ताजा खबर : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया सोमनाथ मंदिर में कुंभ अभिषेक * ऑपरेशन सिंदूर के एक वर्ष पूरे होने पर सशस्त्र बलों को सलाम * भारत का कुल समुद्री खाद्य निर्यात ₹72,000 करोड़ के उच्चतम स्तर पर पहुंचा

आह, गर्मी की छुट्टियां! यह वाक्य कभी आज़ादी की महक लेकर आता था। तीस-चालीस साल पहले भारत में पले-बढ़े बच्चों के लिए गर्मी की छुट्टियां कैलेंडर की तारीख़ नहीं, साल का सबसे बड़ा उत्सव होती थीं। स्कूल की आख़िरी घंटी बजते ही लगता था, मानो जेल का फाटक खुल गया हो। वे भी क्या दिन थे...

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उनके लिए युद्ध एक खेल था। वे आए, धमाकेदार आतिशबाजी की, बम, मिसाइल, ड्रोन खूब चले, हजारों मरे, रिहाइशें तबाह हुईं, हवा जहरीली हुई, तापमान बढ़ा, समुद्र खौला, जंगल नष्ट हुए। वे तो गए। मानसून की चाल बिगड़ गई। अब भुगतो...

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रात के अंधेरे में शहर डराते नहीं; डर तब लगता है, जब उजाले में इंसानियत खोने लगे। डर तब लगता है, जब किसी अस्पताल की कतार में खड़ी बीमार मां को पीछे धकेलकर कोई सीना तानकर कहे, "जानते नहीं, मैं कौन हूं?

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साल 1947 का विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ज़ख्म है। लाखों लोग बेघर हुए। अनगिनत परिवार बिछड़ गए। नफ़रत की आग में पूरा उपमहाद्वीप झुलस गया। आज भी उस दौर की कहानियां सुनकर रूह कांप उठती है...

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ब्लॉकबस्टर फिल्मों ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर : द रिवेंज’ की शानदार सफलता के बाद अभिनेता राकेश बेदी अब सोनू त्यागी की बहुप्रतीक्षित आध्यात्मिक वेब सीरीज ‘टू ग्रेट मास्टर्स’ में मेजबान की भूमिका निभाते नजर आएंगे।

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कभी घर सिर्फ ईंट और छत नहीं होते थे, यादों के गोदाम होते थे। उन यादों की रखवाली करते थे, कई भारी-भरकम ट्रंक और खनखनाते कनस्तर...

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एक गांव में एक बुजुर्ग काका बहुत बीमार पड़ गए और उन्हें शहर के अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। कुछ दिन बाद गांव वालों ने आपस में तय किया कि वे सब मिलकर उन्हें देखने शहर जाएंगे। फिर सबके सामने एक समस्या आ खड़ी हुई कि शहर कैसे जाएं?

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कब तक 80 प्रतिशत आबादी खुद को कमजोर समझती रहेगी? कब तक बहुसंख्यक होकर भी राजनीतिक रूप से बिखरे रहेंगे? क्या सच में यह देश अपने ही मूल समाज से कटता जा रहा था? और सबसे बड़ा सवाल; क्या ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर एक खामोश अन्याय चल रहा था...

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A single punch in a school corridor can shatter a childhood in seconds. We like to think of schools as sanctuaries; places where discipline and dreams are nurtured. But on April 25, at Delhi Public…

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Ah, summer vacation! Those two words once carried the fragrant romance of freedom. For children who grew up in India thirty or forty years ago, summer holidays were not just dates on a calendar. They…

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आगरा, मथुरा और हाथरस का यह पवित्र त्रिकोण कृष्ण प्रेम की मीठी धुन पर थिरकता है। यमुना की लहरों और ब्रज की धूल में दूध, घी और खोए की महक आज भी घुली हुई है...

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