बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

लाल झंडे अब कम दिखते हैं। मई दिवस की रौनक भी फीकी पड़ गई है। कभी जो दिन मेहनतकशों की  एकता का पैग़ाम देता था, आज वह बस एक रस्म सा लगता है। मगर सच यह है कि ज़मीन के नीचे अंगारे अब भी सुलग रहे हैं। सवाल वही है; क्या तरक़्क़ी सिर्फ कुछ लोगों के लिए है, या सबके लिए...

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बड़ा धमाका हुआ। पर्दे उठे। लेकिन कहानी और उलझ गई। अमेरिका के न्याय विभाग ने जेफ्री एप्सटीन से जुड़ी लाखों फाइलें जनता के सामने रख दीं। करीब साढ़े तीन मिलियन पन्ने। हजारों तस्वीरें। सैकड़ों वीडियो। कानून बना, दबाव बढ़ा, और आखिरकार सच का दरवाज़ा थोड़ा खुला।

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खबर क्या है? जो अभी हुआ? या जो हमें भीतर तक हिला दे? आज हर जेब में न्यूज़रूम है। हर हाथ में मोबाइल। हर स्क्रीन पर ब्रेकिंग। सूचनाओं की बाढ़ है। आवाज़ों का शोर है। लेकिन सच? वह अक्सर इस कोलाहल में दब जाता है...

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हवा का मिज़ाज बदल रहा है। रंग भी। गलियों से लेकर गलीचों तक, चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक, एक हल्की-सी केसरिया आभा तैरती नजर आ रही है। सवाल यह नहीं कि हवा चल रही है या नहीं। सवाल यह है कि यह हवा किस दिशा में बह रही है, और किसे अपने साथ उड़ा ले जाएगी...

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​अहा, आनंद लें असली भारतीय पल का! आप लेट हैं। फैशनेबली लेट नहीं। बॉलीवुड हीरो की एंट्री वाली लेट नहीं। बल्कि सही मायने में, ट्रैजिकली, “हे भगवान, बॉस मुझे नौकरी से निकाल ही देगा” वाली लेट।

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क्या हमारी नदियां अब सिर्फ नक्शों में बचेंगी? या फिर हम उन्हें सच में “राष्ट्रीय संपत्ति” मानकर बचाने की जद्दोजहद करेंगे?

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