केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान ने तैयार की ‘वण्डर वैक्सीन’

मथुरा। गाय-भैंस व भेड़-बकरी आदि दुधारू पशुओं ‘जाॅन्स डिजीज’ जैसी घातक बीमारी जिसे अब तक लाइलाज माना जाता रहा है से बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने तीन दशक के अथक परिश्रम के पश्चात एक ऐसी वैक्सीन करने में सफलता प्राप्त की है जिसकी एक ही खुराक से न केवल बीमार पशु का इलाज संभव है, बल्कि इसे रोग प्रतिरोधक टीके के रूप में भी सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा सकता है। 

मथुरा स्थित केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के ‘न्यू मिलेनियम इण्डियन टैक्नोलाॅजी लीडरशिप इन्नोवेटिव प्रोजेक्ट’ के अंतर्गत मिले पौने छह करोड़ के आर्थिक सहयोग से विकसित की गई यह वैक्सीन 26 सितंबर को सीएसआईआर के 73वें स्थापना दिवस के अवसर पर विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में केंद्रीय विज्ञान एवं तकनीकि मंत्री डाॅ. हर्षवर्धन के हाथों रिलीज की जाएगी। यह जानकारी केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के निदेशक डाॅ. एसके अग्रवाल ने आज यहां दी। उन्होंने बताया कि ‘संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डाॅ. शूरवीर सिंह एवं तीन दर्जन से अधिक उनके सहयोगी वैज्ञानिकों की टीम ने तीन दशक लंबे शोध कार्य के बाद वैक्सीन के विकास में सफलता पाई है। 

वण्डर वैक्सीन के मुख्य आविष्कारक एवं केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डाॅ. शूरवीर सिंह ने बताया कि ‘इस वैक्सीन के प्रयोग से दुधारू पशुओं के दुग्ध उत्पादन में 2 से 5 गुना तथा मांस उत्पादन में 3 से 5 गुना तक की वृद्धि संभव है। इतना ही नहीं, इस वैक्सीन से पशुओं की मृत्युदर, उनमें होने वाले विभिन्न प्रकार के रोग तथा संक्रमणों की रोकथाम में भी खासी कमी लाई जा सकेगी।’   उन्होंने बताया कि ‘यह वैक्सीन लाइलाज पैराट्यूबरकुलोसिस अथवा जाॅन्स डिजीज के शिकार घरेलू पशुओं में काफी कारगर सिद्ध हुई है। इससे गायों को असमय कटान तथा कमजोर होकर सड़कों पर घूमने के लिए विवश होने से रोकने मंे काफी मदद मिलेगी।’  सिंह ने बताया कि ‘हालांकि शुरुआती दौर में यह अनुसंधान पूरी तरह बकरियों तथा भेड़ों आदि लघु रोमंथी पशुओं में होने वाली पैराट्यूबरकुलोसिस का इलाज ढूंढने पर आधारित था, किंतु शोध के दौरान जब जुगाली करने वाले बड़े दुधारू पशुओं यथा गाय-भैंस में भी इसी प्रकार के लक्षण मिले तो दायरा बढ़ता गया और कुल मिलाकर सभी दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य एवं उत्पादन की दृष्टि से महत्वपूर्ण वैक्सीन के रूप में इलाज मिल गया।’ उन्होंने बताया कि 30 वर्ष के लंबे कार्यकाल में हालांकि तकरीबन 40 वैज्ञानिकों ने उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस वैक्सीन के विकास में अपनी भूमिका का निर्वहन किया किंतु उनमें से बायोवेट कंपनी के क्वालिटी कण्ट्रोल मैनेजर डाॅ. तपस भट्टाचार्य, वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. नवीन कुमार एवं तत्कालीन शोध सहायकों डाॅ. जगदीप सिंह सोहल, डाॅ. प्रवीण कुमार सिंह, डाॅ. अजयवीर सिंह, कुन्दन कुमार चैबे, अवनीश कुमार, ब्रजेश कुमार सिंह एवं वर्तमान सहायक सौरभ गुप्ता आदि ने उल्लेखनीय योगदान दिया है।  

 


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