दुनिया

बड़ा धमाका हुआ। पर्दे उठे। लेकिन कहानी और उलझ गई। अमेरिका के न्याय विभाग ने जेफ्री एप्सटीन से जुड़ी लाखों फाइलें जनता के सामने रख दीं। करीब साढ़े तीन मिलियन पन्ने। हजारों तस्वीरें। सैकड़ों वीडियो। कानून बना, दबाव बढ़ा, और आखिरकार सच का दरवाज़ा थोड़ा खुला।

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​खामोशी कभी-कभी सबसे बड़ा गुनाह बन जाती है। और आज वही घड़ी है। सभ्य दुनिया की इस चुप्पी में कोई समझ नहीं, कोई नैतिकता नहीं; सिर्फ एक ठंडी साजिश नज़र आती है। एक सवाल है जो रातों को जागता रखता है। एक बेचैनी है जो गले में फंस गई है। एक इंतज़ार है जो अब और नहीं सहा जा सकता।

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ईरान कितने दिन तक टिकेगा? पंद्रह दिन? एक महीना? या लंबी, थकी हुई सांसों में खिंचता हुआ सालों का सिलसिला? सवाल सीधा है। जवाब उलझा हुआ, क्योंकि मुल्क ताश के पत्ते नहीं होते। हवा चली और ढह गए, इतनी सस्ती नहीं होती सभ्यताएं।

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​भरी गर्मी में लगी यह आग कब बुझेगी? जंग कब खत्म होगी? तबाही के मंजर पूछ रहे हैं कि विश्व युद्ध शुरू हुआ है या खत्म?

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भारत की विदेश नीति आज एक ऐसे डायमंड क्रॉसिंग पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां रास्ते एक ही दिशा में नहीं जाते, बल्कि कई ओर खुलते हैं। यहां रिश्ते जकड़े हुए नहीं हैं बल्कि लचीले हैं, और फैसले विचारधारा से ज़्यादा कौमी हितों पर आधारित हैं। बदलती और बेचैन दुनिया में भारत ने किसी एक खेमे में बंधने के बजाय अपने लिए खुली राह चुनी है...

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बौखलाहट अब साफ झलक रही है। यूरोपीय संघ पर उनकी कैप्स-लॉक वाली, बचकानी और अपमानजनक टिप्पणियां कोई साधारण बयान नहीं हैं। ये भारत-यूरोपीय संघ के ऐतिहासिक “मदर ऑफ ऑल डील्स” पर झुंझलाहट का नतीजा हैं...

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