देश का अंतरिक्ष क्षेत्र ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा भारत के पहले निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 का प्रक्षेपण इस परिवर्तन का प्रतीक है।
ध्यान रहे, इंडियन स्पेस पॉलिसी 2023 ने पूरी स्पेस वैल्यू चेन को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया है, जिससे नवाचार, निवेश और उद्यमिता को नई गति मिली है। आज भारतीय उद्योग उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण सेवाओं, अंतरिक्ष अनुप्रयोगों और डाउनस्ट्रीम सेवाओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था अब तेज़ी से आगे बढ़ रही है। वर्तमान में लगभग 8.4 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य वाली इस अर्थव्यवस्था के 2030 तक बढ़कर 40–45 अरब अमेरिकी डॉलर और 2040 तक 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का लक्ष्य है। भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, विनिर्माण, नवाचार और वाणिज्यिक अंतरिक्ष गतिविधियों के क्षेत्र में एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है।
स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित ‘विक्रम-1’ भारत का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल प्रक्षेपण यान है, जो 350 किलोग्राम तक के पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित करने में सक्षम है। ऑर्बिटल प्रक्षेपण यान उपग्रहों को पृथ्वी की निर्धारित कक्षाओं में स्थापित करते हैं, जिससे संचार, नौवहन, पृथ्वी अवलोकन और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसी सेवाओं को बढ़ावा मिलता है। इसे पूरी तरह से कार्बन कम्पोजिट स्ट्रक्चर, भरोसेमंद सॉलिड-फ्यूल बूस्टर और 3डी-प्रिंटेड लिक्विड इंजन से बनाया गया है। विक्रम-1 भारत की बढ़ती प्राइवेट-सेक्टर लॉन्च क्षमताओं को दिखाता है।
इस मिशन के तहत कई ग्राहक पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा में 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया जाएगा। इनमें स्काईरूट का स्कोप उपग्रह, डीक्यूब्ड का प्रौद्योगिकी प्रदर्शन पेलोड, ग्रहा स्पेस का सोलारास एस-3 उपग्रह तथा कॉस्मोसर्व स्पेस की 'एम्ब्रेस' नामक रोबोटिक भुजा शामिल है। 'एम्ब्रेस' को अंतरिक्ष में मौजूद मलबे को पकड़ने के लिए विकसित किया गया है।
विक्रम-1 की पहली उड़ान में दो विशेष वस्तुएं भी भेजी जाएंगी—'कॉस्मिक ब्लूम', जो फूल के आकार की एक कलाकृति है और 18 कैरेट सोने से बना एक सूक्ष्म रॉकेट। इस सूक्ष्म रॉकेट पर सीवी रमन, विक्रम साराभाई और डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की अत्यंत सूक्ष्म आकृतियां उकेरी गई हैं, जिनमें से प्रत्येक का आकार चावल के एक दाने से भी छोटा है। यह भारत के महान वैज्ञानिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का एक प्रयास है।
यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत सरकार ने भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023 अधिसूचित की है, जिसके तहत गैर-सरकारी संस्थाओं को अंतरिक्ष क्षेत्र की संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में भागीदारी की अनुमति दी गई है। इस नीति ने भारत में निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष गतिविधियों के नए अवसर खोले हैं। इसका उद्देश्य प्रौद्योगिकी में नवाचार को बढ़ावा देना, नए विचारों और उद्यमों को प्रोत्साहित करना तथा अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश को बढ़ाना है।
साथ ही, यह नीति अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को भी बढ़ावा देती है और अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग एवं अन्वेषण के लिए वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करती है। ये सभी कदम मिलकर एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर अग्रसर हैं।
भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023 के लागू होने के बाद इन-स्पेस को और अधिक सशक्त बनाया गया है। यह संस्थानों को एक स्पष्ट और स्थिर नियामक ढांचा उपलब्ध कराता है तथा उद्योग की व्यापक भागीदारी को आसान बनाता है।
साथ ही, यह इसरो की सुविधाओं, प्रौद्योगिकी और तकनीकी विशेषज्ञता तक पहुंच उपलब्ध कराता है तथा पारदर्शी दिशा-निर्देशों के माध्यम से अनुमोदन प्रक्रिया को सरल बनाता है। जून 2026 तक इन-स्पेस ने 4,500 से अधिक संस्थाओं का पंजीकरण, 133 अनुमतियां जारी की हैं और 106 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं।
इसके अलावा, फरवरी 2026 तक इन-स्पेस ने वर्ष 2025 के दौरान भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप्स में 15 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश आकर्षित करने में सहायता की, जबकि शीर्ष 10 स्टार्टअप्स को इसी मूल्य के पुष्ट वाणिज्यिक ऑर्डर प्राप्त हुए। जून 2026 तक इन-स्पेस ने 118 प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों को सुगम बनाया तथा 189 संयुक्त परियोजना कार्यान्वयन योजनाओं, प्रौद्योगिकी साझेदारी समझौतों और व्यावसायिक साझेदारी समझौतों पर हस्ताक्षर कराए, जिससे प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण और उद्योग के बीच सहयोग को नई गति मिली।
