मथुरा। रामलीला सभा द्वारा श्री कृष्ण जन्म स्थान के रंगमंच पर प्रभू श्री राम के राज्याभिषेक तथा सुग्रीव वानरों आदि को विदा करने की लीला का मंचन किया गया। श्री राम चन्द्र जी महाराज के बराबर में गुणों की खानि लझ्मी स्वरूपिणी जानकीजी विराजमान हुयी उनकी यह सेवा देखकर सारी माताएं हर्षित हुई और अपना जन्म सफल माना उस समय सारे देवता अपने अपने विमानों पर चढकर सुखकन्द भगवान श्री राम चन्द्र जी का दर्शन करने के लिए आये मुनिवर वशिष्ठ जी के मन में वडी प्रीति हुयी जिसका वर्णन नहीं हो सकता उस समय ब्राह्मणों ने वेद के मंत्र उच्चारण किये और आकाश से देवता व मुनी जय जय करने लगे सवसे पहले मुनिवर वशिष्ठ जी ने श्री रामचन्द्र जी का तिलक किया और वाद में सव ब्राह्मणों को भी तिलक करने की आज्ञा दी। आकाश में अनेक नगाड़े वजने लगे गन्धर्व किन्नर गाने लगे भरत से लेकर छोटे भाई तथा विभीषण अंगद तथा हनुमान जी इत्यादि समेत जितने है वे छत्र चम्वर पॅखा धनुष असि चर्म तथा शक्ति धारण किये हुए विराज रहे हैं।विभीषण ने समुद्र द्वारा रावण को दी गयी एक रत्न जडित माला जो उसके पास थी वो जानकीजी केगले में डाल दी ।सीता जी ने यह माला हनुमान जी को दे दी हनुमान जी उसमें राम नाम देखने लगे राम का नाम न होने के कारण उन्होंने वह माला तोड़ दी जिस चीज में राम का नाम नहीं वह वस्तु किसी काम की नहीं किसी ने कहा कि आपके शरीर में राम का नाम है ऐसा सुनते ही हनुमान जी ने अपनी छाती फाड़ डाली उनके शरीर के सभी स्थानों में राम नाम अकित देख सव आदमी अपने मन में चकित हुए। सारे वानरों बिभीषण को विदा कर दिया।





