कभी मोहब्बत बगावत हुआ करती थी। घर से लड़ाई। समाज से टकराव। फिल्मी अंदाज़ में, “प्यार किया तो डरना क्या!” लड़का-लड़की भागकर शादी कर लेते थे। कोर्ट में दो गवाह। या आर्य समाज मंदिर में सात फेरे। ना बैंड, ना बाजा, ना बारात। बस दिल की जिद। मां-बाप सालों तक रूठे रहते। मोहल्ले में कानाफूसी चलती रहती थी। पर इश्क में एक आग होती थी। एक दीवानगी। अब तस्वीर बदल गई है।
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