बेचैन मन के अंदर, मचा है बवंडर; दस में से एक वयस्क अवसाद का शिकार…!


भारत में एक खामोश विस्फोट हो रहा है। भीतर, मानसिक, मन के अंदर। ऊपर से सब सामान्य दिखता है। कॉलेज भरे हुए हैं। ऑफिस चल रहे हैं। सोशल मीडिया पर मुस्कानें चमक रही हैं। लेकिन, अंदर अजीब सी बेचैनी है। घबराहट है। नींद गायब है और संवाद लगातार खत्म हो रहा है। मानसिक स्वास्थ्य अब निजी समस्या नहीं बल्कि यह एक राष्ट्रीय संकट है।

हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वीमेंस पॉलीटेक्निक में ‘मेंटल हेल्थ एंड वेल-बीइंग’ पर एक कार्यशाला हुई। संदेश साफ था, डिग्री से पहले स्थिर मन जरूरी है। महत्वाकांक्षा से पहले मानसिक संतुलन जरूरी है।

Read in English: Storm rages within the restless mind; One in ten suffers from depression…! 

भारत में 90 प्रतिशत से अधिक लोग, जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य उपचार की जरूरत है, उन्हें इलाज नहीं मिल पाता। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं है। यह करोड़ों अधूरी कहानियां हैं। नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे, 2015–16, बताता है कि लगभग 15 करोड़ भारतीय किसी न किसी मानसिक विकार से जूझ रहे हैं। हर दस में से एक वयस्क अवसाद या चिंता का शिकार है। एक से दो प्रतिशत लोग सिजोफ्रेनिया या बाइपोलर डिसऑर्डर जैसी गंभीर मानसिक बीमारियों से जूझ रहे हैं।

कोविड के बाद स्थिति और बिगड़ी है। अकेलापन बढ़ा। स्क्रीन टाइम बढ़ा है। आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी है। युवा सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। प्रतिस्पर्धा की आग। करिअर की अनिश्चितता। तुलना का जाल। ऑनलाइन दुनिया का दबाव बढ़ रहा है।

विशेषज्ञ कहते हैं कि भावनात्मक संतुलन सीखा जा सकता है। तनाव से निपटना एक कौशल है। इसे शिक्षा का हिस्सा बनना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी है जितना शारीरिक स्वास्थ्य। मदद लेना कमजोरी नहीं। चुप रहना कमजोरी है।

देश का मानसिक स्वास्थ्य मानचित्र असमान है। दक्षिण के प्रांत, केरल और तमिलनाडु , कर्नाटक जैसे क्षेत्रों में अवसाद और चिंता के मामले अधिक दर्ज हो रहे हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में संघर्ष, नशे और सामाजिक अस्थिरता का असर साफ दिखता है। महिलाओं में अवसाद और चिंता बहुत बढ़ रही है। पुरुषों में नशे की लत और आत्महत्या की दर अधिक हो रही है। लेकिन सबसे बड़ी कमी है, उपचार की।

भारत में प्रति एक लाख आबादी पर औसतन 0.75 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानक है; तीन। देश में केवल 40–50 प्रमुख मानसिक स्वास्थ्य संस्थान हैं। गांवों में तो यह सुविधा लगभग नगण्य है। फिर भी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं। जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम अब 700 से अधिक जिलों में सक्रिय है। सरकार ने 2022 में टेली-मानस शुरू किया। 24 घंटे टेली-काउंसलिंग। दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच। लाखों कॉल संभाली जा चुकी हैं।

आगरा का इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ हॉस्पिटल इस यात्रा का ऐतिहासिक प्रतीक है। 1859 में ‘आगरा लूनेटिक असायलम’ के रूप में स्थापित यह संस्थान आज 172 एकड़ में फैला आधुनिक केंद्र है। 718 बिस्तर। हर साल 19 से 25 हजार मरीज। दक्षिण एशिया तक से लोग इलाज के लिए आते हैं। 1950 में आधुनिक मनोरोग दवाओं की शुरुआत यहीं से हुई।1960 के दशक में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे दक्षिण एशिया के प्रमुख अध्ययन केंद्र के रूप में चुना। यहां ‘फैमिली वार्ड’ की अनूठी व्यवस्था है, मरीज के साथ परिवार भी रह सकता है। इलाज सिर्फ दवा नहीं बल्कि संबंध भी हैं।

कानूनी ढांचे में भी बदलाव आया है। मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 ने आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से बाहर किया। बीमा कंपनियों को मानसिक स्वास्थ्य उपचार कवर करने का निर्देश दिया। अधिकार आधारित दृष्टिकोण अपनाया गया। डिजिटल प्लेटफॉर्म, मानसिक स्वास्थ्य ऐप्स, ऑनलाइन काउंसलिंग, नई पीढ़ी के लिए यह आसान विकल्प बन रहे हैं। लेकिन सवाल है कि क्या यह काफी है?

जब तक स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा अनिवार्य नहीं होगी…, जब तक कॉलेजों में प्रशिक्षित काउंसलर नहीं होंगे…, जब तक मीडिया सनसनी की जगह संवेदना नहीं दिखाएगा…, जब तक परिवार “लोग क्या कहेंगे” से ऊपर नहीं उठेगा…, तब तक यह संकट थमेगा नहीं।

मानसिक स्वास्थ्य कोई विलासिता नहीं है। यह विकास की बुनियाद है। एक अस्थिर मन से स्थिर समाज नहीं बन सकता है। 15 करोड़ लोग मदद चाहते हैं। युवा सबसे अधिक प्रभावित हैं। 90 प्रतिशत उपचार से वंचित हैं। फिर भी उम्मीद है। संरचनाएं बन रही हैं। संवाद शुरू हुआ है। कलंक टूट रहा है। जरूरत है गति की। निवेश की। प्रशिक्षण की, और सबसे ज्यादा  सहानुभूति की। क्योंकि, अगर मन हार गया तो अर्थव्यवस्था की कोई ग्रोथ दर, कोई स्मार्ट सिटी, कोई डिजिटल क्रांति, हमें भीतर से नहीं बचा पाएगी।

भारत को अब मन की तरफ देखना होगा। यहीं से भविष्य बचेगा।



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