पश्चिमी युवा लड़ रहे हैं बदलाव की लड़ाई, क्या कर रहे हैं भारत के ‘कॉकरोच’!

क्या युवा सिर्फ नारे लगाने के लिए पैदा हुए हैं? क्या सड़कों पर भीड़ जुटाना ही क्रांति है? जब पश्चिम के युवा बेहतर शिक्षा, सस्ते मकान और बराबरी के लिए लड़ रहे हैं, तब भारत के कुछ युवा जो अपने को ‘कॉकरोच’ कहलाना पसंद करते हैं, आखिर किस जंग में उलझे हैं?

दुनिया बदल रही है। नई पीढ़ी पुराने निजाम से सवाल पूछ रही है। फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन और जर्मनी में युवा सड़कों पर उतर रहे हैं। अमेरिका में भी महंगाई, मकानों के बढ़ते किराये और आर्थिक गैरबराबरी के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं। उनका सवाल सीधा है। पढ़ाई महंगी क्यों है? नौकरी मिलने के बाद भी घर खरीदना सपना क्यों है? अमीरों की दौलत बढ़ती जाती है, लेकिन आम परिवारों का बजट क्यों बिगड़ता जाता है? यह सिर्फ गुस्सा नहीं है। यह अपने भविष्य को बचाने की लड़ाई है। और यही लड़ाई हुक्मरानों की नींद उड़ा रही है।

पश्चिम के युवाओं का एजेंडा क्या है? फ्रांस में छात्र खराब स्कूलों, शिक्षकों की कमी और दाखिले की मुश्किलों पर सवाल उठा रहे हैं। बेल्जियम में शिक्षा पर कटौती और बढ़ती फीस के खिलाफ आवाजें बुलंद हुई हैं। स्पेन में मकानों के आसमान छूते किराये ने नौजवानों का जीना मुश्किल कर दिया है। किराया चुकाएं या जिंदगी चलाएं? नौकरी करें या घर खरीदने का सपना देखें? पढ़ाई पूरी करें या कर्ज की गठरी उठाएं? ये सवाल किसी एक देश के नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया की युवा पीढ़ी इनसे जूझ रही है।

जब सरकारें सुरक्षा और रक्षा पर अरबों खर्च करने की तैयारी करती हैं, तो युवा पूछते हैं कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों के लिए पैसा कम क्यों पड़ जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप की सुरक्षा चिंताएं वास्तविक हैं। लेकिन, शिक्षा और रोजगार की कीमत पर हर फैसला जायज नहीं ठहराया जा सकता है।

आखिर देश किसके लिए है? सिर्फ सीमाओं की हिफाजत के लिए, या उन नौजवानों के भविष्य के लिए भी, जिन्हें इन सीमाओं के भीतर अपनी जिंदगी बनानी है? युवाओं का गुस्सा हमेशा किसी खास विचारधारा की पैदाइश नहीं होता है। कभी-कभी निराशा ही सबसे बड़ी विचारधारा बन जाती है।

अब जरा भारत की तरफ आइए। यहां भी नौजवान नाराज हैं। बेरोजगारी है, प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव है और भर्ती व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। नीट जैसी परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने लाखों परिवारों की चिंता बढ़ाई है। एक परीक्षा भारतीय छात्र के लिए महज प्रश्नपत्र नहीं होती है। उसमें माता-पिता की जमा पूंजी, वर्षों की मेहनत और बेहतर जिंदगी की उम्मीद लगी होती है। पेपर लीक हो जाए या व्यवस्था पर भरोसा डगमगा जाए, तो सिर्फ परीक्षा नहीं टूटती। पूरे परिवार के सपने बिखर जाते हैं।

इसी गुस्से के बीच तथाकथित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसे नाम चर्चा में आए। जिन बेरोजगार युवाओं को ताना मारने के लिए कॉकरोच कहा गया, उन्होंने उसी अपमान को अपनी पहचान और प्रतिरोध का हथियार बना लिया।

