पर्यावरण / मौसम

ज़रा जाड़े की उस सुबह की कल्पना कीजिए, धुंध इतनी गाढ़ी कि ताज महल का सफ़ेद संगमरमर भी भूत-सा दिखने लगे। हवा में ऐसी सड़ांध कि सांस लेते ही सीने में जलन हो और ठीक ताज के पीछ, यमुना नदी, जिसने कभी मुग़लों का इतिहास देखा, आज ज़हरीले झाग का उबलता कब्रिस्तान बन चुकी है। ऐसा लगता है मानो ताज महल अपनी ही धीमी मौत का मातम मना रहा हो।

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18 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक खामोश लेकिन बोल्ड फैसले में, वह दरवाज़ा फिर खोल दिया जिसे उसने पहले पूरी ताक़त से बंद कर दिया था। जो काम पहले ग़ैर-क़ानूनी कहा गया था, उसे अब अपवाद बना दिया गया है। असल में कोर्ट ने सिर्फ़ क़ानून की व्याख्या नहीं बदली, उसने जवाबदेही का मायना बदल दिया। एक मुल्क जहां हवा ज़हरीली, नदियां बीमार और जंगल ग़ायब हो रहे हों, वहां यह फैसला क़ानूनी उलझन नहीं बल्कि एक खतरे का संकेत हो सकता है।

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इस साल मॉनसून के समय पर आगमन ने पूरे भारत के किसानों के चेहरों पर खुशी ला दी। नदियां उफान पर रहीं, जलाशय लबालब भर गए, नहरों का जलस्तर उम्मीदों से ऊपर रहा। लेकिन, सितंबर तक जारी रही बारिश के बाद अब फिर हर साल की तरह पानी की कमी और आपूर्ति में रुकावट की चिंता सताने लगी है।

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मथुरा में यमुना किनारे शाम ढल रही है। आरती की घंटियां बज रही हैं, अगरबत्तियां जल रही हैं, पुजारी मंत्रोच्चार कर रहे हैं, और सैकड़ों श्रद्धालु पवित्रता व मोक्ष की कामना में एकत्र हैं। लेकिन, गेंदा फूलों की महक के उस पार एक कड़वी हक़ीक़त है, प्लास्टिक कचरा यमुना में तैर रहा है, रासायनिक झाग डरावने अंदाज़ में चमक रहे हैं, और यह नदी, जो करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है, उपेक्षा के बोझ तले कराह रही है। यही दृश्य गंगा, कावेरी, नर्मदा के किनारों पर देखने को मिल सकते हैं...

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भारत का नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र एक नए रूपान्‍तरकारी चरण में प्रवेश कर रहा है, जो न केवल क्षमता वृद्धि की गति से बल्कि इसकी प्रणालियों की मजबूती, स्थिरता और गहनता से भी परिभाषित होगा। एक दशक के रिकॉर्ड विस्तार के बाद, अब फोकस मज़बूत, वितरण योग्य और लचीली स्वच्छ ऊर्जा संरचना के निर्माण पर केंद्रित है जो 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता प्राप्त करने के देश के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक हो सके...

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राजस्थान के रेगिस्तान को बढ़ने से रोकने और हरियाली बढ़ाने में इंदिरा गांधी नहर और बेहतर जल प्रबंधन ने अहम भूमिका निभाई है। इस परियोजना ने थार के रेगिस्तान में पानी पहुंचाकर कृषि योग्य भूमि बढ़ाई, वनाच्छादन को प्रोत्साहित किया और स्थानीय वर्षा दर में सुधार किया है।

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