यूरोप जीतने निकले थे। कुछ ही दिनों के बाद पता चला कि यूरोप जीतना तो दूर, अपने घुटनों को मनाना ही बड़ी जीत है।
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बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।
यूरोप जीतने निकले थे। कुछ ही दिनों के बाद पता चला कि यूरोप जीतना तो दूर, अपने घुटनों को मनाना ही बड़ी जीत है।
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आखिर कोई देश दिल्ली की एक कॉलोनी से भी छोटा होकर अपना राजकुमार, अपनी सरहदें, अपनी हुकूमत और इतना राष्ट्राभिमान कैसे रख सकता है कि उसका झंडा भी कभी-कभी शरमा जाए...
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झरना गरज रहा था। नाव झूम रही थी। और, तभी एक सीढ़ी ने हमारे घुटनों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया! हम स्विट्ज़रलैंड के शाफहाउज़ेन के पास शानदार राइन फॉल्स देखने आए थे। सोचा था शांतिपूर्ण नाव की सैर होगी। लेकिन, देखते-देखते यह सफर रोमांच, सीढ़ियों की चढ़ाई, यातायात की उलझन और आखिर में बचाव अभियान में बदल गया। और इस पूरे अभियान में हमारे साथ थीं, लेडी मार्था, चाय और समोसे!
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ब्रसेल्स में छात्र सड़क पर उतर आए और हम भारतीय पर्यटक टॉयलेट की तलाश में उतर गए। यूरोप में शिक्षा महंगी हो रही है। भारत में भी शिक्षा पर राजनीति गरम है। और दोनों के बीच एक बेचारा पर्यटक खड़ा है, जिसे सिर्फ एक मुफ्त टॉयलेट चाहिए। यही है आज का ग्लोबल विलेज! ब्रसेल्स में छात्र कह रहे हैं, “पढ़ाई हमारा हक है।” दिल्ली के कॉकरोच कह रहे हैं, “हम भी यहीं हैं!” और भारतीय पर्यटक पूछ रहा है, “भाई, टॉयलेट किधर है?
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हमारी आरामदेह टूरिस्ट बस ने एक ही दिन में फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड के किनारे पार किए। रात तक हम जर्मनी के फ्रैंकफर्ट पहुंच चुके थे। न टैंक, न सैनिक, बस कैमरा, नाश्ता, गूगल मैप और उत्सुक भारतीय वरिष्ठ नागरिकों का एक जत्था...
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पेरिस ने राजा देखे हैं, राष्ट्रपति देखे हैं, फिल्मी सितारे देखे हैं और फैशन की दुनिया के बड़े नाम भी देखे हैं। लेकिन, अगले सप्ताहांत शहर एक ऐसी हस्ती का स्वागत करने जा रहा है, जिसके साथ ग्लैमर से ज्यादा आस्था जुड़ी है। पोप लियो चौदहवें पेरिस आ रहे हैं...
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