दिसंबर 2025 तक इसरो द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों के 70 से अधिक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों के माध्यम से उद्योगों को तकनीक उपलब्ध कराई गई, जिससे उनके व्यावसायीकरण को गति मिली। वहीं, जुलाई 2026 तक एनएसआईएल ने कुल 141 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया है, जिनमें 138 अंतर्राष्ट्रीय/ग्राहक उपग्रह और तीन भारतीय उपग्रह शामिल हैं। यह उपलब्धि वैश्विक स्तर पर भारत की एक विश्वसनीय प्रक्षेपण सेवा प्रदाता के रूप में स्थिति को और मजबूत करती है।
अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति को अधिक उदार और निवेशक-अनुकूल बनाया गया है। नई नीति के तहत उपग्रहों के निर्माण और संचालन में 74 प्रतिशत तक, प्रक्षेपण यान और स्पेसपोर्ट में 49 प्रतिशत तक तथा उपग्रहों के पुर्जों और उप-प्रणालियों के निर्माण में 100 प्रतिशत तक स्वचालित मार्ग से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी गई है। इस नीति से निवेश बढ़ने, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में कारोबार करना और अधिक सुगम होने की उम्मीद है।
इससे पहले, अक्टूबर 2022 में भारत का पहला समर्पित वाणिज्यिक एलवीएम-3 मिशन सफलतापूर्वक पूरा किया गया। इस मिशन के तहत वनवेब के 36 उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया गया, जिससे वैश्विक वाणिज्यिक प्रक्षेपण सेवा बाजार में भारत की स्थिति और मजबूत हुई।
नवंबर 2022 में 'मिशन प्रारंभ' के तहत विक्रम-एस का प्रक्षेपण किया गया। यह भारत का पहला निजी तौर पर विकसित रॉकेट और इन-स्पेस से अनुमोदित देश का पहला निजी प्रक्षेपण था। इस प्रौद्योगिकी प्रदर्शन मिशन में सेंसर से लैस तीन ग्राहक पेलोड भेजे गए, ताकि भविष्य के कक्षीय मिशनों के लिए आवश्यक प्रक्षेपण तकनीकों का परीक्षण किया जा सके।
मई 2024 में अग्निकुल कॉसमॉस श्रीहरिकोटा स्थित भारत के पहले निजी प्रक्षेपण परिसर 'धनुष' से रॉकेट प्रक्षेपित करने वाली पहली गैर-सरकारी संस्था बनी। इस मिशन में दुनिया के पहले एकल-खंड त्रि-आयामी मुद्रित अर्द्ध-क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन का भी सफल प्रदर्शन किया गया।
इन-स्पेस ने पृथ्वी अवलोकन उपग्रह समूह के विकास के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को मंजूरी दी है। इस परियोजना का नेतृत्व पिक्सेल कर रही है, जबकि ध्रुव स्पेस, सैटश्योर एनालिटिक्स इंडिया और पियरसाइट स्पेस इसके साझेदार हैं। इस पहल का उद्देश्य कृषि, आपदा प्रबंधन, जलवायु निगरानी और शहरी नियोजन जैसी सेवाओं को सशक्त बनाना है।
अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण को भी नई गति मिली है। फरवरी 2026 में इन-स्पेस ने 511 करोड़ रुपये की लागत पर 10 वर्षों के लिए लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान की प्रौद्योगिकी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को हस्तांतरित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे उद्योग के माध्यम से इसके उत्पादन और प्रक्षेपण सेवाओं का मार्ग प्रशस्त हुआ।
वहीं, बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस ने डीआरडीओ के प्रौद्योगिकी विकास कोष के तहत विकसित स्वदेशी हरित प्रणोदन प्रणाली का सफल प्रदर्शन किया। इन कार्यक्रमों ने स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं को मजबूत किया है और भारत को वैश्विक अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
इस लॉन्च के साथ भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब एक नए युग की दहलीज पर खड़ा है। भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023, उदार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति और विशेष वित्तीय सहायता योजनाओं ने अंतरिक्ष क्षेत्र की पूरी मूल्य श्रृंखला को नए प्रतिभागियों के लिए खोल दिया है। इन सुधारों ने एक सशक्त पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण किया है, जिसमें तेजी से विकसित होते स्टार्टअप, स्वदेशी नवाचार और वाणिज्यिक गतिविधियों का विस्तार शामिल है। 'मिशन आगमन' के तहत विक्रम-1 का प्रस्तावित प्रक्षेपण केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग की बढ़ती क्षमता, आत्मविश्वास और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता का भी प्रतीक है।
इसरो के नेतृत्व में आरंभ हुई भारत की अंतरिक्ष यात्रा अब एक सशक्त और आत्मनिर्भर अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित हो रही है। निरंतर नीतिगत समर्थन, सार्वजनिक-निजी भागीदारी और तकनीकी नवाचार के बल पर भारत वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में अपनी स्थिति को और सुदृढ़ कर रहा है तथा भविष्य की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।

समीक्षा भारती न्यूज सर्विस





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