धूं-धूं कर जल उठा रावण का पुतला

मथुरा। आज दशहरे के मौके पर शहर के महाविद्या मैदान में दशहरे की अन्तिम तैयारियों को रूप दिया गया। रावण और अहिरावण के पुतले बनाये गये है। जिन्हें कारीगर अन्तिम रूप दे दिया। महाविद्या मैदान में आज शाम को राम-रावण का युद्ध हुआ। मेला कमेटी द्वारा राम रावण युद्ध को रोचक बनाने के लिए भव्य तैयार किया गया।  युद्ध के पश्चात देर शाम रावण के वध के बाद उसका पुतला धू-धूकर जल उठा। असत्य पर सत्य की जीत का पर्व विजयदशमी आज पूरे जनपद में हर्ष उल्लास के साथ मनाया गया। दुर्गा नवमी होने के कारण आज घर-घर में सुबह कन्या लांगुरा पूजे गये और देवी मंदिरों पर भक्तों की भारी भीड़ रही। वहीं देर शाम मसानी स्थित महाविद्या मैदान में राम-रावण युद्ध की लीला शुरू हुई तथा उसके बाद आकर्षक आतिशबाजी के बीच रावण अहिरावण के पुतले दहन हो गया। महाविद्या और सदर बाजार के रामलीला मैदानों पर इस मेले को देखने के लिए भारी भीड़ देखने को मिली। महाविद्या मैदान में कई-कई फुट ऊंचे रावण व अहिरावण के पुतले पिछले कई दिनों से तैयारकर कारीगरों ने दहन के लिए तैयार कर दिया था मैदान में लंका का भी आकर्षक निर्माण किया गया था। वहीं रामलीला कमेटी के तत्वावधान में आयोजित व श्री शिवम बाल कला मंच के कलाकारों द्वारा मंचित रामलीला में विजयादशमी के दिन राम रावण का घनघोर युद्ध हुआ। युद्ध में रावण की सैना ने बांनर सैना के छक्के छुडा दिये। श्रीराम के हर प्रहार को रावण सहजता से झेलता रहा इस बीच राम के आग्रह पर विभीषण ने रावण की नाभि में अमृत होने के राज को राम को बताया। जब श्रीराम ने अपने अग्नि वांण से रावण के अमृत को सुखाया और रावण पर प्रहार किये तब  सत्य की राह पर चल रहे भगवान श्री राम की विजय हुई। इस बीच रावण प्रतीकात्मक पुतले का दहन ओल्ड जीटी रोड सिनेमा हाॅल के पास किया गया। इस मौके पर पुलिस प्रशासन की कडी सुरक्षा व्यवस्था की गयी थी। इस अवसर पर रामलीला के सुशील भारद्वाज, अवतार चैधरी, वीरीसिंह जादौन, संतोष वाष्र्णेय, हेमकुमार गुप्ता, लड्डू गोपाल, लड्डू मेम्बर, आलोक पाठक, भुवनेश शर्मा, मोहीत वाष्र्णेय, पुरुषोत्म सिंह, महावीर जादौन, आदि की सहभागिता रही। 

पिछली तीन पीढियों से रावण-अहिरावण के पुतले बना रहा है छोटे खां का परिवार

मथुरा। पिछली तीन पीढी से 58 वर्षीय छोटे खां का परिवार महाविद्या मैदान में प्रतिवर्ष रावण, मेघनाथ और अहिरावरण के विशालकाय पुतले बनाते हैं। बातचीत करने पर छोटे खां कहते हैं कि इस सब में डेढ माह का समय लग जाता है। काफी बारीक काम करना पड़ता है। उनकी तीन पीढ़ियां इस कार्य मंे लंबे समय से जुटी रही हैं। छोटे खां से पूर्व उनके पिता मुगल खां इस कार्य को बखूबी निभाते थे। छोटे खां कहते हैं कि वे काफी समय से इस काम में जुटे हुये हैं। 

जब उनसे पूछा गया कि वे मुस्लिम होने के बाद भी हिंदूओं के इस पर्व के पुतलों को बनाते हैं तो उन्हें कुछ अजीब नहीं लगता? इस पर छोटे खां बोले कि हम हिंदू-मुस्लिम का कोई भेद नहीं मानते। चाहे हिंदू को काटकर देखो या मुसलमान को, सभी के रक्त लाल ही निकलता है। तो फिर भेदवभाव किस बात का? वे कहते हैं कि हम गीता-रामायण को भी पढते हैं और उससे सीख लेते हैं। उन्होंने कहा कि कोई खड़े होकर पूजा करता है तो कोई बैठकर, लेकिन उन्हें इस पुतला बनाने से बेहद संतोष प्राप्त होता है। आज तक उनके मन में कोई भेदभाव नहीं आया। 


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