ब्रज भाषा का कम प्रयोग चिंता और चिंतन का विषय

मथुरा। उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान द्वारा ज्ञानदीप शिक्षा भारती के विशेष

सहयोग से गुरूशरणम सविता सभागार में आयोजित संगोष्ठी और कवि सम्मेलन में

देश के विभिन्न राज्यों से आए कवियों की भक्ति, श्रंगार, हास्य काव्य

रसधारा के साथ प्रखर, प्रबुद्ध, काव्य रसिकों की तालियाँ गूँजती रही।

माँ सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन और पूनम वर्मा की सरस्वती

वन्दना के पश्चात कार्यक्रम के प्रथम चरण में सम्पन्न ब्रजभाषा परिचर्चा

संगोष्ठी मंे राधा गोविन्द पाठक, ययाम सुन्दर अकिंचन और वरूण चतुर्वेदी

ने ये विचार व्यक्त किए कि ब्रजभाषा 700 वर्षों से काव्य की भाषा रही है।

यह भाषा राधा-कृष्ण और ब्रजवासियों की भाषा रही है। महाकवि सूर के

वात्सल्य वर्णन से वात्सल्य को दशम रस की प्रतिष्ठा ब्रजभाषा के कारण

प्राप्त हुई है। वक्ताओं ने यह चिन्ता व्यक्त कि वर्तमान समय मे ब्रजभाषा

काव्य तो लिखा जा रहा है किन्तु ब्रजभाशा में गद्य लेखन और व्यवहार में

ब्रजभाषा का कम प्रयोग होना चिन्ता और चिन्तन का विषय है। संगोष्ठी की

अध्यक्षता करते हुए वनज कुमार वनज ने कहा कि महाकवि सूरयुगीन कवियों ने

ब्रजभाषा को जो जीवन्तता प्रदान की वह आज भी ब्रजभाषा कवियों के लिए

प्रेरणास्पद बनी हुई है। ब्रजभाषा साहित्यकार और लोक संस्कृति मर्मज्ञ

मोहन स्वरूप भाटिया की अध्यक्षता में प्रांरभ कवि सम्मेलन में उत्तर

प्रदेश भाषा संस्थान की गतिविधियों की चर्चा के मध्य शशंाक प्रभाकर ने

बताया कि मुख्य मंत्री अखिलेश यादव संस्थान के अध्यक्ष तथा

अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि पùभूषण नीरज कार्यकारी अध्यक्ष हैं।

उन्होंनंे बताया कि संस्थान द्वारा होली के अवसर पर मथुरा-वृन्दावन में

यमुना तट स्थित घाटों पर काव्य- संगीत कार्यक्रम का प्रस्ताव विचाराधीन

है। कवि सम्मेलन के अध्यक्ष मोहन स्वरूप भाटिया ने अपने सम्बोधन में कहा

कि आजकल प्रायः कवि सम्मेलनों में चुटकुलेबाजी और तुकबन्दी हो रही है जब

कि यह कवि सम्मेलन वास्तविक कविताओं के कारण कवि सम्मेलन नहीं कविता

सम्मेलन रहा है।


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