घर पूजे गये गोवर्धन महाराज की अदभुत झाकी
इन्द्र के अंहकार को नाश करने के लिये भगवान कृष्ण ने उठाया था गोवर्धन पर्वत
मथुरा। गोवर्धन पूजा मे गोधन यानी गायो की पूजा। शास्त्रा मे बताया जाता
है कि गाय उसी प्रकार पवित्र होती है जिस प्रकार नदियो मे गंगा, गाय को
देवी लक्ष्मी का रूप भी कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्वि
प्रदान कर ती है उसी प्रकार गाय माता भी अपने दूध से स्वास्थय रूपी धन
प्रदान करती है, इनका बछडा खोतो मे अनाज उगाता है। इस प्रकार गऊ माता
सम्पूर्ण मानव जाति के लिये पूज्यनीय और आदरणीय है, गाय माता के प्रति
श्रद्वा प्रकट करने के लिये कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन
पूजा की जाती है। इस दिन देश विदेश से लाखो की संख्या मे श्रद्वालु
गोवर्धन मे गोवर्धन की पूजा करने के लिये आते है और गिर्राज महाराज की
परिक्रमा कर अपने आपको धन्य मानते है।
गोवर्धन पूजा को बृज के नर और नारी दीपावली के दूसरे दिन बनाते है इस
दिन गोवर की विशालकाय प्रतिमा बनाते है और उसकी पूजा करते है गोवर्धन के
दिन अन्नकूट का प्रसाद भी घर घर मे बनाया जाता है और गोवर्धन महाराज को
भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है गोवर्धन पूजा की किवदती इस प्रकार
है कि देवराज इन्द्र को अभिमान हो गया था, इन्द्र का अभिमान चूर करने
हेतु भगवान श्री कृष्ण जो कि स्वंय लीलाधारी श्री हरि विष्णु के अवतार है
ने एक लीला रची प्रभु की इस लीला मे हुआ यू कि एक दिन प्रभु ने देखा कि
सभी बृवासी पकवान बना रहे है औश्र किसी की पूजा मे जुटे हुये है, तो श्री
कृष्ण ने बढे प्यार से और भोलेपन मे मयया यशोदा से प्रश्न किया कि मयया
ये लोग किसकी पूजा की तैयारियो मे जुटे हुये है तब मैया बोली लल्ला हम
देवराज इन्द्र की पूजा के लिये अन्नकूट की तैयारिया कर रहे है, तब दोवारा
श्री कृष्ण ने प्रश्न किया कि हम इन्द्र की पूजा क्यो करते है तब मैया
बोली कि वह हमारी पूजा से प्रसन्न होकर वर्षा करते है जिससे खेतो मे अनाज
की पैदावार होती है और उससे हमारी गायो को चारा मिलता है, भगवान कृष्ण
बोले कि हमे तो गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिये हमारी गाये तो वही
चरती है इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत पूज्यनीय है और इन्द्र तो कभी दर्शन
भी नही देते और पूजा न करने पर क्रोधित भी होते है अत ऐसे अंहकारी की
पूजा नही करनी चाहिये।
लीलाधारी की लीला और माया से सभी ने इन्द्र के बदले गोवर्धन पर्वत कीी
पूजा की, बृज के ग्वालो द्वारा गोवर्धन पर्वत की को देख इन्द्र ने अपना
अपमान समझ लिया और मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी, प्रलय के समान वर्षा होने
पर सभी बृजवासी भगवान कृष्ण को कोसन लगे और कहने लगे यह प्रलय इनका कहा
मानने से आयी है अगर कान्हा की बात न मानते तो आज हमको प्रलय का सामना
नही करना पडता, बृजवासियो को ऊपर आफत की प्रलय को आता देख भगवान श्री
कृष्ण ने अपनी कनिष्क उंगली पर पूरा गोर्वधन पर्वत को उठा लिया और सभी
बृवासियो को उसमे अपने गायो और बछडो सहित शरण लेने के लिये बुला लिया,
इन्द्र कृष्ण की इस लीला को देखकर और क्रोधित हो गया और इन्द्र ने बर्षा
और तेज कर दी। तब कही जाकर भगवान कृष्ण ने अपने सुर्दशन चक्र को आदेश
दिया कि आप गोर्वधन पर्वत के अपर जाकर वर्षा की गति को नियत्रण करे और
शेषनाग से कहा कि आप मेड बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोके, इन्द्र
लगातार सात दिन तक मूसलाधार बारिश करते रहे तव उन्हे एहसास हुआ कि उनका
मुकाबला करने वाला कोई आम आदमी नही है वह तुरत ब्रहमा जी की शरण पहुचा और
अपने साथ हुये बृतांत के बारे मे ब्रहमा जी को बताया इन्द्र की बात सुन
ब्रहमा जी ने कहा कि इन्द्र जिस बालक की तुम बात कर रहे है हो वह भगवान
विष्णु के साक्षात अंश है और पूर्ण पुरूषोत्तम नारायण है ब्रहमा जी के
मुख से उस बालक की यह बात जानकर इन्द्र बहुत लज्जित हुआ और भगवान कृष्ण
से बोला कि प्रभु मे आपको पहचान नही सका इसलिये अंहकारवश भूल बैठा, आप
दयालु है और कृपालु है इसलिये मेरी भूल को क्षमा करे औश्र अपने चरणो मे
जगह दे तभी से गोवर्धन की पूजा परे बृज मे होती है इस दिन बृवासी गाय और
बैलो को स्रान कराकर उन पर रंग लगाते है और गले मे नई रस्सी डाकर उन्हे
चावल, गुड इत्यादि भी खिलाते है।





