प्रसिद्ध न्यूट्रॉन तारे के पास की नई छिपी संरचना की खोज

फोटो : उच्च-द्रव्यमान वाली एक्स-रे द्वितारा प्रणाली सेंटॉरस X-3 का कलात्मक चित्रण, चित्र में दर्शाए गए आकार वास्तविक अनुपात में नहीं हैं।

वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि सबसे चमकीले एक्स-रे पल्सरों में से एक, सेंटॉरस X-3 अभिवृद्धि डिस्क के माध्यम से पदार्थ को अपनी ओर खींचकर निगल रहा है। ऐसी प्रक्रिया इस प्रकार के पल्सरों में बहुत विलक्षण है।

इस अध्ययन से न केवल इस खगोलीय प्रणाली के अधिक सटीक और बेहतर वैज्ञानिक मॉडल विकसित करने में मदद मिलेगी, बल्कि सामान्य रूप से द्वितारा पल्सरों को समझने में भी सहायता मिलेगी। सेंटॉरस X-3 सबसे अधिक अध्ययन किए गए द्वितारा पल्सरों में से एक है। इसकी अत्यधिक चमक ने लंबे समय से वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है।

एक एक्स-रे द्वितारा पल्सर में दो खगोलीय पिंड होते हैं—एक पल्सर, अर्थात अत्यधिक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र वाला न्यूट्रॉन तारा, और दूसरा सूर्य जैसा एक तारा। ये दोनों एक-दूसरे के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव में बंधे रहते हैं और एक-दूसरे की परिक्रमा करते हैं। न्यूट्रॉन तारा एक ऐसा खगोलीय पिंड है, जिसका द्रव्यमान लगभग हमारे सूर्य के बराबर होता है, लेकिन वह अत्यंत छोटे गोले में सिमटा होता है, जिसका आकार लगभग बेंगलुरु शहर जितना होता है। एक्स-रे द्वितारा प्रणाली में पल्सर का अत्यधिक प्रबल गुरुत्वाकर्षण उसके साथी तारे से निकलने वाले पदार्थ को अपनी ओर खींच लेता है। इसके बाद पल्सर उस पदार्थ को अपने ऊपर एकत्र करने लगता है। इस प्रक्रिया के दौरान एक्स-रे विकिरण भी उत्सर्जित होता है।

सेंटॉरस X-3 एक उच्च-द्रव्यमान वाली एक्स-रे द्वितारा प्रणाली है। इसमें साथी तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से 10 गुना से भी अधिक है। यह खोजे गए शुरुआती एक्स-रे पल्सरों में से एक है। यह सेंटॉरस तारामंडल में खोजा गया तीसरा एक्स-रे स्रोत भी है और पृथ्वी से लगभग 24,000 प्रकाश-वर्ष की दूरी पर स्थित है।

पल्सर से निकलने वाले विकिरण का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है। पल्सर अपने चुंबकीय ध्रुवों से विकिरण उत्सर्जित करते हैं जिसे प्राथमिक विकिरण कहा जाता है। जब पल्सर अपनी धुरी पर घूमता है, तो उससे निकलने वाली विकिरण किरणें घूमते हुए अंतरिक्ष में अलग-अलग दिशाओं में गुजरती हैं। जब ये किरणें किसी उपग्रह की दिशा में आती हैं, तो उपग्रह उन्हें दर्ज कर सकता है। यह विकिरण न्यूट्रॉन तारे के आसपास मौजूद संरचनाओं पर भी पड़ता है। इन संरचनाओं में पल्सर की सतह, उसके साथी तारे की सतह और साथी तारे से निकलने वाली तारकीय पवन शामिल हो सकते हैं।

ये संरचनाएं प्राथमिक विकिरण को अवशोषित करती हैं और फिर उसे दोबारा उत्सर्जित करती हैं। इस प्रक्रिया से निकलने वाले विकिरण को द्वितीयक विकिरण कहा जाता है। इन संरचनाओं का अध्ययन महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे वैज्ञानिक इस प्रणाली के भौतिक गुणों, जैसे उसकी अंतरिक्ष में स्थिति और अभिविन्यास तथा चुंबकीय क्षेत्र शक्ति को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। इससे द्वितारा पल्सरों के बारे में वैज्ञानिक ज्ञान बढ़ता है।

