हजारों साल पुरानी सभ्यता की धरोहर है भारत की एकता


बीते 29 नवंबर को नागपुर बुक फेस्टिवल में बोलते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने महात्मा गांधी की किताब ‘हिंद स्वराज’ के एक विवादित वाक्य की आलोचना की। गांधी ने लिखा था कि भारत एक राष्ट्र के रूप में वास्तव में ब्रिटिश शासन के कारण ही उभरा।

भागवत ने कहा कि यह पूरी तरह गलत और ब्रिटिशों द्वारा थोपे गए उस उपनिवेशवादी इतिहास का हिस्सा है, जिसे भारत पर अपनी पकड़ मजबूत रखने के लिए गढ़ा गया था। उनके अनुसार भारत प्राचीन काल से ही एक राष्ट्र रहा है, जो साझा संस्कृति, धर्म, ग्रंथों, महाकाव्यों और सभ्यतागत चेतना से जुड़ा है, न कि आधुनिक राजनीतिक सीमाओं या पश्चिमी शैली की राष्ट्रवाद की अवधारणाओं से। भारत की राष्ट्र-चेतना शाश्वत, समावेशी और विनम्र रही है।

भागवत ने भारतीय ‘राष्ट्रीयता’ और पश्चिमी ‘नेशनलिज़्म’ में भी फर्क बताया। उनके अनुसार भारतीय भावना आपसी जुड़ाव पर आधारित है, जबकि पश्चिमी राष्ट्रवाद ने दो विश्वयुद्ध जैसे विनाश पैदा किए। उनके योगदान को मानते हुए मोहन भागवत ने कहा कि इस खास मुद्दे पर महात्मा गांधी ‘उपनिवेशवादी इतिहास-लेखन’ से प्रभावित हो गए थे।

स्वाभाविक रूप से इस बयान पर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आईं। कांग्रेस नेताओं ने इसे गांधी का अपमान बताया, जबकि आरएसएस समर्थकों ने इसे उपनिवेशवादी झूठ को तोड़ने और भारत की प्राचीन एकता को सामने लाने की कोशिश के रूप में सराहा।

लेकिन, इन राजनीतिक आरोपों और प्रत्यारोपों से परे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि आख़िर भारत को एक राष्ट्र बनाए रखने वाली असली शक्ति क्या है? क्या भारत ब्रिटिश हुकूमत की देन है, या फिर वह भागवत के मुताबिक़ प्राचीन काल से ही भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र रहा है? क्या जैसा गांधी ने लिखा, भारत एक राजनीतिक इकाई के रूप में ब्रिटिश शासन का असर है? या फिर जैसा भागवत कहते हैं, भारत हमेशा से एक सांस्कृतिक राष्ट्र रहा है?

सच यह है कि भारत की एकता न तो किसी आधुनिक सत्ता की देन है, न किसी साम्राज्य की मर्ज़ी। यह उस गहरी, धीमी परंतु स्थायी सभ्यतागत प्रक्रिया का परिणाम है, जिसने सदियों से इस विविध उपमहाद्वीप को एक भावनात्मक और सांस्कृतिक डोर में बांधे रखा है।

भारत यूरोप की तरह एक भाषा, एक नस्ल या एक धर्म पर खड़ा राष्ट्र नहीं। यह तो विशाल सभ्यतागत गणराज्य है, जहां सैकड़ों भाषाएं, समुदाय, जातियां, पंथ और आस्थाएं एक साझा भाव में पनपीं। जो लोग कहते थे कि भारत इतने ‘विविध’ टुकड़ों में बंट जाएगा, उनकी तमाम भविष्यवाणियां गलत निकलीं। यह सिर्फ चमत्कार नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की पुरातन ताक़त है, जो बार-बार साबित करती है कि हम अलग-अलग होकर भी एक हैं, और एक होकर भी अलग-अलग।

भारत की एकता की ये जड़ें इतिहास में बहुत गहरी हैं। सम्राट अशोक की नीतियों से लेकर संत कबीर, गुरुनानक, मीरा बाई, तुलसी, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, रामानुज, बुद्ध, और सूफी सन्तों तक, हमेशा एक ही रौशनी रही, लोगों को जोड़ने की फितरत...। कभी धर्म का झंडा लेकर किसी पर हमला नहीं किया गया, कभी किसी मज़हबी पहचान को मिटाने की कोशिश नहीं की गई। यही साहसिक उदारता भारत की असली पहचान है।

