संपादकीय

हाल ही में एक ज्ञानी बाबाजी से टकराहट हुई। वह बोले "कलियुग आ चुका है, अमेरिका, यानी पश्चिम, से शुरू हुआ है, फिर मध्य एशिया, अंत में भारतीय क्षेत्र पर सौ साल में छा जाएगा। तब तक आगे बढ़ना है। नीचे गिरने से पूर्व तरक्की की बुलंदियां छूनी होती हैं, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पश्चिमी समाज को गर्त में पहुंचाने के लिए ही अवतरित हुए हैं।" उनकी बातें सुनकर कुछ लोगों का सोया हास्य रस जाग्रत हुआ...

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भारत की हर वयस्क, गैर-पेंशनभोगी और गैर-आयकरदाता महिला को ₹5,000 मासिक ‘यूनिवर्सल बेसिक सैलरी’ देना न केवल आर्थिक रूप से पूरी तरह संभव है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और जमीनी विकास के लिए आवश्यक है। यह एक सीधी, सम्मानजनक और भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था बनकर उन अनगिनत भारतीय महिलाओं को औपचारिक रूप से “कमाने वाली” की पहचान दे सकती है, जिनके श्रम ने दशकों से परिवार और समाज की रीढ़ तो संभाली, पर उन्हें कभी आर्थिक स्वतंत्रता नहीं मिली...

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दोपहर की तपती धूप। सड़क किनारे सरकारी पंप। फटे-कपड़ों में एक आदमी, जिसे देखने वाले ‘भिखारी टाइप’ कह सकते हैं, महीनों बाद पानी से बदन भिगो रहा है। तभी एक चमचमाती कार रुकती है। भीतर से उतरी एक संभ्रांत महिला नाक सिकोड़कर कहती है, “देखो, कितना पानी बेकार बहा रहा है!

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गांधी परिवार की रणनीति हमेशा यह रही है कि पार्टी का मुखिया कोई ऐसा व्यक्ति हो जो ‘काबू में’ रहे। वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे इस सोच के लिए बिल्कुल मुफ़ीद साबित हुए हैं...

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लहरिया सराय का 40 वर्षीय युवा राम सहाय रेलवे स्टेशन पर आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां उसका हर कदम आगे बढ़ता है तो कोई न कोई ताक़त उसे पीछे खींच लेती है। गांव की मिट्टी की सुगंध, और शहरी चकाचौंध के आकर्षण से जूझता यह शख्स हर भारतीय नागरिक की दुविधा का आईना बन चुका है...

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भारत की राजनीति में विचारधाराएं अब जाति के आगे नतमस्तक हैं। कम्युनिस्ट आंदोलन इतिहास बन चुके हैं, राष्ट्रवाद थका हुआ दिखता है, और धर्म की अफीम भी जातीय दीवारों को ढहाने में असमर्थ रही है। जाति अब भारतीय समाज की आत्मा में गहराई तक समा चुकी है...

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