मथुरा। ग्राम पंचायतों के प्रधानों के आरक्षण के लिए कराये गये रैपिड सर्वे के अनुसार जिस तरह पंचायतों के प्रधानों का आरक्षण किया है उससे जनपद में एक नया माहौल पैदा हो गया है। जिन गांवों में बीसी की संख्या कम है उन गांवों में तो सामान्य सीट घोषित कर दी हैं और जहां पर सामान्य की संख्या निर्धारित मानक से कम है वहां पर बीसी की सीट घोषित करने से जनपद भर में अफरा तफरी मची हुई है। इस सम्बन्ध में जब डीपीआरओ से स्थिति पूछी गयी तो उन्होंने अपने को असहाय बताते हुए किसी उम्मीदवार को कुछ समझाने लगे तो किसी को यह कहकर सांत्वना देने लगे कि एक-दो दिन रुक जाओ उच्च न्यायालय से आदेश आने को हैं। आरक्षण की एक बानगी विकास खण्ड राया के गांव सौंख खेड़ा की इस प्रकार है । ग्राम पंचायत सौंख खेड़ा में कुल मतदाता 1012 हैं, जिनमें ब्राह्मण व वैश्य वर्ग के 383 और एस.सी. वर्ग के 112 हैं। शासन के मानक के अनुसार इस गांव की सामान्य सीट होनी चाहिए लेकिन जो आरक्षण जारी किया है उसमें यहां की सीट को बीसी उम्मीदवार के लिए एलौट कर दिया है। इस प्रकार की स्थिति और भी अनेक गांवों में हैं। सूत्रों से पता चला है कि कई ग्राम पंचायतों के प्रधानों ने तो उच्च न्यायालय में रैपिड सर्वे के खिलाफ रिट दायर कर दी है। ज्ञातव्य हो कि रैपिड सर्वे जिस समय हुआ था, उस समय बीएलओ हड़ताल पर थे। ऐसी स्थिति में यह सर्वे सहायक शिक्षामित्रों से कराया है जिनपर कि किसी भी प्रकार के कोई आंकड़े नहीं थे। इसके बाबजूद भी आरक्षण शासन प्रशासन की मिलीभगत से मनमानी तरीके से सम्भवतः इसीलिए घोषित कर दिया है ताकि प्रधान पद के उम्मीदवार अदालत की शरण में चले जायें और एक बार फिर यह मामला अटक जाये।





