दुनिया

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन की नई दिल्ली यात्रा के दौरान मीरवाइज उमर फारूक से हुई मुलाकात ने भारत की कूटनीति और कश्मीर की राजनीति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। किसी ईरानी राष्ट्रपति का भारत की राजधानी में कश्मीर के एक प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक चेहरे से मिलना निश्चित रूप से सामान्य घटनाक्रम नहीं माना जा सकता है। इसके बावजूद, इस मुलाकात को केवल कश्मीर के नजरिए से देखना शायद ईरान की मौजूदा कूटनीतिक रणनीति को पूरी तरह समझने में मदद नहीं करेगा...

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ब्रसेल्स में छात्र सड़क पर उतर आए और हम भारतीय पर्यटक टॉयलेट की तलाश में उतर गए। यूरोप में शिक्षा महंगी हो रही है। भारत में भी शिक्षा पर राजनीति गरम है। और दोनों के बीच एक बेचारा पर्यटक खड़ा है, जिसे सिर्फ एक मुफ्त टॉयलेट चाहिए। यही है आज का ग्लोबल विलेज! ब्रसेल्स में छात्र कह रहे हैं, “पढ़ाई हमारा हक है।” दिल्ली के कॉकरोच कह रहे हैं, “हम भी यहीं हैं!” और भारतीय पर्यटक पूछ रहा है, “भाई, टॉयलेट किधर है?

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पेरिस ने राजा देखे हैं, राष्ट्रपति देखे हैं, फिल्मी सितारे देखे हैं और फैशन की दुनिया के बड़े नाम भी देखे हैं। लेकिन, अगले सप्ताहांत शहर एक ऐसी हस्ती का स्वागत करने जा रहा है, जिसके साथ ग्लैमर से ज्यादा आस्था जुड़ी है। पोप लियो चौदहवें पेरिस आ रहे हैं...

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चार उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला नाम आज एक बहुत बड़े समूह का रूप ले चुका है। आज यह चार महाद्वीपों तक फैला एक महत्वपूर्ण जियोपॉलिटिकल ब्लॉक है। इसकी यात्रा चार देशों के बीच संवाद से शुरू होकर आज के कहीं अधिक व्यापक समूह तक पहुंची है। सदस्यता के लगातार विस्तार के साथ इसमें तेल-समृद्ध देश, अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाएं और दक्षिण-पूर्व एशिया के साझेदार भी शामिल होते गए। इस विस्तारित व्यवस्था के केंद्र में आज भारत है, जो इस समूह की स्थापना के बाद से इस वर्ष चौथी बार इसकी अध्यक्षता कर रहा है...

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पिछले कुछ दिनों में तिब्बती प्रतिनिधिमंडलों ने कर्नाटक के नेताओं से मुलाकात की है। बेंगलुरु में नवनिर्वाचित तिब्बती सांसद चोप्पेल ने मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से मुलाकात कर शिक्षा, स्वास्थ्य, कल्याण और संस्कृति के संरक्षण के लिए सरकारी सहायता मांगी। उन्होंने कर्नाटक में बसे तिब्बतियों की समस्याओं पर भी ध्यान देने की अपील की...

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“जब तोपें गरजती हैं, तो इंसानियत खामोश हो जाती है…”। पश्चिम एशिया का आसमान इन दिनों सिर्फ धुएं से नहीं, एक खौफनाक सन्नाटे से भी ढका है। मिसाइलों की लकीरें रात को चीरती हैं, ड्रोन मौत का पैगाम बनकर मंडरा रहे हैं, और हर विस्फोट के साथ ऐसा लगता है जैसे दुनिया एक कदम और कयामत के करीब पहुंच रही हो। हवा में बारूद ही नहीं, रेडियोएक्टिव डर भी तैर रहा है। कहीं कोई लाल बटन दबा, और पूरी इंसानियत एक न्यूक्लियर ब्लैकआउट में डूब सकती है। यह कोई फिल्मी सीन नहीं। यह हमारे समय का स्याह सच है...

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लाल झंडे अब कम दिखते हैं। मई दिवस की रौनक भी फीकी पड़ गई है। कभी जो दिन मेहनतकशों की  एकता का पैग़ाम देता था, आज वह बस एक रस्म सा लगता है। मगर सच यह है कि ज़मीन के नीचे अंगारे अब भी सुलग रहे हैं। सवाल वही है; क्या तरक़्क़ी सिर्फ कुछ लोगों के लिए है, या सबके लिए...

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बड़ा धमाका हुआ। पर्दे उठे। लेकिन कहानी और उलझ गई। अमेरिका के न्याय विभाग ने जेफ्री एप्सटीन से जुड़ी लाखों फाइलें जनता के सामने रख दीं। करीब साढ़े तीन मिलियन पन्ने। हजारों तस्वीरें। सैकड़ों वीडियो। कानून बना, दबाव बढ़ा, और आखिरकार सच का दरवाज़ा थोड़ा खुला।

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​खामोशी कभी-कभी सबसे बड़ा गुनाह बन जाती है। और आज वही घड़ी है। सभ्य दुनिया की इस चुप्पी में कोई समझ नहीं, कोई नैतिकता नहीं; सिर्फ एक ठंडी साजिश नज़र आती है। एक सवाल है जो रातों को जागता रखता है। एक बेचैनी है जो गले में फंस गई है। एक इंतज़ार है जो अब और नहीं सहा जा सकता।

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ईरान कितने दिन तक टिकेगा? पंद्रह दिन? एक महीना? या लंबी, थकी हुई सांसों में खिंचता हुआ सालों का सिलसिला? सवाल सीधा है। जवाब उलझा हुआ, क्योंकि मुल्क ताश के पत्ते नहीं होते। हवा चली और ढह गए, इतनी सस्ती नहीं होती सभ्यताएं।

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