ज्यादातर भारतीय शहरों का विकास निर्वाचित निगम के पार्षदों से छीनकर चंद नौकरशाहों द्वारा कब्जाए विकास प्राधिकरणों को सौंपने की भूल का परिणाम आज सर्वत्र दिखने लगा है...
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बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।
ज्यादातर भारतीय शहरों का विकास निर्वाचित निगम के पार्षदों से छीनकर चंद नौकरशाहों द्वारा कब्जाए विकास प्राधिकरणों को सौंपने की भूल का परिणाम आज सर्वत्र दिखने लगा है...
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सिर्फ चुनावों में तमिल भावनाओं को जागृत करने के लिए कच्चतिवू टापू के विवादित हस्तांतरण को मुद्दा बनाया गया था। अब भाजपा इस मुद्दे को क्यों नहीं उठा रही है…?
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कभी भारत में दूध की नदियां बहती थीं। बृज भूमि कृष्ण कन्हैया की माखन, दही, छाछ की लीलाओं से गुंजित थी। लेकिन आज नकली दूध से देवी देवताओं का अभिषेक हो रहा है। दूध की परिक्रमा लग रही है। रासायनिक जहरों से नकली मिलावटी, पनीर, खोया, मिठाई बनाकर लोगों की सेहत से खिलवाड़ हो रहा है।
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लंबे समय से शास्त्रीय पत्रकारिता के अध्येता कहते आ रहे हैं कि पत्रकारों को न तो किसी के पक्ष में बोलना चाहिए और न ही किसी के विरोध में। मतलब एक पत्रकार को ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ के सिद्धांत पर चलना चाहिए। लेकिन, हाल के वर्षों में हमारे देश की मीडिया बेवजह की बहस में पड़कर विभिन्न मुद्दों पर लगातार पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती आ रही है...
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साल 1994 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आगरा को ताज महल और अन्य धरोहरों के लिए सुरक्षित बनाने के लिए हस्तक्षेप करने के बाद एक चौथाई सदी से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आशा के अनुरूप परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। संसद के एक अधिनियम द्वारा गठित ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन प्राधिकरण प्रदूषण को नियंत्रित करने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में बुरी तरह विफल रहा है।
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दुनियाभर के पर्यटकों को आकर्षित करने वाला, स्मारकीय भव्यता का खजाना शहर आगरा, आध्यात्मिक शून्यता में डूबा हुआ है। यह शहर अपनी समृद्ध विरासत से बेखबर है। जब दुनिया विरासत की पवित्रता का जश्न मनाती है, तब आगरा की सड़कों पर उदासीनता तैरती है। इसकी ऐतिहासिक संपदा में निहित विरासत और समृद्धि पर कोई चर्चा नहीं होती है।
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