अस्पताल का दरवाज़ा खुलते ही हर इंसान अपनी जान डॉक्टर के हवाले कर देता है। उसे यक़ीन होता है कि अब उसकी ज़िंदगी महफ़ूज़ है। लेकिन, जब वही अस्पताल उम्मीद की जगह मातम का घर बन जाए, तो सबसे बड़ा सवाल उठता है। क्या इलाज अब इंसानियत का फ़र्ज़ रह गया है, या सिर्फ़ मुनाफ़े का धंधा बनता जा रहा है...
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