पर्यावरण / मौसम

हाल ही में, आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह कोई संयोग या महज़ दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा यमुना में उतरे। दो घंटे तक उन्हें बचाने की कोशिशें चलती रहीं, लेकिन अंततः चार बच्चों के शव बाहर निकाले गए। आए दिन ये दुर्घटनाएं हो रही हैं। पुलिस ने घाटों पर होर्डिंग लगाए हैं, सावधान किया है, पर लोग हैं कि मानते नहीं। वाकई, परिवारों का दुख शब्दों से परे है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी आस्था, इतिहास और सभ्यता सांस लेती आई है, आज मौत की गवाह बनती जा रही है...

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21 मई 1993 को आगरा की पानी की टोंटियों से मौत बह निकली थी। घटिया, खटीक पाड़ा और मंडी सईद खान की तंग गलियों में लोगों ने रोज़ की तरह वाटर वर्क्स का पानी पिया। कुछ ही घंटों में घरों में अफरा-तफरी मच गई। बच्चों को उल्टियां और तेज़ बुखार होने लगा। पूरे परिवार अस्पतालों की तरफ भागे। 200 से ज़्यादा लोग बुरी तरह बीमार पड़े। दूषित पानी पीने से 21 लोगों की जान चली गई...

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स्वच्छता के सफर में बदलाव की कई ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें जानना बेहद ज़रूरी है। ये उन महिलाओं की कहानियां हैं, जो कचरे से रोज़गार पैदा कर रही हैं, अपने समुदायों में साफ-सफाई के कामों की अगुवाई कर रही हैं और रोज़मर्रा की चुनौतियों को अवसरों में बदल रही हैं। उनके साथ ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी हैं, जो साफ-सफाई की सेवाओं में पेशेवर भूमिकाएं और पहचान पा रहे हैं।

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तेज़ी से बढ़ते शहरों में, पानी का इस्तेमाल होने के बाद पानी का चक्र खत्म नहीं होता है। घरों, कारखानों और आस-पड़ोस से बहकर निकलने वाले पानी को सही व्यवस्था के साथ, इस्तेमाल कर, पुन: एकत्र किया जा सकता है। उसका उपचार किया जा सकता है। पुनर्चक्रित किया जा सकता है और फिर से काम में लाया जा सकता है...

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भारत का स्वच्छता से नाता ऐतिहासिक है। सिंधु घाटी के पुरातात्विक सबूतों से पता चलता है कि वहां सफ़ाई की बेहतरीन व्यवस्था थी। आज के गुजरात स्थित लोथल जैसे शहरों में सुनियोजित नक्शे और बड़ी नालियों के नेटवर्क की व्यवस्था थी। कई घरों में निजी शौचालय थे जो नालियों से जुड़े हुए थे। इस व्यवस्था में ठोस कचरे का प्रबंधन करने के लिए निगरानी बिंदु और इससे संबंधित ढांचे भी शामिल थे...

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​26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक भयंकर बाढ़ और मिट्टी का सैलाब आया। ऊंचाई पर स्थित एक ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर गिर गया। करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा नीचे गिरा और ल्हेंदे नदी में जा गिरा। यह जगह रसुवागढ़ी-ग्यीरोंग सीमा चौकी से करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। मलबे ने नदी को कुछ देर के लिए रोक दिया। फिर पानी, कीचड़ और पत्थरों का तेज सैलाब नीचे की तरफ दौड़ पड़ा।

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​नदियां कभी सरहदें नहीं मानतीं। वे जीवन, संस्कृति और सभ्यता को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती हैं। लेकिन, जब कोई शहर या राज्य अपनी गंदगी नदी में उड़ेल देता है, तो वह ज़हर भी सीमाएं नहीं मानता। वह भी बहते-बहते दूर तक पहुंचता है। आज यमुना इसी राष्ट्रीय शर्म की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है।

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भीषण गर्मी ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। मानसून की बेरुखी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। यमुना नदी महीनों से सूखी और प्रदूषित पड़ी है। कई घाटों पर पानी की जगह रेत और गंदगी दिखाई देती है। भूजल लगातार नीचे जा रहा है। ट्यूबवेल जवाब देने लगे हैं। अगर जुलाई में भी अच्छी बारिश नहीं हुई, तो ताज महल का शहर प्यास, गर्मी और जल संकट की त्रासदी से जूझने को मजबूर हो जाएगा।

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उनके लिए युद्ध एक खेल था। वे आए, धमाकेदार आतिशबाजी की, बम, मिसाइल, ड्रोन खूब चले, हजारों मरे, रिहाइशें तबाह हुईं, हवा जहरीली हुई, तापमान बढ़ा, समुद्र खौला, जंगल नष्ट हुए। वे तो गए। मानसून की चाल बिगड़ गई। अब भुगतो...

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क्या हमारी नदियां अब सिर्फ नक्शों में बचेंगी? या फिर हम उन्हें सच में “राष्ट्रीय संपत्ति” मानकर बचाने की जद्दोजहद करेंगे?

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