बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

अब मौसम भरोसे के क़ाबिल नहीं रहा। सचमुच आसमान ने अपनी ज़ुबान बदल ली है। मौसम अब वैसा नहीं रहा, जैसा हमने बचपन में जाना था। कभी हल्की-फुल्की बारिश होती थी, अब वही आफ़त बनकर टूट पड़ती है। कभी गर्मी बस तपिश देती थी, आज वही जानलेवा लू बन जाती है...

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सुबह अगर आंख खुलते ही जलन हो, जैसे किसी ने मिर्ची का स्प्रे मार दिया हो, गले में खराश चिपक जाए मानो कोई पुराना कर्ज़ वसूल करने आ गया हो, और फेफड़े ऐसे खांसें जैसे ईएमआई की आखिरी किस्त पर डिफॉल्ट हो गया हो, तो घबराइए मत! बधाई हो, आप ‘विकास-प्रदत्त ऑक्सीजन’ का मजा ले रहे हैं। गहरी सांस लीजिए, ये बदबू नहीं, बल्कि ‘सक्सेस की सिग्नेचर फ्रेग्रेंस’ है। मुफ्त की हवा है जी, और मुफ्त में जो मिले, वह सबसे प्रीमियम क्वालिटी का होता है, बस एक्सपायरी डेट चेक मत करना!

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​खामोशी कभी-कभी सबसे बड़ा गुनाह बन जाती है। और आज वही घड़ी है। सभ्य दुनिया की इस चुप्पी में कोई समझ नहीं, कोई नैतिकता नहीं; सिर्फ एक ठंडी साजिश नज़र आती है। एक सवाल है जो रातों को जागता रखता है। एक बेचैनी है जो गले में फंस गई है। एक इंतज़ार है जो अब और नहीं सहा जा सकता।

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कांग्रेस-मुक्त भारत! यह नारा आज के राजनीतिक गलियारों में गूंजता है। पर इसकी पहली आहट बहुत पहले सुनाई दी थी। एक बाग़ी दिमाग में। एक बेचैन आत्मा में। डॉ राम मनोहर लोहिया के भीतर।

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क्या सचमुच भारत में चुनाव जीतने के लिए जाति का प्रमाण पत्र ही असली पासपोर्ट है? सवाल चुभता है, पर जवाब बहुतों को मालूम है। सच यह है कि हां, आज भी काफी हद तक यही हकीकत है। लोकतंत्र का मैदान खुला है, पर खेल के नियम अब भी पुरानी पहचानें तय करते हैं।

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दुनियाभर में जहां साफ पानी और शौचालय की कमी है, वहां असमानता और बढ़ती है, और सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं पर पड़ता है...

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