विविधा और व्यंग्य

सुबह की धुंध में ताज महल जब धीरे-धीरे उभरता है, तो लगता है कोई राज़ खोलने वाला है। संगमरमर की खामोशी पूछती है, क्या इश्क़ अब भी इतना ही गहरा है, या वह मोबाइल की स्क्रीन पर सिमट गया है?

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उत्तर भारत में घूंघट सिर्फ़ एक परंपरा नहीं, बल्कि औरत की पहचान पर एक सवालिया निशान है। यह लेख एक महिला की ज़िंदगी के ज़रिये उस ख़ामोश क़ैद और धीमी आज़ादी की कहानी कहता है, जहां तालीम, काम और आत्मसम्मान ने घूंघट की घुटन को तोड़ा। यह दास्तां है बिना शोर के आए बदलाव की...

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पिछले हफ्ते मॉर्निंग वॉक पर अचानक भाटिया जी से मुलाक़ात हो गई। उम्र ढल चुकी थी, चाल में ठहराव था, और आंखों में एक अजीब-सी राहत। बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला, 42 साल बाद उन्होंने हमेशा के लिए बोरिया-बिस्तर बांध लिया और अमेरिका को अलविदा कह दिया। वजह बस इतनी थी कि अपनी जीवन संध्या में, उनको अपने शहर की मिट्टी की खुशबू ने वापस खींच लिया...

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एक अरसे के बाद, मैं अपने नाती को लेने स्कूल पहुंचा। छुट्टी में अभी वक्त था, सोचा कि एक चक्कर लगा लूं। तभी मोड़ पर 7–8 बच्चे दिखे। एक एलीट स्कूल के चकाचौंधभरे कॉरिडोर में उनकी भाषा सुनकर कान सुन्न पड़ गए। ‘जेन-जी’ की तेज़, कटी-कटी, इमोजी-टपकाती जुबान… और हर वाक्य में चार-अक्षरों की भीषण आग...

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बीते 28 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फ़ैसला दिया है जिसने पूरे मुल्क को झकझोर दिया है। अदालत ने उस शख़्स की ज़मानत रद्द कर दी जिस पर शादी के महज़ चार महीने बाद ही बीवी को ज़हर देकर मारने का इल्ज़ाम है।

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एक तंग-सी कोठरी में 28 साल के रमेश की अम्मा आज भी शाम होते ही उसके स्कूटर की आहट सुनने को बेचैन रहती हैं। बस 11 महीने पहले उसकी शादी हुई थी। दीवारों पर अब भी वही चमकदार, कुछ हद तक दिखावटी शादी के फ़ोटोग्राफ़ मुस्कुरा रहे हैं, लेकिन उन तस्वीरों का वह नौजवान अब कहीं नहीं है। उसकी मौत ‘शादी से जुड़े मसले’ के तहत दर्ज हुई, एक ऐसा चौंकाने वाला तथ्य जिसमें 2023 में पहली बार मर्दों की खुदकुशियाँ औरतों से ज़्यादा हुईं।

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