जब वोटर भाव नहीं देते, तो कुछ नेता सड़क पर उतर आते हैं। जब दलीलें खत्म होती हैं, तो गाली गलौज शुरू हो जाती है। और, जब जनता साथ नहीं देती, तो क्रांति का ढोल पीट दिया जाता है...
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बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।
जब वोटर भाव नहीं देते, तो कुछ नेता सड़क पर उतर आते हैं। जब दलीलें खत्म होती हैं, तो गाली गलौज शुरू हो जाती है। और, जब जनता साथ नहीं देती, तो क्रांति का ढोल पीट दिया जाता है...
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पेरिस की कक्षाओं से स्पेन की सड़कों तक, युवा बेहतर भविष्य मांग रहे हैं। भारत में कुछ युवा इस्तीफों, हंगामे और सियासी नौटंकी में क्यों उलझे हैं?
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एक जमाना था सुबह का अखबार पढ़े बिना लोगों को चैन नहीं आता था। शाम को, ‘हम लोग’, या रविवार की सुबह ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ सीरियल देखे बगैर सो नहीं पाते थे। घंटों तक बच्चे टीवी से चिपके रहते थे। क्रिकेट मैच मोहल्लों को जोड़ देते थे। धारावाहिक घर-घर की बातचीत बन जाते थे। समाचार चैनल देश की राजनीतिक धड़कन तय करते थे। मीडिया सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं था, वह सामाजिक संस्कृति का हिस्सा था। और अब...
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बेटे ने अपनी ही मां को गोली मार दी। भाई खेत के टुकड़े के लिए एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। बुजुर्ग मां फ्लैट के एक कोने में पड़ी रही, जैसे घर का कोई बेकार सामान। एक युवा प्रोफेशनल अकेलेपन से टूटकर आत्महत्या की कोशिश कर बैठा। यह किसी अपराध फिल्म की पटकथा नहीं है बल्कि यह बदलते भारत की भयावह सामाजिक तस्वीर है। वही भारत, जिसने कभी पूरे उत्साह से ‘हम दो, हमारे दो’ का नारा अपनाया था...
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यूरोप की चमचमाती सड़कें, साफ-सुथरी नदियां, शानदार इमारतें और समय पर दौड़ती ट्रेनें देखकर मन खुश हो जाता है। लगता है, बस यहीं बस जाएं! लेकिन, जैसे ही जेब से पैसे निकलने शुरू होते हैं, सपनों की दुनिया में महंगाई का भूत नाचने लगता है। खूबसूरती अपनी जगह है, मगर जिंदगी चलाने का खर्चा देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। आखिर यह कैसी तरक्की है, जहां कमाई लाखों में और बचत कौड़ियों में रह जाती है?
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हाल ही में, आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह कोई संयोग या महज़ दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा यमुना में उतरे। दो घंटे तक उन्हें बचाने की कोशिशें चलती रहीं, लेकिन अंततः चार बच्चों के शव बाहर निकाले गए। आए दिन ये दुर्घटनाएं हो रही हैं। पुलिस ने घाटों पर होर्डिंग लगाए हैं, सावधान किया है, पर लोग हैं कि मानते नहीं। वाकई, परिवारों का दुख शब्दों से परे है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी आस्था, इतिहास और सभ्यता सांस लेती आई है, आज मौत की गवाह बनती जा रही है...
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