स्वस्थ भविष्य को सुनिश्चित करता भारतीय आयुर्वेद

आयुर्वेद वैश्विक स्वास्थ्य से जुड़ी चर्चाओं में हाशिए से निकलकर अब मुख्यधारा की ओर बढ़ रहा है। भारत की विस्तारित आयुष अर्थव्यवस्था, पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के घरेलू स्तर पर बढ़ते उपयोग तथा वेलनेस और चिकित्सा मूल्य यात्रा में बढ़ती रुचि आयुर्वेद के लिए नए अवसर पैदा कर रही है। इसी के साथ वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय भी पारंपरिक चिकित्सा, अनुसंधान और प्रमाणों पर अधिक जोर दे रहा है।

भारत में 23 सितम्बर को 11वां आयुर्वेद दिवस मनाया जा रहा है। ऐसे समय में यह अवसर विशेष महत्व रखता है। इस वर्ष की थीम ‘स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद’ है। यह ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब भारत अपनी सदियों पुरानी ज्ञान प्रणाली को आधुनिक अनुसंधान, गुणवत्ता मानकों और अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा ढांचों से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। अब चुनौती केवल आयुर्वेद को दुनिया तक पहुंचाने की नहीं है, बल्कि ऐसे प्रमाण, विश्वसनीयता और संस्थागत आधार तैयार करने की है, जो इसके जिम्मेदार वैश्विक विस्तार को समर्थन दे सकें।

पिछले एक दशक में आयुष क्षेत्र ने उल्लेखनीय आर्थिक विस्तार देखा है, जिससे आयुर्वेद के विकास और व्यापक स्वीकार्यता के लिए मजबूत आधार तैयार हुआ है। आयुष बाजार वर्ष 2014 में 2.85 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2023 में 43.4 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, जबकि इसी अवधि में आयुष निर्यात 1.09 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2.16 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। एमएसएमई और स्टार्टअप को सशक्त बनाने पर भी ध्यान केन्‍द्रित किया गया है, जिससे इस क्षेत्र में उद्यमिता, नवाचार और निवेश के लिए एक व्यापक इकोसिस्‍टम विकसित करने में मदद मिली है।

भारत चिकित्सा मूल्य यात्रा के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य देखभाल की बढ़ती वैश्विक मांग का लाभ उठाने का भी प्रयास कर रहा है। आयुष पद्धतियों के तहत उपचार की तलाश करने वाले विदेशी नागरिकों के लिए 27 जुलाई, 2023 को एक समर्पित आयुष वीजा शुरू किया गया। आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की संभावनाओं वाले पर्यटन सर्किटों की पहचान की जा रही है। वर्ष 2022 में 115.6 अरब अमेरिकी डॉलर का अनुमानित वैश्विक चिकित्सा मूल्य यात्रा बाजार वर्ष 2030 तक बढ़कर लगभग 286.1 अरब अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है। ऐसे में आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां स्वास्थ्य सेवाओं, वेलनेस सुविधाओं और पर्यटन को एक साथ जोड़कर भारत के चिकित्सा मूल्य यात्रा और वेलनेस इकोसिस्टम का एक महत्वपूर्ण घटक बन सकती हैं।

आयुर्वेद को सुदृढ़ करने के भारत के प्रयास वैश्विक पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा के क्षेत्र में भारत की व्यापक सहभागिता से भी निकटता से जुड़े हुए हैं। डब्ल्यूएचओ की वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2025–2034, जिसे 2025 में 78वीं विश्व स्वास्थ्य सभा द्वारा अपनाया गया, प्रमाणों को मजबूत करने, सुरक्षा और विनियमन सुनिश्चित करने, पारंपरिक चिकित्सा को स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकृत करने तथा विभिन्न क्षेत्रों में इसके व्यापक योगदान को अधिकतम करने के लिए एक वैश्विक रूपरेखा प्रदान करती है।

इस वैश्विक प्रयास में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गुजरात के जामनगर में डब्ल्यूएचओ ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर की स्थापना वर्ष 2022 में की गई थी और भारत इसका प्रमुख निवेशक है। भारत ने केन्द्र की स्थापना, बुनियादी ढांचे और संचालन के लिए अनुमानित 250 मिलियन अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता जताई है। यह केन्द्र प्रमाण और ज्ञान, डेटा एवं विश्लेषण, स्थिरता एवं समानता तथा नवाचार एवं प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों पर केन्द्रित है।

पारंपरिक चिकित्सा पर आयोजित डब्ल्यूएचओ के दो वैश्विक शिखर सम्मेलनों में भी भारत की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आई। पहला शिखर सम्मेलन अगस्त 2023 में गांधीनगर में डब्ल्यूएचओ और भारत सरकार की सह-मेजबानी में आयोजित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप गुजरात घोषणा-पत्र सामने आया। दूसरा शिखर सम्मेलन 17 से 19 दिसंबर, 2025 तक नई दिल्ली में ‘लोगों और पृथ्वी के लिए संतुलन बहाल करना : कल्याण का विज्ञान और अभ्यास’ विषय के तहत आयोजित किया गया। इसमें प्रमाण, स्वास्थ्य प्रणाली में एकीकरण, विनियमन, जैव विविधता, स्वदेशी ज्ञान, बौद्धिक संपदा और नवाचार सहित विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया।

एक अन्य महत्वपूर्ण विकास वैश्विक स्वास्थ्य वर्गीकरण ढांचों में आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों को शामिल किया जाना है। जनवरी 2024 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आईसीडी-11 के पारंपरिक चिकित्सा मॉड्यूल-2 को शुरू किया, जिसमें इन चिकित्सा पद्धतियों से संबंधित रुग्णता कोड शामिल हैं। इससे इन पद्धतियों से संबंधित स्थितियों का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तुलनीय ढांचे के माध्यम से दस्तावेजीकरण और रिपोर्टिंग संभव हो सकेगी। डब्ल्यूएचओ ने स्पष्ट किया है कि इस तरह का समावेश किसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति की वैज्ञानिक वैधता या प्रभावशीलता का समर्थन नहीं माना जाता है। हस्तक्षेपों के वर्गीकरण की दिशा में भी कार्य जारी है और भारत तथा डब्ल्यूएचओ आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा के लिए हस्तक्षेप कोड विकसित करने पर मिलकर काम कर रहे हैं।

इस प्रकार उभरती तस्वीर एक ऐसी भारतीय पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणाली की है, जो वैश्विक सहभागिता के एक नए चरण में प्रवेश कर रही है। तेजी से विस्तारित होती आयुष अर्थव्यवस्था, घरेलू स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता, चिकित्सा मूल्य यात्रा के क्षेत्र में नए अवसर, मजबूत अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, वैश्विक वर्गीकरण ढांचे तथा अनुसंधान और गुणवत्ता मानकों पर बढ़ता जोर, ये सभी मिलकर आयुर्वेद के लिए नए अवसरों के द्वार खोल रहे हैं।