वोट न मिलें तो सड़कों पर हंगामा, दलीलें खत्म तो गाली-गलौज!

जब वोटर भाव नहीं देते, तो कुछ नेता सड़क पर उतर आते हैं। जब दलीलें खत्म होती हैं, तो गाली गलौज शुरू हो जाती है। और, जब जनता साथ नहीं देती, तो क्रांति का ढोल पीट दिया जाता है।

लीजिए जनाब, स्वागत कीजिए कॉकरोच जनता पार्टी का! इसके सिपहसालार देश की सियासत में इधर-उधर रेंग रहे हैं। झोले में न ठोस कार्यक्रम है, न बदलाव का नक्शा। बस शोर-शराबा, नफरत और हंगामा खड़ा करने का जुनून है।

ये खुद को जनता के गुस्से का असली नुमाइंदा बताते हैं। दावा करते हैं कि देश उबल रहा है और बस एक चिंगारी की देर है। मगर सवाल है कि इनका एजेंडा क्या है? नेता कौन है? देश को आगे ले जाने का रास्ता क्या है? इन सवालों पर सन्नाटा है। इनके पास नारे हैं, गालियों का गोदाम है और सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले मीम्स की दुकान भी है।

इनका सपना भी दिलचस्प है। नेपाल या बांग्लादेश जैसी सड़क क्रांति भारत में भी हो जाए। हर झगड़े को राष्ट्रीय संकट बना दो और हर संस्था को कटघरे में खड़ा कर दो। फिर उम्मीद करो कि मोदी सरकार बिना चुनाव हारे ही गिर जाए।

वाह रे सियासी शॉर्टकट! जनता के बीच जाने, उसके सवाल सुनने और चुनाव लड़ने की क्या जरूरत है? कैमरे के सामने चिल्लाओ और रातोंरात क्रांतिकारी बन जाओ! कॉकरोच जनता पार्टी ने कमाल का नुस्खा खोजा है। जनता का भरोसा नहीं जीत सकते, तो उसका गुस्सा भड़काओ। समाधान नहीं दे सकते, तो शक और डर बेचो। चुनाव में विरोधियों को नहीं हरा सकते, तो पूरी व्यवस्था को ही बदनाम कर दो। लेकिन जनाब, लोकतंत्र कोई कॉकरोच दौड़ नहीं है। यहां मेज के नीचे सबसे तेजी से रेंगने वाला विजेता नहीं बन जाता है। जनता का भरोसा जीतने के लिए जमीन पर उतरना पड़ता है।

भारत की विदेश नीति में बढ़ता आत्मविश्वास भी कुछ लोगों को रास नहीं आता है। नई दिल्ली का संदेश साफ है। देश के फैसले राष्ट्रीय हितों के हिसाब से होंगे, किसी विदेशी दबाव में नहीं। अमेरिका हो, रूस हो या यूरोप, भारत सबके साथ अपने हित देखकर रिश्ते बनाना चाहता है।

दुनिया कई ताकतों में बंट रही है। अमेरिका की कुछ नीतियों और एलन मस्क जैसे चर्चित लोगों के विचारों से भारत कई मौकों पर असहमत रहा है। ऐसे माहौल में स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना जरूरी है।

कॉकरोचों को शायद पता भी नहीं होता कि वे किसकी धुन पर नाच रहे हैं। लेकिन, उनकी जहरीली सियासत देश में फूट डालने वाली ताकतों के काम जरूर आ सकती है। हर शोर मासूम नहीं होता है और हर क्रांतिकारी नारा बदलाव का पैगाम नहीं लाता है।

कॉकरोच टोली को नियम-कानून और संवैधानिक प्रक्रियाएं भारी लगती हैं। उसे हर फैसला तुरंत चाहिए, वह भी शाम की टीवी बहस से पहले। सुप्रीम कोर्ट वही फैसला दे, जो इन्हें पसंद हो। चुनाव आयोग वही करे, जो इनकी मांग हो। संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति इनके खिलाफ पड़ जाए, तो उसे हटाने की मांग शुरू कर दो। बात न बने, तो पूरी व्यवस्था को भ्रष्ट और बेकार घोषित कर दो।

तो क्या अगली बार संसद के फैसले भी हैशटैग से होंगे? क्या जजों के निर्णय ऑनलाइन वोटिंग से तय होंगे? क्या संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां जंतर मंतर की नारेबाजी से होंगी? संविधान पढ़ने की क्या जरूरत है, जब व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी हर किसी को लोकतंत्र में पीएचडी बांट रही है!

अदालतों की अपनी प्रक्रिया होती है और संवैधानिक पदों की गरिमा भी जरूरी है। विवादों का फैसला सबूत और कानून के आधार पर होना चाहिए। प्रक्रिया धीमी लग सकती है, लेकिन लोकतंत्र दो मिनट में तैयार होने वाला नूडल नहीं है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग भी संविधान और कानून के दायरे में परखी जानी चाहिए। विपक्ष को सवाल उठाने और सरकार की आलोचना करने का पूरा हक है। लेकिन, सड़क पर भीड़ जुटाकर किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने की मांग करना कानूनी प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता है। दावा मजबूत है, तो सबूत पेश कीजिए। अदालत का फैसला जरूरी है, तो उसका दरवाजा खटखटाइए। हर विवाद को सड़क का तमाशा बनाने की जरूरत क्या है?

