बुलेट स्पीड में विकास की गाड़ी, छूट रहे हैं छोटे स्टेशन...


लहरिया सराय का 40 वर्षीय युवा राम सहाय रेलवे स्टेशन पर आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां उसका हर कदम आगे बढ़ता है तो कोई न कोई ताक़त उसे पीछे खींच लेती है। गांव की मिट्टी की सुगंध, और शहरी चकाचौंध के आकर्षण से जूझता यह शख्स हर भारतीय नागरिक की दुविधा का आईना बन चुका है।

एक तरफ़ डिजिटल और टेक्नोलॉजी-चालित भविष्य की तेज़ रफ़्तार है, तो दूसरी तरफ़ अतीत की शान-ओ-शौक़त और तहज़ीबी पहचान का बोझ। मोदी मॉडर्नाइज़ेशन प्लान नई रफ़्तार, दक्षता और ग्लोबल स्टेटस का वादा करता है, जबकि प्राचीन सभ्यता की रवायतें ठहराव, हिफ़ाज़त और विरासत से वफ़ादारी पर ज़ोर देती हैं। इस वैचारिक रस्साकशी में, जो संसद से लेकर गली-कूचों और घरों तक महसूस होती है, भारत अपनी राह तय करने में संघर्ष कर रहा है। लोकतंत्र चल रहा है, मगर मंज़िल अभी भी बहस के घेरे में है।

दरअसल, भारत की हर राजनीतिक दल, चाहे वह मोदी का एनडीए हो, राहुल का इंडी गठबंधन हो या क्षेत्रीय सूरमा भोपाली, अखिलेश, ममता या स्टालिन, सब एक ही बीमारी से ग्रस्त हैं। ऊंचे-ऊंचे नारे, मेगा शो, भविष्य के गुलाबी सपने… लेकिन, देश को सच में बदलने वाले छोटे, कठिन, रोज़मर्रा के काम, उनका कोई बाप नहीं है। विकसित भारत, अमृत काल, स्मार्ट सिटी, ये सब पावरपॉइंट में चमकते हैं, हकीकत में देश का तंत्र आज भी वही पुराना, करप्ट, और मिनट-मिनट में हैंग होने वाला सॉफ़्टवेयर है।

सबसे बड़ा छलावा स्मार्ट सिटी और स्वच्छ भारत अभियान बने। 98 हजार करोड़ का ढोल बजा, पर निकला क्या? सड़क किनारे दीवारों पर पेंटिंग, रंगरोगन, एलईडी लाइटें, बन्द पड़े सीसीटीवी कैमरे, अटक-अटक कर चलने वाले वाईफाई पार्क, बस...!

साल 2024 तक 10 हजार में से सिर्फ़ छह हजार प्रोजेक्ट पूरे हुए। कई शहरों ने तो पुराने बजट को नए नाम में पैक कर दिया। 11 करोड़ शौचालय बने, पर यूपी-बिहार-एमपी के गांवों में आज भी लोग खुले में जाते हैं, क्योंकि आदत बदलने का असली काम किसी ने किया ही नहीं। 2023-24 के सर्वे कह रहे हैं कि 30-40 फीसदी शौचालय खाली, बंद, या गोदाम बन चुके हैं। सफाई बाहर की हुई, भीतर की नहीं। दिल्ली हो या आगरा, बड़े शहरों के दम घोंटू माहौल नीतिगत शिकस्त की इबारत लिख रहे है। एक भी शहर को ‘एनवायरनमेंटल शोपीस’ नहीं बना सकी है यह व्यवस्था। अदालतें खुद ‘कन्फ्यूज्ड’ हैं, इधर जाएं, या उधर जाएं।

नदियां दम तोड़ रही हैं और सरकारें आंखे मूंदकर देख रही हैं। नमामि गंगे पर 35 हजार करोड़ ख़र्च, फिर भी 70 फीसदी गंदा पानी बिना ट्रीटमेंट गंगा में ही गिर रहा है। कावेरी हो या सतलुज-यमुना लिंक, 1991 वाली राजनीति आज भी जस की तस, क्योंकि कोई केंद्र सरकार विवाद की घंटी बजाने की हिम्मत ही नहीं करती। जंगल का आंकड़ा पोत-पोतकर दिखाया जाता है, जबकि असली घने जंगल कट रहे हैं; यूकेलिप्टस की खेती को ‘वन’ घोषित कर दिया जाता है। मुंबई से लेकर सुंदरबन तक मैंग्रोव्स लग्ज़री प्रोजेक्ट की बलि चढ़ रहे हैं। हाथी-बाघ संघर्ष में हर साल सैकड़ों जानें जा रही हैं, न कोई ठोस नीति, न इरादा। आगरा का अनूठा हश्र देख लो, पता लग जाएगा कि कितने कामयाब हुए हैं हम।

