आरटीआई का कानून या रंगदारी का नया धंधा…!

सूचना का अधिकार कानून कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना जाता था। इसे जनता की आंख और कान कहा गया। उम्मीद थी कि सरकारी फाइलों में छिपे सच बाहर आएंगे और अफसर जवाबदेह बनेंगे। लेकिन, आज तस्वीर बदलती दिख रही है। कई जगह आरटीआई जनहित का नहीं, बल्कि निजी फायदे, ब्लैकमेल और उगाही का औजार बन चुकी है। कानून की आड़ में कुछ लोगों ने पूरा कारोबार खड़ा कर लिया है।

मैसूर विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में कर्नाटक के पूर्व सूचना आयुक्त डॉ एल कृष्णमूर्ति ने इसी खतरे की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि फर्जी आरटीआई कार्यकर्ताओं की बढ़ती संख्या इस कानून की आत्मा को खत्म कर रही है। उनके अनुसार, जिस कानून ने टूजी जैसे बड़े घोटाले उजागर किए, उसी का इस्तेमाल अब सरकारी दफ्तरों को परेशान करने और बेवजह हजारों पन्नों की सूचनाएं मांगने में हो रहा है।

Read in English: RTI law or a new business of extortion…!

देशभर से सामने आए मामले इस चिंता को और बढ़ा रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के ऊना में एक स्वयंभू आरटीआई कार्यकर्ता पर आरोप लगा कि उसने पत्थर खदान संचालकों से 75 लाख रुपये की मांग की। आरटीआई से दस्तावेज जुटाए गए और फिर शिकायत करने की धमकी देकर रकम मांगी गई। सतर्कता विभाग ने जाल बिछाकर उसे पहली किश्त लेते हुए गिरफ्तार किया।

असम में दुलाल बोरा का मामला और भी चौंकाने वाला है। उस पर उगाही और धोखाधड़ी के दर्जनों मुकदमे दर्ज हुए। बताया गया कि उसने दो हजार से अधिक दूसरी अपीलें दायर कीं और कई बार एक ही दिन में सौ से ज्यादा आरटीआई आवेदन भेज दिए। आरोप था कि बाद में अधिकारियों और ठेकेदारों से पैसे लेकर मामलों को ठंडे बस्ते में डालने का खेल चलता था।

हरियाणा के गुरुग्राम में एक आरटीआई कार्यकर्ता और एक यूट्यूबर पर स्कूल प्रबंधन से लाखों रुपये की उगाही का आरोप लगा। पहले लगातार आरटीआई लगाई गईं, फिर अदालत और आयकर विभाग की कार्रवाई का डर दिखाया गया। अंत में शिकायतें वापस लेने के बदले मोटी रकम मांगी गई।

गुजरात के सूरत में तो यह पूरा नेटवर्क बन गया। पुलिस ने दर्जनों मुकदमे दर्ज किए। आरोप था कि कुछ लोग नगर निगम से भवनों की जानकारी आरटीआई के जरिए हासिल करते, फिर मापने वाली फीता लेकर खुद को निरीक्षक बताकर निर्माण स्थलों पर पहुंच जाते। बिल्डरों और मकान मालिकों को कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक वसूले जाते हैं।

आंध्र प्रदेश में दो लोगों पर सूचना आयोग ने आगे आरटीआई लगाने तक पर रोक लगा दी। आयोग ने पाया कि वे एक के बाद एक दर्जनों अपीलें और शिकायतें दायर कर सरकारी अधिकारियों को लगातार परेशान कर रहे थे। कई आवेदन वर्षों पुराने रिकॉर्ड मांगते थे, जिनका जनहित से कोई सीधा संबंध नहीं था।

तमिलनाडु के थेनी में एक व्यक्ति ने 781 आरटीआई आवेदन केवल जिला न्यायालय के खिलाफ दायर कर दिए। नतीजा यह हुआ कि सरकारी कामकाज प्रभावित होने लगा। सूचना आयोग ने उस पर जुर्माना लगाया और इसे कानून के खुले दुरुपयोग का मामला बताया।

यह केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। इन मामलों का तरीका लगभग एक जैसा है। पहले आरटीआई डालो। फिर दस्तावेज जुटाओ। उसके बाद शिकायत, जांच या मीडिया में बदनामी का डर दिखाओ। आखिर में समझौते के नाम पर पैसे मांगो। कई जगहों पर निजी दुश्मनी निकालने के लिए भी आरटीआई का इस्तेमाल किया गया। कहीं एक ही विषय पर सैकड़ों आवेदन भेजे गए, तो कहीं पूरे विभाग को कागजों के ढेर में दबा दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार ऐसी प्रवृत्ति पर चिंता जता चुका है। अदालत ने कहा कि आरटीआई का इस्तेमाल ईमानदार अधिकारियों को डराने या सरकारी कामकाज रोकने के लिए नहीं होना चाहिए। एक अन्य टिप्पणी में अदालत ने यहां तक कहा कि आरटीआई एक्टिविज्म कुछ मामलों में नया कारोबार बनता जा रहा है।

सबसे दुखद बात यह है कि ऐसे लोग खुद को समाजसेवी और भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा बताकर कानून की साख को चोट पहुंचाते हैं। जनता का भरोसा कमजोर होता है। सरकारी दफ्तर हर आवेदक को शक की नजर से देखने लगते हैं। असली और नकली के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

आरटीआई कानून का जन्म जनता को ताकत देने के लिए हुआ था, लेकिन कुछ स्वार्थी तत्वों ने इसे दबाव, धमकी और वसूली के हथियार में बदलने की कोशिश की है। जब अधिकार की आड़ में कारोबार शुरू हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान उसी कानून की विश्वसनीयता को होता है। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि सूचना मांगने का अधिकार कहीं कुछ लोगों के लिए डर और सौदेबाजी का लाइसेंस तो नहीं बनता जा रहा।