पूरी दुनिया में उत्तर और दक्षिण के बीच श्रेष्ठता को लेकर द्वंद्व की बात की जाती है। मानवीय रंग से जुड़ी संवेदनाएं भी इस संघर्ष में अपनी भूमिकाएं निभाती रही हैं। आदिकाल से चली आ रही यह बहस भारतीय उपमहाद्वीपीय समाज में भी नजर आती है। इस सामाजिक विवाद के स्वरूप और जटिलताओं को समझने के लिए, आज हमारे साथ हैं ह्यूमर टाइम्स की संपादक मुक्ता गुप्ता। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में शामिल सवालों पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए अभी मात्र एक रुपये में सब्सक्राइब करें...

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राम जन्मभूमि मामले में अदालत के फैसले के बाद मंदिर बनने का मार्ग प्रशस्त हो चुका है। मंदिर बनना शुरू भी हो चुका है। देर-सवेर मंदिर बन भी जाएगा। लेकिन, क्या अब इसके बाद श्रीकृष्ण जन्मभूमि और काशी मामले का सिर उठाना महज इत्तेफाक है? ऐसे कई सवालों पर बात करने के लिए आज हमारे साथ हैं वरिष्ठ पत्रकार विनीत सिंह। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में सतत हिस्सा लेने के लिए अभी सब्सक्राइब करें...

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... एक रात को दो बजे, जब अचानक नींद खुल गई तो टीवी से 'उलझ' बैठे और चैनल सर्फ करते-करते 'भोजपुरी टेरीटरी' तक जा पहुंचे। किसी मूवी चैनल पर निरहुआ की फिल्म 'बिदेसिया' आ रही थी। भोजपुरी में ऐसी फिल्में भी बनती हैं, जानकर अचंभा हुआ। नौटंकी विधा को फिल्म विधा के साथ गूंथकर बनाई गई यह फिल्म जब देखना शुरू किया तो फिर चैनल बदल ही नहीं पाए। जरूरी नहीं है कि मिठास और श्रम की भाषा भोजपुरी में 'बकवास' फिल्में ही बनती हैं, यहां 'बढ़िया' सिनेमा भी है। भोजपुरी सिनेमा के पुराने रसूख और मौजूदा स्थिति पर ढेर सारी बातें करने के लिए आज हमारे साथ मौजूद हैं, भोजपुरी संवेदनाओं से खास लगाव रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और साहित्य समालोचक प्रमोद कुमार पांडेय...। पूरा आलेख पढ़ने व साक्षात्कार में सतत हिस्सा लेने के लिए अभी सब्सक्राइब करें...

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समाज में संवेदनहीनता लगातार बढ़ती जा रही है। अस्पतालों में, पुलिस के थानों में, किसी सरकारी दफ्तर में या कहीं भी आप जाएं और संवेदनहीनता से दो-चार न हों, यह आज की भागमभाग भरी जिंदगी में संभव ही नहीं है। संवेदनहीनता के कई ऐसे ही पहलुओं पर बात करने के लिए आज हमारे साथ हैं वरिष्ठ पत्रकार केशव चतुर्वेदी। आप भी इस बातचीत में भाग ले सकते हैं। इस विषय पर अपनी राय रखने और पूरा साक्षात्कार देखने के लिए अभी सब्सक्राइब करें...

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बिहार में चुनावी सरगर्मियां बहुत तेज हो गई हैं। दल-बदल और राजनीतिक दलों में तोड़म-फोड़ अपने चरम पर है। रोज नए सियासी समीकरण बन रहे हैं। नए-नए प्रयोग भी हो रहे हैं। चिराग पासवान एनडीए में हैं, लेकिन नहीं हैं। वह नीतीश कुमार के साथ भी नहीं हैं। एनडीए उनके दल ‘लोक जनशक्ति पार्टी’ को अपना घटक तो मानता है, लेकिन चुनावी अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फोटो और नाम का इस्तेमाल करने से रोक भी रहा है। बिहार में बन रहे ताजा समीकरणों और चुनावी माहौल पर विस्तार से जानने के लिए अभी सब्सक्राइब करें...

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हाथरस में विपक्षी दलों के नेताओं और मीडिया को आखिर क्यों रोका गया? इस मामले में पक्ष, विपक्ष और मीडिया अपनी भूमिका किस तरह निभा पाए, इस पर पूरी चर्चा होनी चाहिए। इस पूरे प्रकरण में सभी संबद्ध पक्षों का कितना लाभ हुआ, इसका आंकलन करना बेहद जरूरी है। इसी विषय पर आज हम वरिष्ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल के साथ चर्चा करेंगे और जानेंगे कि इस पर उनकी राय क्या है...?

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