यह व्यंग्य भी है और व्यवस्था पर चोट भी। लेकिन, सवाल यह है कि इस गुस्से का इस्तेमाल किसलिए हो रहा है? क्या मकसद परीक्षा व्यवस्था सुधारना है? क्या मांग है कि दोषियों को सजा मिले, भर्ती पारदर्शी बने और युवाओं को रोजगार मिले? या फिर पूरी लड़ाई नेताओं के इस्तीफे, राजनीतिक नारेबाजी और एक-दूसरे को नीचा दिखाने तक सिमट जाएगी? यानी थकेली, हारी हुई विपक्षी पार्टियों का मुखौटा या प्रॉक्सी बनकर, सत्तारूढ़ पार्टी और व्यवस्था को अस्थिर करना, और देश हित को नुकसान पहुंचाना, ही मकसद रह गया है। यहीं पश्चिम और भारत के आंदोलनों में फर्क नजर आता है।

पश्चिम के कई युवा आंदोलन शिक्षा, आवास, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक गैरबराबरी जैसे मुद्दों पर केंद्रित हैं। भारत में भी ऐसे मुद्दे मौजूद हैं, लेकिन कुछ युवा आंदोलन जल्द ही सियासी खींचतान का अखाड़ा बन जाते हैं।

मंत्री का इस्तीफा मांगना आसान है। लेकिन, परीक्षा प्रणाली को दुरुस्त करना बेहद मुश्किल है। सरकार को गाली देना आसान है। लेकिन, ऐसी व्यवस्था बनाना कठिन, जिसमें किसी गरीब छात्र के साथ नाइंसाफी न हो। इस्तीफा एक घटना है, सुधार एक प्रक्रिया। दोनों को एक समझना सबसे बड़ी भूल है।

पश्चिम के हर छात्र आंदोलन को आदर्श मानना भी गलत होगा। वहां भी हिंसा होती है, संपत्ति को नुकसान पहुंचता है और राजनीतिक दल युवाओं के गुस्से का फायदा उठाते हैं। भारत में भी छात्र आंदोलनों की गौरवशाली परंपरा रही है। आजादी की लड़ाई से लेकर आपातकाल तक, नौजवानों ने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई है। साठ और सत्तर के छात्र आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन के आदर्शों और सपनों से जुड़े थे। बिहार आंदोलन का लक्ष्य संपूर्ण क्रांति था। मगर कॉकरोच आंदोलन व्यक्ति विशेष के इस्तीफे से जुड़ा है। 

जो आंदोलन शिक्षा, रोजगार, बराबरी और जवाबदेही की मांग करता है, वह लोकतंत्र को मजबूत कर सकता है। लेकिन, जब आंदोलन निजी स्वार्थ, राजनीतिक कठपुतलीपन या नफरत का औजार बन जाए, तो उसका मकसद ही धुंधला पड़ जाता है।

हर विरोध देशविरोध नहीं होता है। सरकार से सवाल पूछना नागरिक का हक है। मगर असहमति और अराजकता के बीच की लकीर भी मिटनी नहीं चाहिए। युवाओं को तय करना होगा कि वे बदलाव के सिपाही बनना चाहते हैं या किसी और की सियासी बिसात के मोहरे।

युवाओं को अच्छी शिक्षा चाहिए। पारदर्शी परीक्षाएं चाहिए। सम्मानजनक रोजगार चाहिए। सस्ते मकान चाहिए। सबसे बढ़कर, उन्हें ऐसा भविष्य चाहिए जिसमें मेहनत करने का कुछ मतलब हो। सरकारें यदि इन सवालों से मुंह मोड़ेंगी, तो गुस्सा बढ़ेगा। राजनीतिक दल उस गुस्से को अपनी सुविधा के मुताबिक इस्तेमाल करेंगे। कभी वामपंथ, कभी दक्षिणपंथ, कभी जाति, कभी धर्म। नौजवानों की असली समस्याएं फिर नारों के शोर में दब जाएंगी। और, भारत के कॉकरोचों को भी सोचना होगा। अपमान को ताकत बनाना अच्छी बात है, लेकिन उस ताकत का इस्तेमाल किसलिए होगा? व्यवस्था सुधारने के लिए या सिर्फ तमाशा खड़ा करने के लिए?

आखिर कॉकरोच हों या क्रांतिकारी, पेट, पढ़ाई और भविष्य के सवाल सबके सामने खड़े हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई इन सवालों के जवाब मांग रहा है, और कोई सवाल पूछने वालों की आवाज में अपना सियासी सुर मिला रहा है। नौजवानों की असली पहचान उनके नारों से नहीं, उनके मकसद से होगी।