या की कोशिश कर बैठा। यह किसी अपराध फिल्म की पटकथा नहीं है बल्कि यह बदलते भारत की भयावह सामाजिक तस्वीर है। वही भारत, जिसने कभी पूरे उत्साह से ‘हम दो, हमारे दो’ का नारा अपनाया था...

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साल 1994 में रिलीज हुई फिल्म ‘इम्तहान’ का गीत ‘इस तरह आशिकी का...’ की खासियत केवल इसका रोमांटिक अंदाज नहीं है, बल्कि इसके दो अलग-अलग संस्करण भी हैं। एक संस्करण अमित कुमार ने गाया, जबकि दूसरे को कुमार सानू ने अपनी आवाज दी। दोनों संस्करणों का इस्तेमाल फिल्म में अलग-अलग किरदारों पर किया गया...

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यूरोप की चमचमाती सड़कें, साफ-सुथरी नदियां, शानदार इमारतें और समय पर दौड़ती ट्रेनें देखकर मन खुश हो जाता है। लगता है, बस यहीं बस जाएं! लेकिन, जैसे ही जेब से पैसे निकलने शुरू होते हैं, सपनों की दुनिया में महंगाई का भूत नाचने लगता है। खूबसूरती अपनी जगह है, मगर जिंदगी चलाने का खर्चा देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। आखिर यह कैसी तरक्की है, जहां कमाई लाखों में और बचत कौड़ियों में रह जाती है?

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हाल ही में, आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह कोई संयोग या महज़ दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा यमुना में उतरे। दो घंटे तक उन्हें बचाने की कोशिशें चलती रहीं, लेकिन अंततः चार बच्चों के शव बाहर निकाले गए। आए दिन ये दुर्घटनाएं हो रही हैं। पुलिस ने घाटों पर होर्डिंग लगाए हैं, सावधान किया है, पर लोग हैं कि मानते नहीं। वाकई, परिवारों का दुख शब्दों से परे है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी आस्था, इतिहास और सभ्यता सांस लेती आई है, आज मौत की गवाह बनती जा रही है...

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हिंदी फिल्मों के कुछ गीत ऐसे हैं, जिन्हें सुनते हुए आंखों के सामने पहाड़ों की हरियाली, झरनों का संगीत और प्रेम में डूबे दो दिलों की तस्वीर उभरने लगती है। साल 1981 में रिलीज हुई फिल्म ‘प्यासा सावन’ का गीत ‘इन हसीं वादियों से दो चार नजारे...’ ऐसा ही एक गीत है। इसमें प्रकृति की सुंदरता को केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि प्रेम के अनुभव का हिस्सा बनाया गया है। विशाल आकाश से कुछ सितारे चुरा लेने और खूबसूरत वादियों से कुछ नजारे अपने साथ ले जाने की कल्पना गीत को एक सहज रोमांटिक रंग देती है...

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क्या होगा जब किसी पार्क में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित सामूहिक बलात्कार हो और इंसाफ की मांग का शोर चंद मिनटों में तुकबंदी के मुकाबले में बदल जाए? जरूर, पुलिस से जवाब मांगे जाने चाहिए, अफसरों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और बेटियों की हिफाजत सुनिश्चित होनी चाहिए। लेकिन, दिल्ली में एक गंभीर वारदात के बाद सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे नारे छा गए, मानो इंसाफ की लड़ाई नहीं, कोई हास्य कवि सम्मेलन चल रहा हो!

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भारतीय सिनेमा में कुछ रचनाएं इस तरह प्रयोग में लाई जाती हैं कि इनके पर्दे पर आते ही किसी दृश्य का प्रभाव पूरी तरह बदल जाता है। 'हनुमान चालीसा' भी उनमें से एक है। इस रचना का हिंदी फिल्मों में इस्तेमाल कभी भय और संकट के बीच आस्था जगाने के लिए हुआ, तो कभी किसी पात्र की भीतरी शक्ति को जाग्रत होते दिखाने के लिए...। कुछ फिल्मों में इसका पाठ कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बना तो कहीं इसकी धुन ने सामान्य से दिखने वाले दृश्य को भी यादगार बना दिया...

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