रात 12 बजे कृष्ण जन्मस्थान पर भागवत भवन के अंदर कन्हैया का अभिषेक करते संत नृत्यगोपाल दास महाराज एवं राधाकृष्ण की आलौकिक छवि
रत्नजतिड़त पोशाक में दिखी कन्हैया की अलौकिक छवि
मथुरा। जन्मभूमि में आधी रात से ही माहौल कृष्णमय हो गया। रात 11 बजकर 45 मिनट पर मंदिर के पट खुल गए। 12 बजे जैसे ही श्रीकृष्ण का जन्म हुआ मंदिर के पुजारियों ने उनका अभिषेक किया। इसके बाद उन्हें दुध और दही से नहलाया गया। बाल गोपाल के जन्म के बाद उन्हें पंचामृत से स्नान करवाया गया। इसमें सभी तीर्थों के जल थे। इनमें गंगा, यमुना सहित देश की सभी नदियों और समुद्र का जल शामिल था। वस्त्र धारण करने के बाद भगवान कृष्ण के शरीर पर चंदन और तुलसी का लेप लगाया गया, ताकि उन्हें ठंडक प्राप्त हो। इसके बाद उनके बालस्वरूप का श्रृंगार हुआ। उन्हें खास तरह का मयुरांबर पोशाक पहनाया गया और आरती हुई। इस दौरान ढोल-नगाड़े, झांझ-मजीरा, घंटे, तालियां और मृदंग की गड़गड़ाहट गूंजती रही। बालगोपाल को पाग, पंजीरी का भोग लगाया गया। कीर्तन से पूरी जन्मभूमि गुंजायमान रही। श्रृंगार के साथ ही उनकी आरती हुई। इसी के साथ मंदिर में कृष्ण जन्मोत्सव शुरू हो गया। शंख, ढोल-नगाड़े, झांझ-मजीरा और मृदंग तेजी से बजने लगे। लाखों भक्त झूमते हुए कृष्ण की भक्ति में लीन हो गए। वे प्रसाद और चरणामृत के लिए बहुत उतावले हो रहे थे। रत्न जड़ित रेशम की पोशाक में बालकृष्ण की अलौकिक छवि देखते ही बन रही थी। हर तरफ इत्र और फूलों की बरसात हो रही थी। चारों तरफ ‘नंद के घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की’ गूंजता रहा। साथ ही, लगातार कृष्ण लीलाओं का मंचन होता रहा, जिसे देख लोग भाव विभोर हो उठे। जन्मभूमि में भक्तों का उत्साह उफान पर था। मथुरा के भागवत भवन स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थली जाने के लिए हर कोई आतुर था। कार्यक्रम के प्रारम्भ में गुरूशरणनन्द तथा महंत नृत्य गोपाल दास का स्वागत महोत्सव समिति के अध्यक्ष लक्ष्मण दास अग्रवाल, संस्थान के सचिव कपिल शर्मा, डा. चन्द्रभान गुप्त, गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी, गिरीश चन्द अग्रवाल, आदि ने माल्यार्पण कर दिया। पुष्पांजलि कार्यक्रम में श्री मथुरा नाथ चतुर्वेदी व्यास जी द्वारा भक्तमई संगीत व स्वामी श्री राम शर्मा निमाई ने दशावतार लीला का प्रस्तुतिकरण कर दर्शाकों को मन मोह लिया।
5242वें साल में हुए प्रवेश
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार भगवान कृष्ण अब 5242वें साल में प्रवेश कर गए। द्वापर युग में कान्हा की जन्म के समय जो योग बने थे, उनमें से कई सोमवार की मध्य रात्रि में भी मौजूद थे। दक्षिणायण, वर्षा ऋतु, अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, वृष राशि के चंद्रमा का उच्च राशि में आ जाना एक सुखद संयोग था। जन्म के बाद मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि रोशनी से नहा उठी। सभी कृष्ण भक्ति में डूबे रहे। हर तरफ श्री कृष्ण भजनों की धूम रही।