भारत में नियमित चुनाव होते हैं। राजनीतिक दल सरकार की आलोचना कर सकते हैं और जनता से समर्थन मांग सकते हैं। लोकतंत्र का असली मैदान यही है, जहां जनता को अपनी पसंद की सरकार चुनने का अधिकार है।

लेकिन, चुनाव जीतना बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए संगठन, भरोसेमंद नेतृत्व और जनता की समस्याओं का समाधान चाहिए। लोगों को रोजगार, अच्छे स्कूल, सस्ता इलाज, साफ हवा, सुरक्षित सड़कें और ईमानदार प्रशासन चाहिए। सिर्फ नारों से पेट नहीं भरता। गालियों से अस्पताल नहीं बनते और मीम्स से नौकरियां पैदा नहीं होती हैं।

मगर, कॉकरोच टोली को आसान रास्ता पसंद है। एक हंगामेदार प्रदर्शन करो, वीडियो बनाओ, विरोधियों को गालियां दो और टीवी कैमरों का इंतजार करो। कुछ घंटे की शोहरत मिलेगी, फिर अगले दिन नया तमाशा खड़ा कर दो।लेकिन, महंगाई, बेरोजगारी, खराब शिक्षा और लचर स्वास्थ्य सेवाओं पर कौन बात करेगा? कैमरे चले जाएंगे, मगर आम आदमी की मुश्किलें बनी रहेंगी।

मोदी सरकार ने जंतर मंतर पर प्रस्तावित बड़े प्रदर्शन को भारी पुलिस बंदोबस्त के जरिए रोकने का रास्ता चुना। समर्थक इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने का कदम मान सकते हैं। आलोचक शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पाबंदियों को लेकर सवाल उठा सकते हैं।

दोनों पक्षों को एक बात समझनी होगी। कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक आजादी के बीच संतुलन जरूरी है। सरकार हर आलोचक को उपद्रवी नहीं बता सकती है। इसी तरह प्रदर्शनकारी भी कानून तोड़ने का खुला लाइसेंस नहीं मांग सकते हैं। संविधान शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है, हिंसा और धमकी की छूट नहीं।

लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही जितनी जरूरी है, विरोध का जिम्मेदार होना भी उतना ही जरूरी है। सत्ता को सवालों से डरना नहीं चाहिए। विपक्ष को भी सवाल पूछने के साथ जवाब देने की तैयारी रखनी चाहिए। विपक्ष की परेशानी सिर्फ पुलिस की बैरिकेडिंग नहीं है। असली चुनौती जनता के सामने भरोसेमंद विकल्प पेश करना है।

राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेता नरेंद्र मोदी की रोज आलोचना कर सकते हैं। सरकार की गलतियां उजागर करना उनका अधिकार है। लेकिन, केवल आलोचना से सरकार का विकल्प तैयार नहीं होता है। जनता जानना चाहती है कि विपक्ष सत्ता में आया, तो करेगा क्या?

नफरत कोई घोषणापत्र नहीं है। तंज कोई रणनीति नहीं है। गाली-गलौज नेतृत्व नहीं है और वायरल वीडियो चुनाव जीतने का प्रमाणपत्र नहीं है। विपक्ष को बताना होगा कि रोजगार कैसे बढ़ेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं कैसे सुधरेंगी, संस्थाओं की रक्षा कैसे होगी और अर्थव्यवस्था किस दिशा में जाएगी। जनता को जवाब चाहिए, राजनीतिक कुश्ती का नया मुकाबला नहीं।

भारत ने युद्ध देखे हैं, आपातकाल झेला है और कई राजनीतिक आंधियां पार की हैं। देश को सतर्क नागरिकों, धैर्य और जिम्मेदार राजनीति की जरूरत है। लोकतंत्र केवल सरकार बनाने का तरीका नहीं है। यह असहमति का सम्मान करने और कानून के सामने सबको जवाबदेह रखने की व्यवस्था भी है।

सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब राजनीतिक विरोधी एक दूसरे को देश का दुश्मन समझने लगते हैं। नफरत बढ़ती है, तो सबसे पहले आम आदमी पिसता है। निवेश प्रभावित होता है, भरोसा टूटता है और समाज में दरारें गहरी होती हैं।

कॉकरोच टीवी स्टूडियो, धरना स्थलों और सोशल मीडिया पर रेंगते रहेंगे। सुबह देश के पतन की घोषणा करेंगे और शाम को लोकतंत्र का मातम मनाएंगे। हर दिन नया शोर, नया आरोप और नया तमाशा। मगर देश चलाने के लिए केवल तमाशा काफी नहीं है। उन्हें शोर मचाने दीजिए। लेकिन शोर को जनसमर्थन मत समझिए। गुस्से को समझदारी और हंगामे को सुधार का नाम मत दीजिए। सड़क पर जुटी भीड़ और चुनाव में मिलने वाले वोटों के बीच बड़ा फर्क होता है।

अगर कॉकरोच जनता पार्टी सचमुच जनता की नुमाइंदगी करती है, तो चुनाव मैदान में उतरे। अपना कार्यक्रम बताए, उम्मीदवार खड़े करे और जनता से वोट मांगे। जनता खुद फैसला कर देगी कि इनके नेताओं को सत्ता चाहिए या सिर्फ सुर्खियां।

आखिर लोकतंत्र का सीधा सा उसूल है। आप छत पर चिल्लाइए, गलियारों में रेंगिए या सड़क पर नाचिए। लेकिन एक दिन जनता के सामने जाना ही पड़ेगा। और उस दिन कॉकरोचों को एक कड़वी हकीकत समझ आएगी। बैलेट बॉक्स नाकाम नेताओं की हताशा फेंकने वाला कूड़ेदान नहीं है। वह जनता की अदालत है, जहां फैसले नारों से नहीं, वोटों से होते हैं।