नहीं बन पा रहे हैं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए जरूरी प्रमाण पत्र

नहीं बन पा रहे हैं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए जरूरी प्रमाणपत्रकेंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण लागू तो कर दिया है लेकिन इसके कार्यान्वयन में अभी बहुत खामियां हैं। इस आरक्षण के लिए अर्ह होने हेतु जरूरी सरकारी प्रमाण पत्र बनवाना कोई आसान काम नहीं है। और, यही वजह है कि अकेले दिल्ली विश्वविद्यालय में इस श्रेणी के तहत आवेदन करने वाले विद्यार्थियों की संख्या अब तक महज 8500 ही है। ध्यान रहे, दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस श्रेणी के तहत कम से कम 12 हजार आवेदनों की उम्मीद की थी।

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए जरूरी इस प्रमाणपत्र के लिए सबसे पहले तो आय प्रमाण पत्र बनवाना जरूरी रखा गया है। अब यहां यह बात जानना बेहद जरूरी है कि आठ लाख रुपये तक की आय वर्ग में एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो नियमित रूप से अपना आयकर दाखिल करता है। अब जो लोग नियमित रूप से आयकर दाखिल कर रहे हैं तो उन्हें दोबारा से आय प्रमाण पत्र बनवाने की जरूरत क्यों होनी चाहिए। हां, जो लोग अपना आयकर दाखिल नहीं करते हैं, उनके लिए इसे अनिवार्य कर दिया जाए तो बात समझ में आती है।

अब यदि आय प्रमाण पत्र बन भी जाए तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए जरूरी प्रमाणपत्र को अपने कम से कम दो पड़ोसियों, स्थानीय पार्षद या सरपंच से अग्रसारित कराना होता है। यहां तक तो ठीक है लेकिन, इसके बाद इसे स्थानीय पटवारी और फिर नगर निगम द्वारा भी अग्रसारित कराना होता है। और, यहीं से समस्या शुरू हो जाती है। अभी तक न तो पटवारियों को इससे संबंधित कोई जानकारी है और न ही नगर निगम के अधिकारी इस तरह के किसी प्रमाण पत्र के बारे में कोई विधिक जानकारी रखते हैं। बल्कि, यहां तक भी बहस करते हैं कि यह प्रमाण पत्र विद्यार्थी के नाम से बनेगा या उनके अभिभावक के नाम से।

इन अप्रशिक्षित और अकर्मण्य अधिकारी और कर्मचारियों को यदि किसी भी तरह का तर्क देकर या समझा-बुझाकर अग्रसारण करा भी लिया जाए तो फिर बारी आती है तहसीलदार की। तहसीलदार के अधीन कार्य करने वाले कर्मचारियों को भी इसके बारे में अभी कोई ज्ञान नहीं है। आखिर में, इस पूरी फाइल को तैयार कर नजदीकी सरल केंद्र में जाना होता है जहां तैनात कर्मचारियों को इन सभी कागजातों को डिजिटल फॉर्म में अपलोड करना होता है। वहां कुछेक कर्मचारी तो किसी भी फजीहत में पड़ने के बजाय सीधे ही मना कर देते हैं कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए जरूरी प्रमाणपत्र फिलहाल जारी नहीं किए जा रहे हैं। जब उचित तर्क देकर उनसे कागजातों को विभाग के पोर्टल पर सिर्फ अपलोड करने के लिए कहा जाए तो वे इसे अपलोड कर तो देते हैं लेकिन उनके इस रवैये से कहीं ज्यादा जायज अभ्यर्थी वापस लौट जाते हैं।

खास बात यह है कि इतनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसमें खासी तेजी आ जाती है। और, घर पहुंचने से पहले आपको प्रमाण पत्र ऑनलाइन डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध हो जाता है।

फिर, असली समस्या कहां है? तो, पहली समस्या यह है कि अग्रसारण के लिए इतने विभागों को संलग्न करने की शायद जरूरत नहीं है। और, अगर जरूरत है तो इससे जुड़े विभागों के कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि जब अभ्यर्थी का अभिभावक आयकर दाखिल करता है तो उसे आय प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। तीसरा सुझाव यह है कि इस पूरी प्रक्रिया को संकेंद्रित करने की जरूरत है ताकि एक ही स्थान पर सभी अग्रसारण किए जा सकें।

निष्कर्ष यह है कि इतनी सारी दिक्कतों के चलते सरकार का एक अच्छा प्रयास प्रशासन की बलि चढ़ जा रहा है। जरूरतमंदों को इस सुविधा का लाभ समय रहते नहीं मिल पाता है। उम्मीद है कि केंद्र व राज्य सरकार इन बिंदुओं पर ध्यान देंगे, समय रहते कदम उठाएंगे और विद्यार्थियों की परेशानियों को कुछ कम करने की कोशिश करेंगे।


Subscribe now

Login and subscribe to continue reading this story....

Already a user? Login



Related Items

  1. क्या भारत में चुनाव जीतने का असली पासपोर्ट आज भी जाति का प्रमाणपत्र है?

  1. जब बंगाल ने ‘भाषण’ को चुना और तमिलनाडु ने ‘आर्थिक तरक्की’…

  1. भारत के आर्थिक बदलाव में महिलाओं की है अग्रणी भूमिका




Mediabharti