आज भी आधुनिक भारत की एकता को मजबूत बनाने में हमारे संस्थानों का अहम स्थान है। संविधान, जो हर नागरिक को बराबरी का हक़ देता है, चाहे वह आदिवासी हो, दलित हो, मुसलमान हो या ब्राह्मण। भारतीय रेल, जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश को जोड़ती है। सेना, जो हर सीमा की रक्षा करती है। चुनाव आयोग, जो करोड़ों वोटों को एक ही लोकतांत्रिक धागे में पिरोता है। रुपये के नोट पर छपी 17 भाषाएं, जो रोजमर्रा के जीवन में हमारे बहुलवाद को सांस देती दिखती हैं।

... और भावनाओं का पुल? क्रिकेट। जब मैदान में ‘चक दे इंडिया!’ गूंजता है, तो भाषा, जाति, मज़हब सब पीछे रह जाते हैं। या बॉलीवुड, जो हंसी, आंसू, मोहब्बत और दर्द, सबको एक साथ महसूस कराता है।

कल्पना कीजिए, दिल्ली की एक मलयाली नर्स, जो रात की थकान के बाद आईपीएल देखते हुए चिल्लाती है, “ये रहा विकेट!” पास में रह रहा बिहार का छात्र, जो परीक्षा की चिंता भूलकर दादी को फ़ोन पर बताता है, “आज इंडिया जीतेगा।” उधर, इम्फाल में एक व्यापारी दुकान बंद करते हुए दोस्तों से कहता है, “कल मैच है, सब आना।” ये दृश्य बताते हैं कि भारत किसी काग़ज़ पर नहीं, बल्कि करोड़ों दिलों में बसता है।

धार्मिक और सांस्कृतिक भूगोल ने भी भारत को एक सूत्र में बांधे रखा। हिमालय से कन्याकुमारी तक फैली पवित्र भूमि की कल्पना, चार धाम की यात्राएं, काशी की गंगा, रामेश्वरम की शांति, अजमेर शरीफ़ का सुकून, वेलंकन्नी का करुणा-ग्रहण, ये तीर्थ सिर्फ पूजा स्थल नहीं, बल्कि भावनाओं का प्राचीन नेटवर्क हैं। लोग दूर-दूर से आते, मिलते, रुकते, और एक बड़ी पहचान में बंध जाते हैं।

भारतीय समाज का सहज बहुलवाद भी दुनिया में अनोखा है। यहां किसी से यह नहीं कहा जाता कि अपनी जड़ों को काटकर ‘भारतीय’ बनो। इस्लाम आया तो उसके साथ भक्ति-सूफी सुर भी आए, जो पुल बने। ईसाई परंपराएं आईं, तो केरल में घुल-मिलकर एक अद्भुत रूप लिया। पारसी आए, तो भारत ने उन्हें सिर्फ जगह नहीं दी, बल्कि सम्मान भी दिया। जैन, बौद्ध, यहूदी, सीरियन क्रिश्चियन, सब अपनी राह चलते हुए भारत की मिट्टी में समा गए। किसी की पहचान को कुचलने या मिटाने की कोशिश कम से कम भारतीय परंपरा में नहीं मिलती है।

इसलिए, भारत की एकता सिर्फ संवैधानिक या राजनीतिक धरातल पर नहीं टिकी बल्कि उसकी असली नींव सांस्कृतिक, सभ्यतागत और भावनात्मक है। संस्थान कानूनी ढांचा हैं, क्रिकेट-सिनेमा दिल का जुड़ाव हैं, लेकिन सबसे ताक़तवर है वह शांत, पुरानी सभ्यतागत सहजता, जो फुसफुसाती रहती है, “अनेकता में एकता, और एकता में अनेकता।“

यह बहस सिर्फ एक बार फिर याद दिलाती है कि भारत की जड़ों को समझना ज़रूरी है। यह देश किसी साम्राज्य का उपहार नहीं, बल्कि हजारों साल की मंजिल से गुज़री एक प्राचीन सभ्यता की जीवित धरोहर है।



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