जन सूचना अधिकार के लिये विगत 8 माह से चक्कर लगा रहा ग्रामीण

ग्राम पंचायत सचिव उडा रहे जनसूचना अधिकार का मखौल

फरह। ग्राम पंचायतों में हो रहे मनरेगा के कार्यों का विवरण देने में पंचायत सचिव टालमटोल का रवैया अपना रहे है। इससे बडे घोटाले की बू आना स्वाभाविक है। सालों से जानकारी ही नहीं दी जा रही है। हाल यह है कि कई शिकायत लोकायुक्त के यहां दाखिल हो गई हैं। 

मिली जानकारी के अनुसार महुअन के लक्खी सिंह पुत्र मनीराम ने सन 2014 में गांव में हुए मनरेगा के तहत  2011 से लेकर 2014 तक हुए कार्यों की जानकारी जनसूचना अधिकारी से मांगी। कितने मजदूर लगाए गए, कितने बजट से कौन कौन से काम सम्पन्न हुए। लेकिन इस मामले की जानकारी को पंचायत सचिव ने पांच माह तक दबाए रखा। प्रार्थी ने डीएम के यहां भी शिकायत की। डीएम ने इस मामले में जांच कराई तो काफी गडबडियां सामने आ गईं। कार्डों पर हाजिरी ही नहीं लगीं थी। ग्रामीणों का आरोप है गांव में कई रास्ते चंदे से बनवाए गए थे। मौके पर जांच अधिकारी को बताया गया था। लेकिन सूचना के अधिकार के तहत कोई सूचना नहीं दी गई। बाद में रिमाइडर भेजा गया तो 32 हजार की कीमत सूचना के तहत मांगी गई। अब मामला लोकायुक्त के यहां है। शिकायतकर्ता का कहना है कि मनरेगा के नाम पर पंचायत में बडे घोटाले की बू आ रही है। सचिव ने मिलकर धनराशि को बडे पैमाने पर हडपा है। गंावपंचायत में लगे हैडपम्पों की भी जानकारी मांगी गई है। आठ माह बाद हैडपंपों की सूचना दी गई तो चैंकाने वाले तथ्य सामने आए। सूचना के अनुसार गांव में 2011 से 14 तक पचास हैडपंप लगवाए गए। लेकिन तथ्य चैंकाने वाले थे। अन्य निधियों से लगाए गए हैडपंपों को भी इसमें दिखा दिया गया था। इसी लिये ग्राम पंचायत से मनरेगा में मजदूरों और बजट की जानकारी, पंचायत में लगे हैडपंपों का विवरण, निर्मल अभियान के तहत बने शौचालय, सोडियम लैम्प लगाने की जानकारी आदि मांगी गयी थी।


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