केप्टिन कुक काटेज – अतीत का आंनद

अतीतजीवी होने का अपना अलग आनंद है.   आने वाले कल को सुनहरा बनाने के लिए जरूरी है की हम गुजरे हुए कल को बार बार देखें .

केप्टिन कुक के नाम से मशहूर  नौजवान  जेम्स कुक  इंग्लैंड के योर्कशायर के गाँव ग्रेट  येतन में रहता था और २७ साल की उम्र में रायल नेवी में रहते हुए १७६९ में रहस्य रोमांच से भरपूर लम्बी लम्बी समुद्री यात्राएँ की. आस्ट्रेलिया को खोज निकालने वाला केप्टिन कुक ही था. कुक ने अपने जीवन में ३२२०००  कि .मी.की समुद्री  यात्रा कर और इस अभियान में आस्ट्रेलिया की खोज कर दुनिया के इतिहास में अपना नाम दर्ज कर लिया.

. कुक का जहाज  अप्रेल १७७० में विक्टोरिया में समुद्र किनारे लगा तभी से इंग्लेंड के हाथ आस्ट्रेलिया आया . १८ वी. शताब्दी में इंग्लेंड की हालत पतली थी और गरीबी के कारण अपराध बढ रहे थे,अपराधियों को जेल में रखने के स्थान कम पड़ने लगे.इसी समय में कुक द्वारा खोजी नई जमीन इंग्लेंड को बेहद पसंद आई. .सभी जानते हैं की इंग्लेंड ने  शुरू में इस कोलोनी का इस्तेमाल कैदियों  के लिए किया..भारत में काला पानी नाम से मशहूर  अंडमान -निकोबार दीप का प्रयोग भी जेल के रूप में किया गया था.

केप्टिन कुक के इंग्लैण्ड के मकान को जस  का तस उखाड़ कर मेलबर्न में खड़ा कर दिया गया है . आजकल यह पर्यटक स्थल है . अपने मथुरा में फेड्रिक सामन ग्राउस ने म्यूजियम बनाया . पूरी दुनिया में मथुरा की पहचान इस म्यूजियम से है लेकिन ग्राउस का स्मृति चिन्ह बड़े जतन से तलाशने पर म्यूजियम के अंदर मिलता है . खैर .

yorkshire  के गाँव great  Ayton  में कुक के पिता के मकान को जस का तस उखाड कर मेलबर्न में स्थापित कर दिया गया है. यह योजना १९३४ में बनी.मेलबर्न के एक इतिहास प्रेमी सर Russell  Grimwade ने  इस मकान की कीमत चुकाई और छोटे से मकान की इंटों को  सावधानीपूर्वक अलग कर ,उन पर नंबर डालकर २५३ कंटेनरों में बंद कर जहाज से मेलबर्न लाया गया था .जब इस कॉटेज को मेलबर्न लाने की आवाज उठी तो सरकार ने अपने हाथ ऊपर  खड़े कर दिए .तब एक इतिहासकार ने जीवन में अर्जित की सारी सम्पदा एक  श्रेष्ठ लक्ष्य के लिए सपर्पित कर दी .

इंग्लेंड में  १८ वीं शताब्दी के मकानों की बनाबट आज से एकदम भिन्न थी. .मकान के चारोँ ओर  फुलवारी और ऐसे पेड़-पोधे होते थे जो किसी रोग के उपचार में काम आते थे. हैरत  की बात यह है कि  कुक की काटेज की ईट पत्थर  ही नहीं  काटेज की फुलवारी  भी  यहाँ इंग्लेंड से लाकर   रोप दी गई है. यह काटेज   इतिहास प्रेमी पर्यटकों  को बेहद  लुभा रही है. यह स्मारक  १८ वीं शताब्दी इंग्लेंड की जीवन शैली  के दर्शन करा रहा है .

सवाल यह है ---- संस्कृति, सभ्यता और इतिहास के स्मारकों को हम सम्पन्नता के अवशेष माने या सम्पन्न सोच के ?


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