साहित्य / मीडिया

भारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता और राजनीति का रिश्ता हमेशा से बहस का विषय रहा है। पत्रकारिता का धर्म है, सत्ता से सवाल करना और जनता के हित में सच को सामने रखना, जबकि राजनीति का धर्म है सत्ता प्राप्त करना और उसे बनाए रखना। इन दोनों के बीच का टकराव और सहयोग ही लोकतंत्र की असली धड़कन है...

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ज़रा सोचिए। अगर कल सुबह कोई सरकार कह दे कि अब नमक खरीदना भी अमीरों का शौक़ होगा, तो क्या होगा? दाल बेस्वाद हो जाएगी। रोटी गले से नहीं उतरेगी। गरीब की थाली और भी सूनी हो जाएगी...

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मीडिया की दुनिया की आज सबसे बड़ी खबर यही है कि खबर अब खबर नहीं रही है। वह एक उत्पाद बन गई है; बिकती है, पैक होकर आती है, सजती-संवरती है, चमकती है, और फिर दर्शकों के सामने परोस दी जाती है। सच कहीं पीछे छूट जाता है। उसकी जगह ले लेते हैं प्रचार, सनसनी और कारोबार।

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ज़रा एक पल के लिए ऐसे भारत की कल्पना कीजिए, जहां हर नागरिक सरकार की हर बात पर "जी हुज़ूर" कहे। संसद की बहसें कुछ मिनटों में खत्म हो जाएं। टीवी चैनलों पर बहस की जगह केवल सरकारी प्रेस नोट पढ़े जाएं। अख़बारों के संपादकों का काम सिर्फ़ अल्पविराम और पूर्णविराम ठीक करना रह जाए। सोशल मीडिया पर हर तरफ़ एक ही नारा गूंजे; "वाह सरकार, कमाल कर दिया...

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खबर क्या है? जो अभी हुआ? या जो हमें भीतर तक हिला दे? आज हर जेब में न्यूज़रूम है। हर हाथ में मोबाइल। हर स्क्रीन पर ब्रेकिंग। सूचनाओं की बाढ़ है। आवाज़ों का शोर है। लेकिन सच? वह अक्सर इस कोलाहल में दब जाता है...

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सेवा के काम में शोर नहीं, असर होना चाहिए। लेकिन, आज के समय में असर से पहले पोस्ट आ जाती है। गौर से देखें, समाजसेवा भी कुछ-कुछ क्रिकेट मैच जैसी हो गई है। सबकी नज़र स्कोरबोर्ड पर है; किसने सबसे पहले ट्वीट किया? किसने फेसबुक पर ‘ब्रेकिंग’ डाली? किसने फोटो के साथ लिखा; “मेरे प्रयासों से…”

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