तौमस के कथित मित्रों की राय पर पुलिस द्वारा किया गया तुगलकी फैसला आखिर कितना सही है। आखिर असम से अपने घर बार को छोड़ कर तौमस के सहारे पर साथ जीने मरने की कसमें खाकर यहां आयी सीमा परियाल अब जब जीवन के बीच रास्ते में छोड़ दी गयी है तो वो किस के सहारे जियेगी और अब उसका क्या होगा। कथित समाजियों और पुलिस ने भी अपने स्वार्थों के चलते चन्द पलों में ही पति पत्नि के सम्बन्धों को खेल की भांति तुड़वा डाला। अपने घर और अपनों से हजारों किलो मीटर दूर राधाकुण्ड में अब उस अकेली अबला का क्या हश्न होगा जब कि थाने से जाते जाते वो कहती रही कि अब वो किसके सहारे रहेगी, वो तौमस के बिना नहीं रह पायेगी और मर जायेगी। क्या सच में ही वो अपने कहे अनुसार वो तौमस के वियोग मंे मर जायेगी या कहीं ये सदमा उसके जीवन को ही न बदल दे। सम्भव है अकेला जानकर भी कहीं कोई अनहोनी उसके साथ घटित न हो जाये। यदि ऐसा कुछ होता है तो इस सबका जिम्मेदार कौन होगा? फैसला कराने तौमस के वे कथित मित्र या थाना की जिम्मेदार पुलिस ? ये अब समय की गर्त में छिपा है।
कस्बा राधाकुण्ड में इसी प्रकार से सैंकड़ों विदेशी युवक युवती किराये पर मकान लेकर या विभिन्न धर्मशालाओं और गैस्ट हाउसों में पिछले लम्बे समय से रहते चले आ रहे है। जिनमें अनेकों के तो वीजा अवधि भी समाप्त हो चुकी और उनके सही अते पते भी यहां कोई नहीं जानता है। वास्तव में ये जांच का विषय है कि कैसे बिना किसी अते पते के लोग कैसे इन्हें किराये पर रख लेते है वीजा समाप्त होने के बावजूद भी ये कैसे यहां रह जाते है। यहां रहकर ये लोग यहां युवक युवतियों को अपना शिकार बनाते है और उनसे अपना मतलब सिद्ध होते ही उन्हें बीच मंझधार मंे फंसा हुआ छोड़ कर भाग निकलते है। इनके खिलाफ कोई कार्यवाही भी नहीं हो पाती। इससे बचने को ये लोगा स्थानीय लोगों का एक ऐसा सुरक्षात्मक काॅकस बना लेते है तो हर स्थिति में इन्हे बचाने को भी तैयार रहता है।





