साहित्य / मीडिया

पीटर पैन 1902 में लिखे एक उपन्यास का नायक है। राहुल गांधी की छवि की तुलना अकसर 'पीटर पैन' से की जाती है, यानी, वह काल्पनिक लड़का जो बड़ा होने से लगातार इंकार करता है...

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भारतीय इतिहास में संत सुधारकों ने गहन और जटिल आध्यात्मिक ज्ञान को जनसाधारण की भाषा में अनुवादित कर जनसंचार का एक अनोखा माध्यम विकसित किया। यह प्रक्रिया न केवल ज्ञान को सुलभ बनाती थी, बल्कि उसे लोकप्रिय बनाकर समाज में गहराई से स्थापित करती थी...

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कभी अख़बार का संपादक एक संस्था हुआ करता था। उसकी एक पंक्ति से सत्ता की नींव हिल जाया करती थी। लेकिन, आज हालात इतने बदल गए हैं कि अगर पाठकों से पूछा जाए, तो उन्हें अपने पसंदीदा अख़बार के संपादक का नाम तक नहीं मालूम। पत्रकारिता के मूल्यों का सूरज ढल रहा है और उसकी जगह पर बाजारू दबावों का अंधेरा छा गया है। खबर अब महज़ एक उत्पाद है, जिसकी बिक्री और टीआरपी ही सब कुछ तय करती है...

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बात 2011 गर्मियों की है। बेंगलुरु के एक दैनिक अखबार में पढ़ा कि मैसूर से प्रकाशित विश्व का एकमात्र संस्कृत दैनिक समाचारपत्र, आर्थिक हालत खस्ता होने से बंदी के कगार पर था। जिज्ञासा हुई कि इस मृतप्राय: भाषा में कोई अखबार निकालने की कैसे जुर्रत कर सकता है।

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पिछले दो महीनों से कर्नाटक दहशतख़ेज़ ख़बरों से घिरा रहा है। एक ‘व्हिसलब्लोअर’ ने आरोप लगाया कि सैकड़ों महिलाओं और लड़कियों का रेप करके उनकी हत्या की गई और उनकी लाशें श्री मंजूनाथ मन्दिर, धर्मस्थल के आसपास छुपा दी गईं। यह आरोप धमाकेदार था: धर्मस्थल जैसा पवित्र स्थान, छुपे हुए अपराधों की क़ब्रगाह बना दिया गया...

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अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर अत्यधिक टैरिफ लगा दिए हैं और रूस से ऊर्जा खरीद पर रोक लगाने की धमकी दी है। ऐसे में, भारत को मजबूती से जवाब देना चाहिए। एक बड़ा कदम हो सकता है, अमेरिकी सोशल मीडिया कंपनियों जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, गूगल, यूट्यूब पर रोक लगाकर अपनी डिजिटल आजादी सुनिश्चित करना।

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