इन जटिल संरचनाओं का अध्ययन कठिन है, क्योंकि एक्स-रे द्वितारा प्रणालियां पृथ्वी से इतनी दूर हैं कि दूरबीनों में वे लगभग बिंदु जैसे स्रोत दिखाई देती हैं। ऐसे में उनके आसपास मौजूद संरचनाओं की प्रत्यक्ष तस्वीर लेना कठिन होता है।

हालांकि, द्वितीयक विकिरण इन संरचनाओं का अध्ययन करने का एक उपयोगी साधन है। पहले के अध्ययनों में पाया गया था कि द्वितीयक विकिरण से बनने वाली उत्सर्जन रेखाओं की तीव्रता पल्सर के घूमने के साथ बदलती रहती है। अब विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने इस घटना का गहराई से अध्ययन किया है। रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसंधानकर्ता किंजल रॉय के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने द्वितीयक विकिरण की चार उत्सर्जन रेखाओं का विस्तृत विश्लेषण किया।

अध्ययन से पता चला कि इन उत्सर्जन रेखाओं में होने वाले बदलावों के लिए उत्‍तरदायी संरचना को पल्सर के साथ ही घूमना चाहिए। वैज्ञानिकों ने इस आधार पर उस संरचना की पहचान करने का प्रयास किया, जो इन बदलावों का कारण बन रही थी। किसी जासूस की तरह प्रेक्षणों से सुराग जुटाते हुए, किंजल रॉय ने निष्कर्ष निकाला कि इन उत्सर्जन रेखाओं में होने वाले बदलावों का कारण अभिवृद्धि प्रवाह है। यह वह संरचना है, जो अभिवृद्धि डिस्क से पदार्थ को पल्सर की ओर पहुंचाती है।

अभिवृद्धि प्रवाह का अस्तित्व तभी संभव है, जब प्रणाली में अभिवृद्धि डिस्क मौजूद हो। अभिवृद्धि डिस्क गैस और अन्य पदार्थों की एक चक्राकार संरचना होती है, जो किसी सघन खगोलीय पिंड के चारों ओर बनती है। इस प्रणाली में पदार्थ इस डिस्क में एकत्र होता है और फिर अभिवृद्धि प्रवाह के माध्यम से पल्सर की ओर बढ़ता है।

पल्सर का चुंबकीय क्षेत्र इस पदार्थ को अपनी चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के सहारे उसके चुंबकीय ध्रुवों की ओर निर्देशित करता है। जब अभिवृद्धि प्रवाह पल्सर के घूमने के दौरान उपग्रह और पल्सर के बीच आ जाता है, तो वह उपग्रह की दृष्टि में बाधा उत्पन्न करता है। परिणामस्वरूप, पल्सर से सीधे आने वाले प्राथमिक विकिरण की तीव्रता घट जाती है और अभिवृद्धि प्रवाह से आने वाले द्वितीयक विकिरण की तीव्रता बढ़ जाती है। इसी प्रकार प्राथमिक और द्वितीयक विकिरण की तीव्रता में होने वाले बदलावों का विश्लेषण कर वैज्ञानिकों ने अभिवृद्धि प्रवाह की भूमिका को समझा।

इस अध्ययन का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि सेंटॉरस X-3 प्रणाली में पदार्थ का संचय अभिवृद्धि डिस्क के माध्यम से हो रहा है। यह खोज इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि उच्च-द्रव्यमान वाली एक्स-रे द्वितारा प्रणालियों में सामान्यतः पदार्थ का संचय साथी तारे से निकलने वाली तारकीय पवन को सीधे पकड़कर होता है। ऐसी प्रणालियों में अभिवृद्धि डिस्क बनने की अपेक्षा सामान्यतः नहीं की जाती।

इसलिए, सेंटॉरस X-3 में अभिवृद्धि डिस्क की मौजूदगी इस प्रणाली में पदार्थ के संचय की प्रक्रिया को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। रॉय ने कहा कि उच्च-द्रव्यमान वाली एक्स-रे द्वितारा प्रणालियों में अभिवृद्धि डिस्क बनने की अपेक्षा नहीं की जाती है इसलिए यदि इस प्रणाली में अभिवृद्धि डिस्क बन रही है तो इसके विकिरण से संबंधित मौजूदा मॉडलों में संशोधन करना होगा। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब सेंटॉरस X-3 का मॉडल विकसित किया जाएगा, तब उसमें अभिवृद्धि डिस्क से निकलने वाले विकिरण को भी शामिल करना आवश्यक होगा।