ताजा खबर : वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में भारत के इस्पात क्षेत्र में नियमित रूप से वृद्धि जारी रही * मुंबई का जवाहर द्वीप भारत का पहला प्लास्टिक-मुक्त ऑयल टर्मिनल बना * भारतीय सुरक्षा बलों ने जम्मू और कश्मीर में खुफिया जानकारी आधारित ऑपरेशन में लश्कर-ए-तैयबा के सीनियर कमांडर मूसा को मार गिराया

क्या हम अपने बच्चों के लिए एक हरा-भरा भारत छोड़ेंगे, या धूल, धुएं और सूखी नदियों का देश? यह सवाल आज किसी पर्यावरणविद् की चिंता भर नहीं है। यह आगरा की यमुना के किनारे खड़े हर नागरिक का सवाल है। यह हिमालय की गोद में बसे गांवों की चिंता है। यह उन लाखों लोगों का डर है जो हर सर्दी जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं...

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सावित्री देवी को वह शाम आज भी याद है जब उनकी बेटी ने किताब पढ़ते समय आंखें सिकोड़ना बंद कर दिया था। उत्तराखंड के एक छोटे से पहाड़ी गांव में वर्षों तक बारह साल की प्रिया मिट्टी के तेल की ढिबरी के सामने बैठकर पढ़ती थी। पीली, कांपती हुई लौ। धुएं से भरा कमरा। आंखों में जलन। कई बार तेल खत्म हो जाता और पढ़ाई भी। फिर, पिछले साल उनकी छत पर एक सौर पैनल लग गया...

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आयुर्वेद में ‘अरिष्ट’ नाम के हर्बल टॉनिक सदियों से पाचन शक्ति, चयापचय और संपूर्ण स्वास्थ्य को मज़बूत करने के लिए उपयोग किए जाते रहे हैं। ये प्राकृतिक किण्वन से तैयार होते हैं और शरीर को संतुलित रखने में मदद करते हैं। इनमें से अभयारिष्ट और पंचारिष्ट (पंच अरिष्ट) दो प्रमुख औषधियाँ हैं, जो देखने में समान लग सकती हैं लेकिन उनके उद्देश्य और संरचना अलग-अलग हैं...

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त्रिफला, जो आयुर्वेद का प्राचीन मिश्रण है और आंवला, बिभीतकी तथा हरितकी तीन फलों से बना है, लंबे समय से शरीर को शुद्ध करने और पुनर्जीवित करने के लिए जाना जाता है। अक्सर लोग यह पूछते हैं कि इसे सुबह लेना बेहतर है या शाम को। सच तो यह है कि दोनों समय के अपने अलग-अलग लाभ हैं और चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस उद्देश्य से इसे ले रहे हैं...

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यदि किसी दिन आपको पता चले कि आपके शहर की आबादी लाखों बढ़ गई है, स्कूलों में सीटें कम पड़ रही हैं, अस्पतालों में कतारें लंबी होती जा रही हैं, मजदूरी घट रही है और सरकारी योजनाओं का बोझ लगातार बढ़ रहा है, तो क्या आप इसे महज संयोग मानेंगे?

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आज रात खाने में क्या बनेगा? यह सवाल शायद दुनिया का सबसे साधारण सवाल है। हर घर में पूछा जाता है। कभी प्यार से, कभी शिकायत के साथ, कभी मज़ाक में। लेकिन, अगर यही सवाल किसी की जान ले ले तो?

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"हमें इस देश में एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जिसका इन कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया हो... हर मामले को अदालत में घसीट लिया जाता है... इस देश में ऐसी याचिकाएं सिर्फ़ विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए दाखिल की जाती हैं।" ये तीखी टिप्पणियां गत 11 मई को सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ ने कीं, जिसकी अगुवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे थे। मामला गुजरात के पीपावाव बंदरगाह के विस्तार और आधुनिकीकरण की पर्यावरण मंज़ूरी को चुनौती देने वाली याचिका का था...

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भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 की तारीख एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल घोषित कर दिया था। 21 मार्च 1977 तक चले इस दौर में नागरिक स्वतंत्रताओं पर कठोर प्रतिबंध लगे, विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया और समाचारपत्रों पर सरकारी सेंसरशिप लागू कर दी गई। आज नरेंद्र मोदी के शासनकाल में भी विपक्ष, पत्रकारों और नागरिक अधिकारों के समर्थकों का एक वर्ग देश में ‘अघोषित आपातकाल’ होने का आरोप लगाता है। दोनों दौरों की तुलना करते समय सवाल उठता है कि क्या वास्तव में स्थितियां समान हैं, या राजनीतिक असहमति पर दबाव डालने के तरीके बदल गए हैं?

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आगरा के पास उत्तर प्रदेश के एक छोटे कस्बे में 1970 के दशक में स्कूल मास्टर रघुनाथ प्रसाद सुबह अंधेरे में उठते थे। घर में न बिजली का भरोसा था, न नल में पानी आता था। लालटेन की रोशनी में बच्चे पढ़ते थे। राशन की दुकान पर लाइन लगती थी। साइकिल या बैलगाड़ी ही सफर का सहारा थी। बीमारी में डॉक्टर मिल जाए, तो गनीमत समझिए। टेलीफोन किसी बड़े साहब के घर दिखता था...

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हरित हाइड्रोजन भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन के स्तंभ के रूप में उभर रहा है। इसका उत्पादन नवीकरणीय बिजली का उपयोग करके पानी को विभाजित करके किया जाता है। यह उर्वरक उत्पादन, पेट्रोलियम शोधन, लोहा और इस्पात विनिर्माण, भारी शुल्क सड़क परिवहन और शिपिंग जैसे क्षेत्रों में उत्सर्जन को कम करने में मदद कर सकता है...

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