पर्यटन

जम्मू-कश्मीर का दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र धीरे-धीरे कनेक्टिविटी के एक नए युग की ओर अग्रसर हो रहा है। उधमपुर–श्रीनगर–बारामूला रेल लिंक ने घाटी को भारत के रेल नेटवर्क से जोड़ दिया है। इस परियोजना का प्रमुख आकर्षण चिनाब पुल है, जो दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्च पुल है।

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यूरोप की चमचमाती सड़कें, साफ-सुथरी नदियां, शानदार इमारतें और समय पर दौड़ती ट्रेनें देखकर मन खुश हो जाता है। लगता है, बस यहीं बस जाएं! लेकिन, जैसे ही जेब से पैसे निकलने शुरू होते हैं, सपनों की दुनिया में महंगाई का भूत नाचने लगता है। खूबसूरती अपनी जगह है, मगर जिंदगी चलाने का खर्चा देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। आखिर यह कैसी तरक्की है, जहां कमाई लाखों में और बचत कौड़ियों में रह जाती है?

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पीढ़ियों से, भारत के लाइटहाउस ऐसी जगहें रहे हैं, जिन्हें लोग दूर से ही देखते थे। समुद्र के किनारे खड़े ये लाइटहाउस तटीय इलाकों के खतरनाक हिस्सों की पहचान कराते थे और अंधेरे में जहाजों को रास्ता दिखाते थे। इनकी रोशनी नाविकों के काम आती थी और इनके टावर आस-पास के नज़ारों का अहम हिस्सा थे...

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हवा महल के आसपास की हलचल से आगे बढ़ते हुए जब जयपुर के जंतर-मंतर में प्रवेश किया तो वातावरण कुछ अलग लगा। सामने फैली ज्यामितीय आकृतियां, ऊंची दीवारें, कोण बनाती संरचनाएं और विशाल चाप मन में स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा करते हैं। यह कोई पारंपरिक महल या मंदिर नहीं है, फिर भी पूरा परिसर अपने आप में असाधारण दिखाई देता है...

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यूरोप की मेरी हाल की यात्रा को अगर एक शब्द में बांधना हो, तो वह शब्द होगा, ‘पानी’। मैंने वहां आधा दर्जन से ज़्यादा नदियां, नहरें और झीलें नज़दीक से देखीं। कभी क्रूज़ पर बैठकर, कभी फेरी में, कभी पुल से झांककर और कभी किनारे बैठकर। नाविकों, फेरीवालों, क्रूज़ मैनेजरों और गोंडोला चलाने वालों से बातें कीं। किनारे बैठे आम लोग भी देखे, जो दोपहर की सुनहरी धूप में नदी को निहार रहे थे, बातें कर रहे थे या बस ज़िंदगी को थोड़ी देर आराम दे रहे थे।

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यूरोप जीतने निकले थे। कुछ ही दिनों के बाद पता चला कि यूरोप जीतना तो दूर, अपने घुटनों को मनाना ही बड़ी जीत है।

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आखिर कोई देश दिल्ली की एक कॉलोनी से भी छोटा होकर अपना राजकुमार, अपनी सरहदें, अपनी हुकूमत और इतना राष्ट्राभिमान कैसे रख सकता है कि उसका झंडा भी कभी-कभी शरमा जाए...

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झरना गरज रहा था। नाव झूम रही थी। और, तभी एक सीढ़ी ने हमारे घुटनों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया! हम स्विट्ज़रलैंड के शाफहाउज़ेन के पास शानदार राइन फॉल्स देखने आए थे। सोचा था शांतिपूर्ण नाव की सैर होगी। लेकिन, देखते-देखते यह सफर रोमांच, सीढ़ियों की चढ़ाई, यातायात की उलझन और आखिर में बचाव अभियान में बदल गया। और इस पूरे अभियान में हमारे साथ थीं, लेडी मार्था, चाय और समोसे!

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हमारी आरामदेह टूरिस्ट बस ने एक ही दिन में फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड के किनारे पार किए। रात तक हम जर्मनी के फ्रैंकफर्ट पहुंच चुके थे। न टैंक, न सैनिक, बस कैमरा, नाश्ता, गूगल मैप और उत्सुक भारतीय वरिष्ठ नागरिकों का एक जत्था...

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पेरिस ने हमारा स्वागत नहीं किया बल्कि उसने पहले हमारा इम्तिहान लिया। यहां उतरते ही लगा कि हम किसी दूसरे ग्रह पर आ गए हैं। भाषा फ्रेंच थी, इमारतें बेहद सलीकेदार थीं, लोग फैशनेबल दिख रहे थे और ट्रैफिक ऐसा था जैसे सड़क पर कोई मुकाबला चल रहा हो। मौसम ने भी अपना अलग ही मिज़ाज दिखाया। कुल मिलाकर शहर नहीं बदला था, पूरी दुनिया बदल गई थी। और, फिर आया यूरोस्टार...

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