यदि किसी दिन आपको पता चले कि आपके शहर की आबादी लाखों बढ़ गई है, स्कूलों में सीटें कम पड़ रही हैं, अस्पतालों में कतारें लंबी होती जा रही हैं, मजदूरी घट रही है और सरकारी योजनाओं का बोझ लगातार बढ़ रहा है, तो क्या आप इसे महज संयोग मानेंगे?
Read Moreयदि किसी दिन आपको पता चले कि आपके शहर की आबादी लाखों बढ़ गई है, स्कूलों में सीटें कम पड़ रही हैं, अस्पतालों में कतारें लंबी होती जा रही हैं, मजदूरी घट रही है और सरकारी योजनाओं का बोझ लगातार बढ़ रहा है, तो क्या आप इसे महज संयोग मानेंगे?
Read Moreआज रात खाने में क्या बनेगा? यह सवाल शायद दुनिया का सबसे साधारण सवाल है। हर घर में पूछा जाता है। कभी प्यार से, कभी शिकायत के साथ, कभी मज़ाक में। लेकिन, अगर यही सवाल किसी की जान ले ले तो?
Read More"हमें इस देश में एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जिसका इन कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया हो... हर मामले को अदालत में घसीट लिया जाता है... इस देश में ऐसी याचिकाएं सिर्फ़ विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए दाखिल की जाती हैं।" ये तीखी टिप्पणियां गत 11 मई को सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ ने कीं, जिसकी अगुवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे थे। मामला गुजरात के पीपावाव बंदरगाह के विस्तार और आधुनिकीकरण की पर्यावरण मंज़ूरी को चुनौती देने वाली याचिका का था...
Read Moreभारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 की तारीख एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल घोषित कर दिया था। 21 मार्च 1977 तक चले इस दौर में नागरिक स्वतंत्रताओं पर कठोर प्रतिबंध लगे, विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया और समाचारपत्रों पर सरकारी सेंसरशिप लागू कर दी गई। आज नरेंद्र मोदी के शासनकाल में भी विपक्ष, पत्रकारों और नागरिक अधिकारों के समर्थकों का एक वर्ग देश में ‘अघोषित आपातकाल’ होने का आरोप लगाता है। दोनों दौरों की तुलना करते समय सवाल उठता है कि क्या वास्तव में स्थितियां समान हैं, या राजनीतिक असहमति पर दबाव डालने के तरीके बदल गए हैं?
Read Moreआगरा के पास उत्तर प्रदेश के एक छोटे कस्बे में 1970 के दशक में स्कूल मास्टर रघुनाथ प्रसाद सुबह अंधेरे में उठते थे। घर में न बिजली का भरोसा था, न नल में पानी आता था। लालटेन की रोशनी में बच्चे पढ़ते थे। राशन की दुकान पर लाइन लगती थी। साइकिल या बैलगाड़ी ही सफर का सहारा थी। बीमारी में डॉक्टर मिल जाए, तो गनीमत समझिए। टेलीफोन किसी बड़े साहब के घर दिखता था...
Read Moreहरित हाइड्रोजन भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन के स्तंभ के रूप में उभर रहा है। इसका उत्पादन नवीकरणीय बिजली का उपयोग करके पानी को विभाजित करके किया जाता है। यह उर्वरक उत्पादन, पेट्रोलियम शोधन, लोहा और इस्पात विनिर्माण, भारी शुल्क सड़क परिवहन और शिपिंग जैसे क्षेत्रों में उत्सर्जन को कम करने में मदद कर सकता है...
Read Moreभारत की अंतरिक्ष यात्रा 1963 में केरल के थुम्बा से लॉन्च किए गए एक साउंडिंग रॉकेट के साथ जो शुरू हुई थी, वह अब एक प्रस्तावित 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' की ओर मुखातिब हो रही है। नई अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियां इस प्रगति को गति दे रही हैं। इनमें पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान, इलेक्ट्रिक, ग्रीन और परमाणु प्रणोदन, और इन-ऑर्बिट सर्विसिंग सभी शामिल हैं...
Read Moreउत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को चुनौती आखिर देगा कौन? चुनावी रणभेरी बजने से पहले ही सियासी गलियारों में यह सवाल गूंजने लगा है। न कोई बड़ा जनाक्रोश दिख रहा है, न विरोधियों के हाथ कोई ऐसा मुद्दा नजर आता है, जिस पर सत्ता-विरोधी लहर खड़ी हो सके...
Read Moreजयपुर में कुछ स्थान ऐसे हैं, जहां पहुंचकर लगता है कि इतिहास केवल किताबों के पन्नों में दर्ज घटनाओं का नाम नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव है। आमेर का किला ऐसा ही एक स्थान है। अरावली की पहाड़ियों के बीच बसा यह दुर्ग दूर से ही अपनी भव्यता से आकर्षित करता है। पहाड़ी की ढलान पर फैली मजबूत प्राचीर, ऊंचे दरवाजे और बलुआ पत्थर से बनी दीवारें उस दौर की याद दिलाती हैं, जब स्थापत्य कला केवल सुंदरता का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता, सुरक्षा और प्रतिष्ठा का प्रतीक भी हुआ करती थी...
Read Moreयह नेताओं को क्या हो गया है? लोकतंत्र में सवाल उठते हैं, दलीलें दी जाती हैं और सरकारों को कठघरे में खड़ा किया जाता है। मगर भारतीय सियासत का नया तमाशा देखिए! यहां मुद्दों की जगह मुहावरों ने ले ली है। नीतियों की जगह निजी हमले हैं। बहस की जगह बदजुबानी का बाजार गर्म है। ऐसा लगता है कि संसद और चुनावी मंचों के बीच कहीं कोई कुश्ती का अखाड़ा खुल गया है। फर्क बस इतना है कि पहलवानों की जगह नेता हैं और तालियां बजाने वालों में जनता के साथ टीवी कैमरे भी शामिल हैं।
Read More
भारत की शिक्षा व्यवस्था के अंधेरे गलियारों में आखिर रेंगता क्या है? सपने? महत्वाकांक्षाएं? उम्मीदें? या फिर कुछ और? आधी रात को मेज पर झुका एक टीनएजर। लाल आंखें। थका हुआ शरीर। सामने बिखरे टेस्ट…
Read More
When every hand holds a mobile phone, every phone becomes a newsroom, and every social media influencer starts calling himself a journalist, who will separate the genuine from the fake? Does holding…
Read More
Makhana, or fox nut, has emerged as a fast-growing agri-food product in India. This is due to its nutritional value, rising health awareness, and increasing global demand.
Read More