अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। टिकटों के लिए घेराबंदी तेज है, विपक्षी दल तालमेल की गांठें कस रहे हैं और भाजपा नेता पूरे भरोसे से कह रहे हैं, “हमारा काम बोलेगा।
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अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। टिकटों के लिए घेराबंदी तेज है, विपक्षी दल तालमेल की गांठें कस रहे हैं और भाजपा नेता पूरे भरोसे से कह रहे हैं, “हमारा काम बोलेगा।
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आखिर एक इमारत सदियों तक कैसे टिकती है? अच्छी सामग्री? समझदार इंजीनियरिंग? नियमित रखरखाव? या प्रकृति का सम्मान? लगता है, इन सबकी जरूरत होती है। बस शायद नगर निगम के प्रमाणपत्र की नहीं...
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एक तरफ योगी की मजबूत सत्ता, सख्त कानून-व्यवस्था और चमकते एक्सप्रेसवे हैं। दूसरी तरफ बेरोजगार युवा, पेपर लीक और सोशल मीडिया पर गरजता एक अजीब नारा, “हम कॉकरोच हैं!” चुनावी बिगुल अभी बजा भी नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासी गलियों में सवाल गूंज रहा है कि हवा किस तरफ है?
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जब दूसरे राज्य ‘तमिल प्राइड’, ‘मराठा गौरव’, ‘पंजाबियत’, ‘कश्मीरियत’, या ‘बंगाली अस्मिता’ जैसी अपनी क्षेत्रीय शान का ढोल पीटते हैं, तब उत्तर प्रदेश हमेशा “एक भारत” की बात करता है। पश्चिम और दक्षिण भारत के कुछ लोग जब यूपी को पिछड़ा बताकर उसकी जीडीपी या राष्ट्र निर्माण में योगदान पर सवाल उठाते हैं, तब वे एक बड़ी सच्चाई भूल जाते हैं। उत्तर प्रदेश सिर्फ नक्शे पर बना एक राज्य नहीं है। यह भारत की रूह, दिल, तहज़ीब और सियासत की धड़कन है...
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चम्बल। नाम लेते ही दिल धक से धड़क जाता था। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं के बीच पसरे वे बीहड़ किसी भूगोल की साधारण रचना नहीं हैं। वे धरती के फटे हुए सीने जैसे थे, गहरे, टेढ़े मेढ़े, रहस्यमयी। सूरज की रोशनी भी वहां सीधी नहीं उतरती थी, जैसे डरती हो कि कहीं लौट न पाए। धूल ऐसी उड़ती थी मानो हर कण में एक अधूरी कहानी अटकी हो। कहीं खामोशी इतनी गाढ़ी कि कानों में गूंजने लगे, तो कहीं अचानक किसी अज्ञात दिशा से आती आवाज दिल की धड़कन बढ़ा दे...
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ग्रेट निकोबार परियोजना एक सामरिक पहल है, जिसका उद्देश्य अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की उपस्थिति को सशक्त बनाना है। यह परियोजना बंदरगाह-आधारित विकास और सटीक पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के साथ-साथ स्थानीय मूल समुदायों के संरक्षण के बीच एक आदर्श संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है...
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हवा का मिज़ाज बदल रहा है। रंग भी। गलियों से लेकर गलीचों तक, चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक, एक हल्की-सी केसरिया आभा तैरती नजर आ रही है। सवाल यह नहीं कि हवा चल रही है या नहीं। सवाल यह है कि यह हवा किस दिशा में बह रही है, और किसे अपने साथ उड़ा ले जाएगी...
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भारत बदल चुका है। चेहरा भी, चाल भी, चरित्र भी। सत्ता की भाषा बदली, शासन का व्याकरण बदला। पर असली सवाल अब सामने खड़ा है कि क्या यह बदलाव की आंधी आगे भी चलेगी, या अब इसकी सांस फूलने लगी है? 4 मई को पांच राज्यों के नतीजे इस पहेली का जवाब लिखेंगे।
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नवी मुंबई की टेक्सटाइल रिकवरी फैसिलिटी, चक्रीय प्रणालियों और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से वस्त्र अपशिष्ट को अवसरों में बदलने का काम कर रही है। यह पहल न केवल लैंडफिल कचरे को कम कर रही है, बल्कि रोजगार के नए रास्ते भी खोल रही है और शहरी भारत के लिए एक प्रभावी व विस्तार योग्य मॉडल पेश कर रही है...
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बीती पहली तारीख की तपती दोपहर में मदुरै की ज़मीन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी सियासी बिजली की तरह उतरे। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले उन्होंने एनडीए में नई जान फूंक दी। विकास, भक्ति और तीखे बयान, तीनों का ज़बर्दस्त संगम दिखा। मकसद साफ था। डीएमके के लंबे क़ब्ज़े को चुनौती देना...
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