अनुशासन तो जैसे राष्ट्र की पुरानी स्मृति बन चुका है। न स्कूल में, न लोकतंत्र की प्रहरी संस्थाओं में, सिविक सेंस और अनुशासन का कोई खरीदार है। रोड सेंस! 2022 में 4.61 लाख सड़क हादसे, 1.68 लाख मौतें, दुनिया में सबसे ज़्यादा। हिट-एंड-रन 35 फीसदी बढ़े। कानून है, पर सिर्फ़ कैमरे और चालान के लिए; ज़मीन पर “चलता है” और “राम भरोसे” ही असली नेशनल नीति है।

आज का युवा चूहा-दौड़ में फंस चुका है। या तो वह विदेश भागेगा या यूपीएससी क्लियर कर पेंशन भोगी बाबू बनेगा। स्टार्टअप इंडिया के धुआंधार भाषण अलग, हकीकत अलग, आज भी ‘सपनों का करियर’ मतलब पक्की सरकारी नौकरी + पेंशन। 2024 में यूपी के 60 हजार कांस्टेबल पदों के लिए 2.3 करोड़ आवेदन आए। रेलवे में चपरासी की भर्ती पर भी लाखों कतार लगाते हैं। कोटा-दिल्ली की कोचिंग फ़ैक्टरियां डिग्री से ज़्यादा अवसाद दे रही हैं। कारोबारी जीएसटी, इंस्पेक्टर राज और एंजेल टैक्स से त्रस्त हैं। नतीजा, 2014-2023 के बीच 13 लाख से ज़्यादा स्किल्ड भारतीयों ने नागरिकता छोड़ी, अधिकतर 40 से कम उम्र के रहे।

भ्रष्टाचार ने रूप बदला है, चरित्र नहीं। अब ‘वॉशिंग मशीन’ सार्वजानिक है, पाला बदलते ही गुनाह धुल जाते हैं। अजित पवार से लेकर हिमंत बिस्वा शर्मा और आधी शिवसेना तक, सब बेदाग़ घोषित। ईडी-सीबीआई के केस हवा में गायब। नतीजा, साल 2024 में करप्शन इंडेक्स में भारत 93वें नंबर पर...।

विज्ञान और तर्क तो सरकारों की प्राथमिकता से बाहर हैं। विज्ञान बजट 2014 के 0.86 फीसदी से गिरकर 0.68 फीसदी रह गया। किताबों में पुष्पक विमान और ग्लोरी स्टोरी, पर लैब में ताले। जाति अभी भी भारत का असली ऑपरेटिंग सिस्टम है, हर पार्टी टिकट उसी हिसाब से बांटती है, जैसे 1930 में।

सबसे बड़ी त्रासदी, पार्टियां सब एक जैसी हो चुकी हैं। कांग्रेस न्याय का झुनझुना बजाती है, पर जाति तोड़ने का कोई ब्लूप्रिंट नहीं। क्षेत्रीय दल नौकरी बांटने की राजनीति करते हैं, खुद घोर परिवारवाद चलाते हैं। भाजपा रामराज्य का वादा करती है, पर लोगों की मानसिकता बदलने के लिए कुछ नहीं करती है। देश भविष्य नहीं देख रहा, कोई 15वीं सदी के मंदिर में अटका है, कोई 20वीं सदी के समाजवाद में, कोई ‘स्पेस एज’ के सपने देख रहा है।

भारत को किसी और सौ साल के विज़न डॉक्यूमेंट की नहीं, बस दस–बीस साल की मेहनत चाहिए। कड़े ट्रैफ़िक कानून, आज़ाद संस्थाएं, नदी-विवादों का स्थायी समाधान, असली जंगलों की सुरक्षा, मातृभाषा में मजबूत स्कूल शिक्षा, और ऐसी राजनीति जो दलबदल को सज़ा दे और ईमानदारी को इनाम, बस इतना करना है।

जब तक कोई पार्टी सचमुच इस थकाऊ, बेशोभा, लेकिन बेहद ज़रूरी काम के लिए तैयार नहीं होगी, 2047 भी बस एक और चूका हुआ मौक़ा बनकर फिसल जाएगा, यानी एक और गाल बजाऊ स्लोगन, एक और निराशा की सुरंग...!



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