पुलिस कहे, जाइए; नेता कहे, आइए; कैमरा कहे, थोड़ा मुस्कुराइए!

भारत में ‘तानाशाही’ का एक नया और बेहद क्रिएटिव मॉडल आया है। इसमें पुलिस से ज्यादा ताकतवर कैमरा है, हथकड़ी से ज्यादा चमकदार हैशटैग हैं, और जेल जाने से पहले, वकील से ज्यादा जरूरी है वीडियो का एंगल और लाइटिंग!

पुराने जमाने के तानाशाह विरोधियों को चुप कराते थे। हमारे डिजिटल युग के नकली क्रांतिकारी चुप रहने का मौका ही नहीं देते। गिरफ्तारी की खबर आई नहीं कि पूरा प्रोडक्शन हाउस तैयार, कैमरा ऑन, वकील ऑन, भावुक भाषण ऑन, और ‘मैं आखिरी सिपाही हूं’ वाला चेहरा ऑन!

यूट्यूबरों के मामलों को लीजिए। बहस हो सकती है गिरफ्तारी पर, हिरासत पर, कानून पर। लेकिन, सोशल मीडिया की अदालत में फैसला पहले आ जाता है, तथ्य बाद में तलाशे जाते हैं। किसी के लिए यह लोकतंत्र पर हमला है, किसी के लिए ‘मेरा चैनल ट्रेंडिंग’ का सुनहरा मौका। वाह रे क्रांति! जहां माइक भी है, इंटरनेट भी है, और ‘मैं शहीद हूं’ वाला थंबनेल भी तैयार है।

जरा उस तानाशाही की कल्पना कीजिए, जिसमें आरोपी का वीडियो लाखों लोगों तक पहुंचता है, वकील अदालत के दरवाजे पर खटखटाते हैं, पत्रकार प्राइम टाइम में चीखते हैं, और आलोचक अपनी बात दुनिया तक पहुंचा सकते हैं। फिर भी रोना यही है, “अरे बाप रे, तानाशाही आ गई!”

अब दूसरी तरफ का तमाशा देखिए। सत्ता के आलोचक हर पुलिस कार्रवाई को तुरंत ‘आपातकाल’ घोषित कर देते हैं। कानून का उल्लंघन साबित होने से पहले ही खुद को लोकतंत्र का अंतिम रक्षक बता बैठते हैं। हिरासत हुई तो तानाशाही, रिहाई हुई तो ‘संघर्ष की जीत’, जमानत मिली तो ‘न्याय की विजय’। यानी गिरफ्तारी भी प्रचार, रिहाई भी प्रचार, और बीच में रोना-धोना भी प्रचार!

लेकिन ठहरिए, जनाब! असली सवाल यह नहीं है कि कौन कैमरे के सामने कितना रोया या कितना भावुक भाषण दिया। सवाल यह है, पुलिस ने कार्रवाई क्यों की? कानून का पालन हुआ या नहीं? वकील तक पहुंच मिली या नहीं? अदालत ने क्या कहा? इन जवाबों का लाइक्स और व्यूज से कोई लेना-देना नहीं है।

आपातकाल का इतिहास कोई इंस्टाग्राम फिल्टर नहीं है जिसे मनचाहे रंग में रंग दिया जाए। 1975-77 में प्रेस सेंसरशिप, राजनीतिक गिरफ्तारियां और नागरिक स्वतंत्रताओं पर असली पाबंदियां थीं। आज की हर पुलिस कार्रवाई को उसी तराजू पर तौलना इतिहास का मजाक उड़ाना है। लेकिन, हर कार्रवाई को ‘लोकतंत्र सुरक्षित है’ का प्रमाणपत्र देना भी उतनी ही बड़ी बेवकूफी है।

और, अब इस डिजिटल नाटक का सबसे मजेदार दृश्य : एक तरफ पुलिस सोचती है, “हमने कानून लागू किया।” दूसरी तरफ नेता सोचता है, “हमने विरोध कुचल दिया।” तीसरी तरफ यूट्यूबर सोचता है, “अरे वाह, नया वायरल एपिसोड मिल गया!” पत्रकार को प्राइम टाइम मिल गया। सोशल मीडिया को नया युद्धक्षेत्र मिल गया। और जनता बेचारी पूछती रह जाती है, “भाई, देश चला कौन रहा है? सरकार, पुलिस, अदालत… या कंटेंट क्रिएटर?”

क्योंकि, लोकतंत्र कोई यूट्यूब चैनल नहीं जहां हर महीने नया ‘तानाशाही एपिसोड’ निकालना जरूरी हो। और शहादत कोई रील नहीं जिसे हथकड़ी के साथ शूट करके अपलोड कर दिया जाए।

अंत में बस इतना समझ लीजिए, हर हिरासत तानाशाही नहीं होती है। हर सरकार निर्दोष नहीं होती है।

और, हर वायरल क्रांतिकारी शहीद नहीं होता है। बाकी, कैमरा चालू रखिए। अगला एपिसोड… कभी भी आ सकता है!