मथुरा। प्रजातंत्र संरक्षक, मानवता संवाहक, समेत वैश्विक शान्ति ध्वजवाहक जैसी विभूतियों के बूते विश्व में जाने गये भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू से दुनिया जितनी प्रभावित रही, मौजूदा कांग्रेस राष्ट्रनायक के आदर्शों से उतनी ही दूर होती जा रही है। यह मंथन डा. रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में शनिवार को पण्डित जवाहरलाल नेहरू के 125 वें जन्म दिवस पर विश्राम घाट क्षेत्र में ‘नेहरू बनाम नेशन मेमोरियल’ स्मृति व्याख्यान में किया गया।
संस्थापक अध्यक्ष डा. सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि मौजूदा कांग्रेस की कार्यप्रणाली और पण्डित जवाहरलाल नेहरू के आदर्शों के बीच जमीन और आसमां का फर्क आ चुका है। लिहाजा नेहरू खानदान जो कभी बिस्मिल की जुबां में कुर्बानियों के लिए मशहूर था, आज भ्रष्टाचार और तानाशाही का कलंक ढो रहा है।
हालात यहां तक आ पहुंचे कि राष्ट्रनायक की स्मृति में संरक्षित नेहरू मेमोरियल की मौलिकता पर भी सवाल उठने लगे। आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं? जब राष्ट्रनायक द्वारा स्थापित मूल्यों की अनदेखी की जाये तो उनकी लोकप्रियता भुनाने की कोेशिशों पर लगाम भी जरूर लगनी चाहिए। सूत्रों की मानें तो राहुल गांधी के नेतृत्व में नेहरू मेमोरियल की राजनीतिक बैठकें और डा. कर्णसिंह की अगुआई में 150 करोड़ रूपये की अतिरिक्त स्वीकृति ने संस्था को विवादों के कटघरे में ला खड़ा किया है। हालांकि विवाद बहुत-कुछ ऊसरदिमागी नौकरशाहों ने उर्वरात्मक विद्वानों की मलाई हड़पने के मकसद से भी इस खूबी के साथ बढ़ाया कि केन्द्रीय संस्कृति मंत्री तक को भी आभास नहीं हो पाया कि उन्हें मोहरा बनाकर कोई मंसूबा हासिल किया जा रहा है।
डा. शर्मा ने रोष जताया कि प्रधान मंत्री की नेकनीयत को ध्यान में रख कर ही महामना स्मारक परियोजना संस्थान द्वारा भेजी गई थी जिसका नौकरशाहों ने जवाब तक न देने दिया। जबकि विश्व हिन्दी सम्मेलन में परियोजना सर्वत्र गहराई तक प्रतिध्वनित होती रही। डा. शर्मा ने आगे कहा कि यही स्थिति महामना पर टीवी धारावाहिक और वांङमय प्रकाशन की भी हुई है जिन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा मानव संसाधन मंत्रालय के हवाले कर सूत्रधार को हाशिये पर रख दिया गया है। लगभग ऐसा ही कारनामा नेहरू मेमोरियल फण्ड के ऊसरदिमागी नौकरशाह नेहरू वांङमय प्रकाशन के साथ दिखा रहे हैं, जहां संपादक मण्डल का एक भी कर्मी न तो पण्डित जवाहरलाल नेहरू की हिन्दुुस्तानी भाषा से वाकिफ है और न ही उसके अंग्रेजी में अनुवाद की क्षमता रखता है। फिर भी वांङमय बाहरी टटपूंजियों के अनुवाद और टाइपिंग के सहारे नेहरू की जीवनियों की तरह छपते जा रहे हैं। डा. शर्मा ने खुलासा किया कि नेहरू की जीवनियों की तरह पण्डित जवाहरलाल नेहरू की धर्मनिरपेक्ष छवि बरकरार रखने के बरक्श बीआर नन्दा, एस. गोपालन और एम.जे अकबर जैसे जीवनी लेखकों ने नेहरू वंश के मथुरा अध्याय को छिपा दिया ताकि दुनिया को यह राज पता न चल सके कि सन्तान न होने के दुःख से पीडिघ्त पण्डित मोतीलाल नेहरू ने 1888 में मथुरा में धर्मानुष्ठान किया था। और संयोग से जब 14 नवम्बर 1889 को प्रयाग में पण्डित जवाहरलाल नेहरू का जन्म हो गया तो मथुरा में गोवर्धन नाथ मन्दिर और धर्मशाला बनवाकर मनौती पूरी की गई थी। दुर्भाग्य तो यह है कि इसकी न तो भाजपा सरकार को खबर है और न ही कांग्रेस को चिन्ता। मगर नेहरू ब्रांड को लेकर दोनों की भिडन्त का लोग यह जानकर लुत्फ उठा रहे हैं कि नेहरूओं के जरिये दूसरे महापुरूषों को जाना जाये या दूसरों जरिये नेहरूओं को। दोनों स्थितियों में बात एक ही है। फिर भी दंगल देखना किसे बुरा लगता है, इसलिए विवाद में लोग दिलचस्पी ले रहे हैं। इस तरह पक्षपात के चलते जहां नेहरू के जीवनी लेखकों ने भ्रामक इतिहास पैदा किया, वहीं अयोग्य संपादक रही-सही कमी नेहरू वांङमय में पूरी कर दिखा रहे हैं।
इससे पूर्व उपस्थितों ने मां यमुना एवं पण्डित जवाहरलाल नेहरू के चित्रपटों पर पुष्पार्चन से आयोजन की शुरूआत की तत्पश्चात् आयोजन स्थल मां यमुना समेत पण्डित जवाहरलाल नेहरू के जयकारों से गूंज उठा। इस अवसर पर मंसोला चतुर्वेदी, बादाम चतुर्वेदी, लोकेन्द्र कौशिक, मनोज चतुर्वेदी बंशीधर चतुर्वेदी आदि उपस्थित थे।





